पानी के मीटर लगे तो बदल गया किसानों का रवैया और जिंदगी

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मध्य केन्या के कियारुतारा में रहने वाली एक किसान टेरेशिया मूगो को तब बड़ी राहत मिली जब उनके समुदाय के बाकी किसान सिंचाई के पानी के लिए बिल देने पर राजी हो गए. मूगो के लिए यह राहत की बात इसलिए थी कि अब उन्हें भी कुछ पानी मिल सकेगा और वह भी सूखे के दौरान अपने खेतों की सिंचाई कर पाएंगी.

लेकिन मुरांगा काउंटी में इस समुदाय के सभी 600 लोग 150 कीनियाई शिलिंग यानी करीब 100 भारतीय रुपये का एक मुश्त बिल दे रहे थे, तो यह कुछ लोगों के लिए नाजायज लग रहा था क्योंकि जो लोग ऊपरी इलाकों में रहते हैं वे इसी बिल में ज्यादा पानी इस्तेमाल करते थे जबकि निचले इलाकों तक कम पानी पहुंचता था, जो उनके लिए नाकाफी था.

मूत्र की सिंचाई से पैदा फसलों को खाएंगे आप

मूगो बताती हैं, "मैं मुश्किल से ही फसल उगा पाती थी. जब कभी कुछ उगता भी था तो सूख जाता था." यह स्थिति कियारूतारा-रेजिया सिंचाई योजना में शामिल लगभग 60 प्रतिशत किसानों की थी. सभी एक जैसा बिल दे रहे थे लेकिन कुछ लोगों को पानी ज्यादा मिल रहा था और बाकियों को कम.

फिर 2018 में सरकार ने एक नई योजना शुरू की, जिसके तहत बंटवारे के लिए अलग पाइपलाइन लगाई गई. हर किसान को अपनी पाइपलाइन मिली और उस पर एक मीटर लगाया गया, जो पानी की मात्रा मापता है. यानी जितना पानी प्रयोग किया, उतना बिल. उसके बाद से मूगो को बराबर और नियमित पानी मिलने लगा. अब वह ना सिर्फ गोभी, फल और टमाटर की खेती कर रही हैं बल्कि अपने तीन बच्चों को शहर में पढ़ाने लायक कमाई कर पा रही हैं. वह बताती हैं, "मेरे पास बेचने के लिए थोड़ी सब्जियां बच जाती हैं, कुछ पैसा मैं बचा लेती हूं."

सिंचाई के लिए घटता पानी

सिंचाई के पानी की समस्या से दुनियाभर के किसान जूझ रहे हैं. ज्यादातर किसान बारिश पर निर्भर रहते हैं जिसके अनियमित होने के कारण हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है. जलवायु परिवर्तन ने यह अनियमितता और अनिश्चितता और बढ़ाई है. इस कारण सिंचाई के अतिरिक्त साधनों की जरूरत और मांग भी बढ़ी है, ताकि फसलों को नुकसान ना हो.

लेकिन इन सिंचाई साधनों का सावधानीपूर्वक योजनाबद्ध इस्तेमाल सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी हो गया है ताकि किसान जरूरत से ज्यादा पानी इस्तेमाल अथवा बर्बाद ना करें. विश्लेषक कहते हैं कि इससे कुछ किसानों को तो पानी मिल जाता है लेकिन अक्सर ज्यादातर किसान कम पानी पाने को मजबूर रहते हैं.

कियारूतारा-रेजिया सिंचाई योजना में लगाए गए पानी के मीटरों ने एक समाधान उपलब्ध करवाया है. इस परियोजना की संयोजक फातिह एम लिविंगस्टोन कहती हैं, "इलाके में पानी की हर बूंद कीमती है." यह इलाका पानी की भारी कमी से जूझता है और सूखे मौसम के दौरान किसानों को हर बूंद के लिए संघर्ष करना पड़ता है.

इस सरकारी योजना को इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चरल डेवेलपमेंट से भी मदद मिली है. इस परियोजना के जरिए 55 योजनाओं को चलाया जा रहा है जिन्हें समुदायों के लोग खुद चला रहे हैं. लिविंगस्टोन बताती हैं कि 2012 में यह सिंचाई परियोजना शुरू हुई थी जिसके तहत 6,200 एकड़ जमीन को सिंचित किया गया है. फिलहाल, करीब एक चौथाई योजनाओं में ही मीटर लगाए जा सकेंगे जबकि बाकियों में मीटर लगाने का काम चल रहा है. लेकिन नतीजे नजर आने लगे हैं.

लिविंगस्टोन बताती हैं, "यह देखना सुखदायक है कि एक बुजुर्ग दादी अपने घर की बगिया से मामूली खर्च पर घर की जरूरत लायक सब्जियां और फल पा रही है. और एक व्यवसायिक किसान खुश है कि उसके खेत के उत्पाद आराम से खर्च निकाल पा रहे हैं. दोनों आश्वस्त हैं क्योंकि पानी की सप्लाई पर भरोसा कर सकते हैं."

कम बर्बादी, ज्यादा मुनाफा

मुरांगा काउंटी में 3,18,000 घर हैं जिनमें से तीन चौथाई का मुख्य रोजगार कृषि है. केन्या ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक यहां कॉफी से लेकर आम, जौ और आवाकाडो आदि उगाए जाते हैं. लेकिन सरकार का अनुमान है कि इलाके की करीब 20 प्रतिशत आबादी के पास समुचित भोजन उपलब्ध नहीं है और वे संपूर्ण पोषण नहीं पा रहे हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी मुख्य वजह बारिश की अनियमितता और सूखे मौसम का लंबा खिंचना है, जिसके कारण पानी की समस्या बनी रहती है. केन्या के जल एवं सिंचाई मंत्रालय के इंजीनियर थॉमस मिलेवा कहते हैं कि पानी के मीटर लगाने से बर्बादी को आधा किया जा सकता है.

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जिन किसानों ने मीटर व्यवस्था को स्वीकार किया है, वे अब 10 घन मीटर पानी के लिए 250 शिलिंग यानी लगभग 150 भारतीय रुपये दे रहे हैं. उसके बाद हर एक घन मीटर पर 30 अतिरिक्त शिलिंग देने होते हैं. योजना में शामिल एक किसान वांबुरी मूरिरा कहते हैं कि अब पहले वह दिन रात सिंचाई करते थे और पानी की मात्रा का कोई हिसाब ही नहीं था.

वह कहते हैं, "क्योंकि कोई सीमा नहीं थी तो हम हर वक्त बेहिसाब सिंचाई करते थे. लेकिन मीटर आने के बाद रवैया बदला है. अब हमें समझ आया है कि पानी बचाने से पैसा भी बचता है और निचले इलाकों में रहने वालों तक पानी भी पहुंचता है. जितना मैं इस्तेमाल करता हूं, उतना पैसा देने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है."

वीके/एए (रॉयटर्स)

Source: DW

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