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दिल्ली शराब नीति से जुड़े केस में दिल्‍ली हाई कोर्ट कर रहा सुनवाई, अरविंद केजरीवाल खुद कर रहे अपनी पैरवी

दिल्ली उच्च न्यायालय में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई चल रही है। यह याचिका दिल्ली शराब नीति से जुड़े एक मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित अन्य आरोपियों को आरोपमुक्त करने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती देती है।

इस मामले में एक अहम मोड़ तब आया जब केजरीवाल ने स्वयं न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से मामले की सुनवाई से हटने, जिसे न्यायिक शब्दावली में 'रिक्यूजल' कहते हैं, का अनुरोध करते हुए एक आवेदन दायर किया। वह व्यक्तिगत तौर पर अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं।

Delhi High Court

इससे पहले आम आदमी पार्टी ने जानकारी दी थी कि अरविंद केजरीवाल आज हाई कोर्ट जाएंगे। उनकी पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई दोपहर में होगी। अरविंद केजरीवाल खुद अपना पक्ष रखेंगे। उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के समक्ष अपनी पुनर्विचार याचिका दायर की है।

रिक्यूजल आवेदन पर पहली सुनवाई 6 अप्रैल को हुई थी, जहाँ न्यायालय ने सीबीआई से केजरीवाल की याचिका पर जवाब मांगा था। 6 अप्रैल की सुनवाई के दौरान, सीबीआई की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने इस रिक्यूजल याचिका का पुरजोर विरोध किया था। उन्होंने तर्क दिया कि केजरीवाल का आवेदन "आधारहीन आरोपों" पर आधारित है। सीबीआई ने भी रिक्यूजल आवेदन का विरोध करते हुए अपनी औपचारिक प्रतिक्रिया दाखिल कर दी है।

न्यायालय के समक्ष अपनी दलीलें पेश करते हुए केजरीवाल ने कहा कि निचली अदालत ने जिस तरह सीबीआई ने गवाहों को सरकारी गवाह बनाया, "उनका आचरण एक सुनियोजित परिणाम साबित करने वाला था।" उन्होंने आगे कहा, "अंततः निचली अदालत ने मुझे पूरी तरह से आरोपमुक्त कर दिया, जिसके निष्कर्ष इस अदालत के निष्कर्षों के बिल्कुल विपरीत थे, इसलिए मेरे मन में एक शंका है।"

इस पर न्यायमूर्ति शर्मा ने पलटवार करते हुए पूछा, "आपकी दलीलें क्या हैं? क्योंकि आपने कहा है कि निचली अदालत के उस फैसले को गलत बताया गया है... जिस वक्त मैंने फैसला किया उस समय इस अदालत (ट्रायल कोर्ट) का तो फैसला हुआ नहीं था। निचली अदालत के आदेश पर हम तब जाएंगे जब वे इस पर निर्णय लेंगे। आज हम सिर्फ रिक्यूजल के मुद्दे पर आपकी बात सुन रहे हैं।"

केजरीवाल ने आगे दलील दी कि सरकारी गवाहों (approver) से जुड़ा एक मुद्दा उठा था, जिस पर अदालत की अपनी एक 'फाइंडिंग' है। उन्होंने कहा कि "इस पर भी एक अंतिम फाइंडिंग दे दी गई थी। मुझे लगभग भ्रष्ट घोषित कर दिया गया था। मुझे लगभग दोषी घोषित कर दिया गया था। बस सज़ा सुनानी रह गई थी।" पीठ ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और कहा, "मैं टिप्पणी नहीं करना चाहता। यह आपकी सोच है।"

केजरीवाल ने बताया कि इस न्यायालय के सामने पहले भी पांच मामले आ चुके हैं। उनके स्वयं की गिरफ्तारी का मामला, संजय सिंह, के. कविता और अमन ढाल के जमानत आवेदन शामिल हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इन मामलों में अदालत द्वारा की गई टिप्पणियाँ "फैसले के समान" थीं, जो एक तरह से अंतिम निर्णय का आभास देती थीं।

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री ने इस संबंध में 'सत्येंद्र जैन बनाम ईडी' मामले में इसी अदालत के एक फैसले का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उस मामले में जमानत की सुनवाई चल रही थी और छह दिन की सुनवाई पूरी हो चुकी थी, जब ईडी ने अचानक न्यायाधीश पर 'भय या पूर्वाग्रह की आशंका' जताई। जिला न्यायाधीश ने इसे स्वीकार कर लिया और उच्च न्यायालय ने भी अनुमति दे दी।

केजरीवाल ने बताया कि उस मामले और उनके मामले में काफी समानताएं हैं। उन्होंने कहा कि उस मामले में न्यायालय ने यह टिप्पणी की थी कि "सवाल न्यायाधीश की ईमानदारी का नहीं है, बल्कि याचिकाकर्ता के मन में उत्पन्न आशंका का है।" उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि उनका मामला भी ठीक वैसा ही है, जहाँ न्यायाधीश की सत्यनिष्ठा पर नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता के मन की आशंका पर विचार किया जाना चाहिए।

केजरीवाल ने न्यायाधीशों के रिक्यूजल से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के 'रणजीत ठाकुर बनाम भारत संघ' फैसले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उसमें साफ तौर पर कहा है कि "न्यायाधीश को यह नहीं देखना है कि वह पक्षपाती नहीं हैं, बल्कि अगर पार्टी के मन में पक्षपात की शंका है, तो रिक्यूजल का मामला बनता है।" इसी कारणवश, केजरीवाल ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थिति दर्ज कराई।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि "मेरे मन में जो आशंका है वह मेरे और अदालत के बीच का मामला है। सीबीआई को इस मामले में पार्टी नहीं बनाया जाना चाहिए।" केजरीवाल ने अपनी बात दोहराई कि उनके मन में न्याय को लेकर आशंका है, और यह मामला केवल अदालत और उनके बीच का है।

केजरीवाल ने बताया कि 9 मार्च का आदेश आने पर "मेरा दिल बैठ गया।" उन्हें पूर्वाग्रह की गंभीर आशंकाएं थीं, जिसके चलते उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा। मुख्य न्यायाधीश ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, जिसके बाद उन्होंने यह आवेदन न्यायालय में दाखिल किया।

उन्होंने 9 मार्च के आदेश पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा, "9 मार्च को जब इस मामले की सुनवाई हुई तो सीबीआई के अलावा कोई मौजूद नहीं था। एकतरफा (एक्स-पार्टे), बिना किसी की सुनवाई किए, बिना किसी का जवाब लिए इस अदालत ने आदेश पारित किया कि प्रथम दृष्टया आदेश गलत है।" केजरीवाल ने हैरानी व्यक्त की कि जिस आदेश को निचली अदालत ने पूरे दिन की सुनवाई और 40,000 से अधिक पृष्ठों के दस्तावेजों को पढ़ने के बाद पारित किया था, उसे उच्च न्यायालय ने मात्र पांच मिनट की सुनवाई के बाद "त्रुटिपूर्ण" घोषित कर दिया।

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