देश में दूध के बंपर उत्पादन ने बढ़ाई डेयरी कंपनियों की मुश्किल, स्किम्ड मिल्क पाउडर के बढ़ते स्टॉक से टेंशन बढ़ी

जिस तरह के हालात सामने आए है उस पर काबू पाने के लिए एसएमपी की खेप का निर्यात जरूरी हो गया है। जल्दी ही एसएमपी की खेप का निर्यात नहीं हुआ तो कीमतें और कम हो सकती हैं

नई दिल्ली। स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी) का उत्पादन खपत से अधिक रहने से भारतीय दुग्ध उद्योग के लिए खतरा पैदा हो गया है। एसएमपी का भंडार मार्च तक बढ़कर 2 लाख टन पहुंच सकता है। दूसरी तरफ दुग्ध सहकारी इकाइयों के पास पहले ही 20 प्रतिशत अधिक दूध की मात्रा आ रही है, लेकिन इन्हें एसएमपी में तब्दील करने की उनकी क्षमता पर्याप्त नहीं है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि किसानों को मिलने वाला खरीद मूल्य औसतन 20 प्रतिशत कम हो गया है।

 एसएमपी की खेप का निर्यात जरूरी

एसएमपी की खेप का निर्यात जरूरी

जिस तरह के हालात सामने आए है उस पर काबू पाने के लिए एसएमपी की खेप का निर्यात जरूरी हो गया है। जल्दी ही एसएमपी की खेप का निर्यात नहीं हुआ तो कीमतें और कम हो सकती हैं। दुग्ध सहकारी संस्थानों ने सरकार से एसएमपी खरीदने या निर्यात सब्सिडी देने की मांग की है। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार एसएमपी खरीद सकती है और इसे मदद योजना के तहत सार्क देशों को भेज सकती है। कुल मिलाकर दुग्ध उद्योग की हालत खस्ता है और जल्दी से कोई समाधान नहीं निकला तो दूध उत्पादकों को तगड़ी चोट पहुंच सकती है।

अगले सत्र में दूध उत्पादन पर बुरा असर पड़ सकता है

अगले सत्र में दूध उत्पादन पर बुरा असर पड़ सकता है

हालात ऐसे ही रहे तो अगले सत्र में दूध उत्पादन पर बुरा असर पड़ सकता है और किसान इससे आहत होकर दुग्ध उद्योग से मुंह मोड़ सकते हैं। गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ के एमडी आर एस सोढ़ी कहते हैं, 'स्थिति से निपटने के लिए हमने सरकार से निर्यात सब्सिडी की मांग की है। सब्सिडी नहीं मिलने की स्थिति में हमने कम से कम 20,000 से 30,000 टन एसएमपी का भंडारण करने का आग्रह किया है। यह भंडार गरमी के मौसम में खप सकता है।'

निजी डेयरी कंपनियों ने अतिरिक्त दुग्ध खरीदना बंद किया

निजी डेयरी कंपनियों ने अतिरिक्त दुग्ध खरीदना बंद किया

संगठित दुग्ध उत्पादन क्षेत्र से सहकारी इकाइयां 40-60 प्रतिशत तक दूध खरीदती हैं। वे 20 प्रतिशत तक अधिक दूध ले रही हैं और राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ये इकाइयां सर्दी में सामान्य मात्रा से 30 प्रतिशत तक अधिक दूध खरीद रही हैं। सोढ़ी ने कहा कि निजी इकाइयों ने दूध खरीदना बिल्कुल बंद कर दिया है क्योंकि उन्हें यह व्यावसायिक तौर पर फायदेमंद नहीं दिखाई देता है। पिछले एक महीने में घी की कीमतें भी प्रति टन 100 रुपये कम हो गई हैं।

कर्नाटक सरकार देती है सब्सिडी

कर्नाटक सरकार देती है सब्सिडी

कर्नाटक सरकार किसानों को 5 रुपये प्रति लीटर सब्सिडी देती है। कर्नाटक मिल्क फेडेरेशन (केएमएफ) को इस समय 72 लाख लीटर प्रति दिन दूध मिल रहा है, जबकि दूध की बिक्री 32 लाख लीटर प्रति दिन है। शेष 40 लाख लीटर प्रति दिन मात्रा बाजार में जिंस (एसएमपी) या लिक्विड मिल्क (दूध) के रूप में आता है। अतिरिक्त दूध की आवक से केएमएफ चेन्नई, मुंबई और हैदराबाद के बाजारों में दूध की आपूर्ति कर रहा है। जानकारों का कहना है कि पिछले साल केएमएफ ने किसानों को 23 रुपये प्रति लीटर का भुगतान किया था। केएमएफ को 5 रुपये प्रति लीटर सब्सिडी सरकार से मिली थी। हालांकि महाराष्ट्र में कारोबारी को उत्पाद बेचने के लिए केएमएफ से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। केएमएफ के लिए खरीद मूल्य 18 रुपये प्रति लीटर रह जाता है क्योंकि शेष रकम सब्सिडी के तौर पर मिल जाती है। आपको बता दें कि देश में एसएमपी भंडार का मूल्य 1,600 करोड़ रुपये से 2,000 करोड़ रुपये के बीच है।

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