छत्तीसगढ़:स्कूली बच्चों के लिए ‘ओरो स्कॉलर’ और ‘प्रोजेक्ट इन्क्ल्यूजन’ कार्यक्रम शुरू

रायपुर, 11 फरवरी। अपने बॉलीवुड फिल्म पा देखी होगी ,जिसमे ओरो नाम का बुद्धिमान बच्चा प्रागेरिया नाम की एक दुर्लभ बीमारी से ग्रसित होता है। 13 साल के ओरो का किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया था। फिल्म में यह दर्शाने का प्रयास किया गया था कि बेहद ही विपरीत परिस्थितियों में भी दुर्लभ बीमारी की गिरफ्त में आने के बाद भी बच्चा अपनी बुद्धिमता को साबित कर सकता है। एक अन्य फिल्म "तारे जमींन पर" में भी पढाई में कमज़ोर बच्चे की समस्याओं पर गंभीर चिंतन किया गया था।

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बॉलीवुड की ये फिल्मे समझाती हैं कि हर बच्चा ख़ास होता है। दुर्लभ बीमारियों से जूझने वाले बच्चों को परिवार और समाज से प्यार और सहयोग की जरूरत होती है। 2009 में रीलीज़ हुई "पा " फिल्म ने इतनी ख्याति अर्जित थी कि आज भी लोग प्रागेरिया से ग्रसित बच्चों को लोग पा ही बुलाते हैं। छत्तीसगढ़ में अब मानसिक या शारीरिक तौर पर कमज़ोर बच्चों को प्रोत्साहन देने के लिए "ओरो स्कॉलर" और 'प्रोजेक्ट इन्क्ल्यूजन' नाम के विशेष कार्यक्रम चलाया जायेगा।

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शुक्रवार को स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम अपने निवास कार्यालय में इन कार्यक्रमों का वर्चुअल शुभारंभ किया। ओरो स्कॉलर कार्यक्रम के तहत बच्चे पढ़ाई में मेहनत करने और क्विज प्रतियोगिता में शामिल होकर हजारों रूपयों की स्कॉलरशिप प्राप्त कर सकेंगे। इसी प्रकार प्रोजेक्ट इन्क्ल्यूजन कार्यक्रम विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान कर उन्हें सामान्य बच्चों के साथ लाने के लिए है। श्री अरबिन्दो सोसायटी के माध्यम से यह दोनों कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे।

शिक्षामंत्री डॉ. टेकाम ने राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों और शिक्षकों से अपील की है कि वे अपने-अपने क्षेत्र के अधिक से अधिक बच्चों को अच्छे से तैयार कर क्विज प्रतियोगिता में शामिल करने और बच्चों को निरंतर सीखने के लिए प्रोत्साहित करें। इसी प्रकार प्रोजेक्ट इन्क्ल्यूजन कार्यक्रम के तहत विभागीय अधिकारी दिव्यांग बच्चों की पहचान और सुधारात्मक उपाय के लिए प्रगति पत्र में विशेष टीम अंकित करने की प्रक्रिया करें।

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टेकाम ने बताया कि कोरोना काल में अच्छा काम करने वाली 36-36 शिक्षकों को राज्य सरकार ने 26 जनवरी को पुरस्कृत किया था। अब मूलभूत साक्षरता और सांख्यिकी कौशल सुधार के क्षेत्र में जो शिक्षक अच्छा काम करेंगे, उन्हें भी सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम के माध्यम से पढ़ाई में पीछे छूट रहे बच्चों की पहचान कर उन्हें सामान्य बच्चों की तरह सीखने में सहयोग देंगे। इस कार्यक्रम की वजह से स्कूल छोड़ने वाले कमजोर बच्चों के स्तर को ऊपर उठाने में बल मिलेगा और बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ेगा। यह दोनों कार्यक्रम शिक्षकों को पसंद आएंगे और वे बच्चों तक इसका लाभ पहुंचाने में सफल होंगे।

स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम ने इस अवसर पर कहा कि यह दोनों की कार्यक्रम स्कूली बच्चों के लिए महत्वपूर्ण है। ओरो स्कॉलर कार्यक्रम के तहत बच्चों को पढ़ाई में मेहनत करने और कुछ प्रतियोगिता में शामिल होकर हजारों रूपए की स्कॉलरशिप पाकर कर पढ़ाई का खर्च खुद वहन कर सकने के लिए तैयार करता है। वहीं दूसरा कार्यक्रम प्रोजेक्ट इन्क्ल्यूजन हमारे बीच विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बच्चों की पहचान कर उन्हें सीख सकने योग्य बनाने में शिक्षकों को सहयोग प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि यह दोनों कार्यक्रम स्कूल शिक्षा विभाग के लिए बहुत उपयोगी है और छत्तीसगढ़ में इनका संचालन होने से विद्यार्थियों को निश्चित रूप से लाभ मिलेगा।

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मंत्री डॉ. टेकाम ने बताया कि ओरो स्कॉलर कार्यक्रम कक्षा पहली से बारहवीं कक्षा तक पढाई करने वाले बच्चों के लिए है। इसमें बच्चे ओरो स्कॉलर एप्प में अपना रजिस्ट्रेशन करवाकर 20 क्विज में हिस्सा ले सकते हैं। प्रत्येक क्विज में 80 प्रतिशत अंक लाने पर उन्हें 50 रूपए प्राप्त होंगे। 20 क्विज में से सभी में 80 प्रतिशत अंक लाने पर एक माह में बच्चे को एक हजार रूपए मिलेंगे। उन्होंने कहा कि क्विज में प्रश्न बच्चों द्वारा स्कूल में सीख रहे कोर्स से ही पूछे जाएंगे। इस प्रकार इस कार्यक्रम में बच्चे अपने कोर्स को ध्यान से पढ़ेंगे ,ताकि वे क्विज में पूछे गये सवालों का जवाब देकर 80 से अधिक प्रतिशत अंक प्राप्त कर सकें।

मंत्री डॉ. टेकाम ने प्रोजेक्ट इन्क्ल्यूजन कार्यक्रम की जानकारी देते हुए बताया कि हम सब जानते हैं कि हमारे आस-पास ऐसे बच्चे हैं जो किसी न किसी रोग से ग्रसित हैं। जो बच्चे शारीरिक रूप से किसी रोग से ग्रसित हैं, तो आसानी से उनकी पहचान कर मदद की जा सकती हैं, लेकिन बच्चे किसी मानसिक रोग से ग्रसित हैं ,तो उनकी पहचान कर पाना मुश्किल होता है। हम यह मान लेते हैं कि बच्चा कुछ सीख नहीं सकता, पर वास्तव में वह किसी मानसिक कमजोरी से ग्रसित होता है। डॉ.टेकाम ने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत शिक्षकों को ऐसे बच्चों की पहचान करने और उनकी मदद करने की ट्रेनिंग दी जाएगी। ताकि शिक्षक प्रशिक्षण लेने के बाद ऐसे बच्चों की पहचान कर उनकी खामियों को दूर करने में उनकी मदद कर सकें।

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