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Delhi Elections 2025: मायावती की मजबूत रणनीति की क्यों है चर्चा? दिल्ली में इन 4 का गेम बिगाड़ सकती है BSP

Delhi Elections 2025: दिल्ली में 2008 के बाद बहुजन समाज पार्टी (BSP) का ग्राफ लगातार गिरा है और वही ट्रेंड पार्टी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी रहा है। लेकिन, इस बार दिल्ली में मायावती की पार्टी ने अपनी रणनीति में काफी बदलाव किए हैं और इस वजह से इसकी सियासी तौर पर काफी चर्चा हो रही है। बसपा दलितों की कैडर आधारित पार्टी है और अगर बदली रणनीति की वजह से पार्टी इस चुनाव में मजबूत हुई तो चार राजनीतिक दलों की राजनीति को नुकसान होने की आशंका है।

बसपा ने दिल्ली की 70 सीटों में से जिन 68 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, उसमें दो बातें महत्वपूर्ण हैं। एक तो पार्टी ने ज्यादातर सीटों पर जाटव समाज के लोगों को मौका दिया है। मायावती खुद इसी जाति से हैं और जाटव बीएसपी के कोर वोटर माने जाते रहे हैं। दूसरी बात यह महत्वपूर्ण दिख रही है कि पार्टी ने इस बार इस बात का भी ध्यान रखा है कि युवा चेहरे ही अधिक संख्या में उसकी नुमाइंदगी करते नजर आएं।

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Delhi Elections 2025: दिल्ली में दलित वोट बैंक बसपा की रणनीति में प्राथमिकता

बीएसपी ने इस बार दिल्ली की 68 सीटों में से 35 सीटों पर जाटव प्रत्याशी बनाए हैं। राजधानी की सभी 70 सीटों में अनुसूचित जाति (SC) के वोटर अच्छी-खासी तादाद में हैं। लेकिन, इतनी संख्या में जाटव प्रत्याशियों के उतारने का मतलब है कि पार्टी राष्ट्रीय राजधानी से ही अपने कोर वोटर बेस को फिर से एकजुट करने की रणनीति में जुटी है।

इस बार बीएसपी ने 70 में से 45 सीटों पर दलितों को टिकट दिया है। मतलब, 12 सुरक्षित सीटों (SC) के अलावा 33 अनारक्षित सीटों पर भी पार्टी के उम्मीदवार दलित समुदाय से हैं।

Delhi Elections 2025: बसपा ने गिनती की सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशियों पर लगाया दांव

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री की पार्टी ने दिल्ली की जिन 23 सीटों पर गैर-दलितों को टिकट दिया है, उनमें जाट, गुर्जर, ठाकुर, ब्राह्मण, पंजाबी, वैश्य और ओबीसी उम्मीदवार हैं। पार्टी की एक रणनीति और भी गौर करने लायक है कि इसने इस बार दिल्ली में सिर्फ 5 ही मुसलमानों को टिकट दिया है।

हम आगे चलकर देखेंगे कि बसपा ने किस तरह से अपने प्रत्याशियों के माध्यम से न सिर्फ अपना जनाधार मजबूत करने का दांव चला है, बल्कि एक तीर से चार निशाने साधने की कोशिश की है।

Delhi Elections 2025: आप और कांग्रेस की रणनीति को दे सकती है झटका

दिल्ली की 12 आरक्षित सीटों के परिणामों को दिल्ली में दलित मतदाताओं का रुझान मानें तो इन्होंने जिसका साथ दिया है, उसी की सरकार बनने में मदद मिली है। इस हिसाब से अगर दिल्ली में बीएसपी को उसकी तगड़ी रणनीति का फायदा मिला और उसने अनारक्षित सीटों पर भी दलित वोट बैंक में कुछ हद तक भी सेंध लगाई तो सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी पार्टी का हो सकता है।

क्योंकि, चुनाव विश्लेषण यह भी बताते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली के दलित वोटरों का रुझान ज्यादातर आप और कांग्रेस के इंडिया ब्लॉक की ओर रहा था। इस तरह से अगर कांग्रेस भी फिर से अपने पुराने जनाधार को वापस लाने की उम्मीदें पाल रही है तो यह उसकी रणनीति के लिए भी झटका हो सकता है।

Delhi Elections 2025: दिल्ली में बीएसपी की रणनीति से बीजेपी का न बिगड़ जाए गेम?

बीएसपी ने दिल्ली में जाटव के अलावा जिन दलितों प्रत्याशियों को मौका दिया है, उनमें वाल्मीकि और खटिक समाज के लोग भी हैं, जिनका कई सीटों पर अच्छा जनाधार है। पिछले कुछ समय से बीजेपी भी दलितों के इस वर्ग और सभी अनुसूचित जातियों पर अपना प्रभाव बनाने की कोशिशों में जुटी हुई है, बसपा की नई कोशिशों से उसकी उम्मीदों पर भी पानी फिरने की आशंका है।

वहीं गैर-दलित सीटों पर बीएसपी ने जो जातीय समीकरण बिठाया है, वह बीजेपी से लेकर आप और कांग्रेस तक को नुकसान पहुंचा सकता है।

Delhi Elections 2025: युवाओं पर दांव लगाकर 'आजाद' की उभरती ताकत पर चोट करने की कोशिश!

बसपा की रणनीति से चौथा निशाना आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) और उसके सुप्रीमो और सांसद चंद्रशेखर आजाद पर लग सकता है। यूपी के नगीना से सांसद ने खुद को दलित युवाओं में हीरो वाली छवि तैयार करने की कोशिश की है। बीएसपी ने जिस तरह से आधे से ज्यादा युवा यानी कि 45 साल से कम उम्र के लोगों को टिकट दिया है,इससे उनके मुकाबले मायावती के भतीजे और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी आकाश आनंद को पेश करने की कोशिश है।

इंडियन एक्सप्रेस ने बसपा के एक बड़े नेता के हवाले से लिखा है, 'यूथ वोटरों का रुझान नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद की ओर देखते हुए, युवाओं पर खास फोकस किया गया है। पार्टी युवा दलितों को खींचने की कोशिश कर रही है।'

सबसे बड़ी बात है कि पार्टी ने दिल्ली चुनावों की जिम्मेदारी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक आनंद पर ही डाल रखी है और इस वजह से दिल्ली के चुनाव परिणाम से उनका करियर भी जुड़ गया है और पार्टी के भविष्य पर भी दांव लग गया है।

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