Delhi Chunav Result: राहुल गांधी, कांग्रेस और INDIA bloc के लिए दिल्ली चुनाव से निकले 5 संदेश
Delhi Chunav Result 2025 News: लोकसभा चुनावों में बीजेपी को 240 सीटों पर रोकने को अपनी सबसे बड़ी सफलता मानकर चल रहे विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक की दिल्ली विधानसभा में आखिरी उम्मीद भी टूट गई है। विपक्ष ने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि केजरीवाल मॉडल का ऐसा हाल होने वाला है, जिसे उखाड़ कर पर भाजपा हिंदी बेल्ट में अपना आखिरी चक्रव्यूह भी तोड़ सकती है।
आज की तारीख में विपक्ष एक बार फिर से वहीं पहुंच चुका है, जहां 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले इंडिया ब्लॉक के गठन के पूर्व में था। यह बिखरा हुआ है। ज्यादातर दलों के लिए कांग्रेस अब बोझ बन चुकी है। लेकिन, कांग्रेस को अभी भी अपने सबसे बड़े चेहरे राहुल गांधी से चमत्कार की उम्मीद बची ही हुई है।

Delhi Chunav Result: हिंदू वोट अब मायने रखने लगा है
दिल्ली में बीजेपी ने मुख्य रूप से शासन-व्यवस्था और आम आदमी पार्टी (AAP) के खिलाफ भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया था। लेकिन, जिस तरह से दिल्ली में 2020 के दंगा प्रभावित सीटों पर पार्टी को जीत मिली है, उससे साफ है कि अब इसके लिए धार्मिक मुद्दे उठाना ही जरूरी नहीं रह गया है, यह बिना सामने से हुई कोशिशों से भी उसके पीछे गोलबंद होने लगा है।
दिल्ली से पहले महाराष्ट्र में भी हिंदुत्व का मुद्दा बिना किसी सियासी बयानबाजी के पार्टी का 'कमल'खिला चुका है। संभावना है कि बिहार और उसके बाद होने वाले चुनावों में भी यह एक बड़ा फैक्टर बन सकता है।
Delhi Chunav Result: लोकसभा चुनावों के बाद लगातार हार ने इंडिया ब्लॉक को 'निर्जीव' बना दिया
दिल्ली चुनाव में टीएमसी (TMC), समाजवादी पार्टी (SP), शिवसेना (यूबीटी) ने खुलकर आम आदमी पार्टी (AAP) का साथ दिया। वहीं कांग्रेस पार्टी इस मामले में इंडिया ब्लॉक में अलग-थलक पड़ गई। नतीजे में 'आप' के हारने के बाद जिस तरह से नेशनल कांफ्रेंस, सपा शिवसेना (यूबीटी) ने कांग्रेस को निशाना बनाया, उससे लगता है कि यह गठबंधन अब नाम का रह गया है। महाराष्ट्र चुनाव के बाद से इसके अस्तित्व पर खुद घटक दल ही सवाल उठा रहे हैं।
Delhi Chunav Result: ज्यादातर विपक्षी दलों के लिए कांग्रेस एक बोझ बन चुकी है!
दिल्ली चुनाव में जिस तरह से कांग्रेस पार्टी से इंडिया ब्लॉक के सहयोगी दलों ने कन्नी काटी है, उससे लगता है कि ये दल अब कांग्रेस को अपना बोझ समझने लगे हैं। पहले से ही टीएमसी,शिवसेना (यूबीटी), आरजेडी और सपा जैसी पार्टियां इसकी कमान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी को सौंपने की वकालत कर चुकी हैं।
जबकि, ममता शुरू से कांग्रेस को कोई भाव नहीं दे रही हैं। महाराष्ट्र में भी करारी हार के बाद उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने एक तरह से कांग्रेस पर ही ठीकरा फोड़ने की कोशिश की थी कि उसी ने सीटें तय करने में बहुत समय लगा दिया।
Delhi Chunav Result: कांग्रेस पार्टी खुद भी सवालों के घेरे में है
बीजेपी और नरेंद्र मोदी को अपने दम पर रोक पाने में खुद को असमर्थ मान रही कांग्रेस को लगता है कि सहयोगी दल उसी के जनाधार पर लोकसभा चुनावों में फले-फूले हैं। जबकि, सहयोगियों को ठीक इससे उलट महसूस हो रहा है। यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनावों से लेकर अभी तक यह तय नहीं कर पा रही है कि सहयोगियों के साथ वह किस तरह का समीकरण बनाए रखना चाहती है।
मसलन, दिल्ली में तो सभी दल बीजेपी और एनडीए के खिलाफ एकजुटता की बात करने लगते हैं, लेकिन पंजाब, बंगाल, केरल और दिल्ली प्रदेश की राजनीति में एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बनने में भी देर नहीं लगाते। इस वजह से कांग्रेस पार्टी अपने आप पर खुद भी प्रश्नचिन्ह खड़े कर रही है।
बिहार में जहां पार्टी चार दशक से लालू के कंधे पर बैठकर राजनीति कर रही है, वहां राहुल गांधी विधानसभा चुनावों के लिए अपने दमपर संभावनाएं तलाशने पहुंच रहे हैं। शायद इसलिए कि इंडिया ब्लॉक का नेतृत्व उनके हाथ से छीनने में हामी भरने वालों में खुद लालू भी शामिल हैं।
Delhi Chunav Result: राहुल गांधी की अपनी डफली अपना राग, न सुर बचा है और ना ही ताल!
कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं में भले ही लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को युवा बताने की होड़ लगी रहती हो, लेकिन तथ्य यह है कि अब वे भारतीय राजनीति के लिए नौसिखिए नहीं रह गए हैं। 21 साल से तो वह सांसद हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का दावा करने वाली कांग्रेस में तो वो बिना पद ही सुप्रीमो की तरह बर्ताव करते हैं।
दिल्ली चुनाव भी पार्टी ने सीधे और परोक्ष रूप से उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा। इसमें पार्टी की नीति शुरू से ढुलमुल रही। कभी सत्ताधारी 'आप'पर आक्रामक हुई तो कभी विपक्षी बीजेपी पर हमलावर हो गई।
इस दौरान राहुल न तो कभी अंबानी-अडानी पर आरोपों की बौछार करना भूले और न ही जाति वाला कार्ड चलना ही छोड़ा। अगर उन्हें अब भी पता नहीं चला है कि उनकी इस तरह की कोशिशों से न तो उन्हें निजी तौर पर कोई सियासी फायदा मिल रहा है और न ही पार्टी की ही भलाई हो रही है तो फिर कुछ कहना ही बेकार है। ऊपर से उनकी बहन प्रियंका गांधी तो कभी-कभी उनसे भी चार कदम आगे हो जाती हैं। जैसे शनिवार (8 फरवरी,2025) को जब पत्रकारों ने उनसे दिल्ली के नतीजों पर प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने कह दिया कि उन्हें इसके बारे में 'अभी पता नहीं' है।












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