बदायूं में एक महिला का दावा 'दिया कुत्ते को जन्म', भैरव बाबा का रूप बताकर लोगो की आस्था से खिलवाड़
किसी भी कार्य के परिणामों से अपरिचित होते हुए भी उस पर आँख मूंदकर विश्वास करना या जो तर्क के बिना मान लिया गया विश्वास हो 'अंधविश्वास' कहलाता है। "बिना सोचे-समझे किया जाने वाला विश्वास अथवा स्थिर किया हुआ मत अंधविश्वास है। भारत में कई ऐसी घटनाए देखने को अक्सर मिलती है जिनका आधार अंधविश्वास होता है। ऐसी ही एक हैरान करने वाली घटना उत्तर प्रदेश के बदायूं से सामने आई है जिसमे एक महिला ने कुत्ते के बच्चे को जन्म देने का दवा किया और फिर उसे भैरव बाबा का रूप बताकर लोगों से चढ़ावा भी लेना शुरू कर दिया।

महिला ने कुत्ते को दिया जन्म
दरअसल पूरा मामला उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले के तहसील क्षेत्र के ग्राम जामुनी का है। एक महिला ने दावा किया है कि उसने अपनी कोख से एक कुत्ते को जन्म दिया है। महिला ने बताया की 17 साल पहले से मेरे पेट में एक गांठ थी। जब में सोती थी तब मुझे सपने में भैरव बाबा दिखाई देते थे और कहते थे कि में कुत्ते के रूप में जन्म लूंगा। फिर 17 माह बाद उन्होंने कुत्ते को जन्म भी दिया। पूछने पर मुंशीलाल ने बताया कि मेरी पत्नी ने अपनी कोख से भैरव बाबा को एक कुत्ते के रूप में जन्म दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि भैरव बाबा लगातार सपने में आते थे और कहते थे कि में जन्म लूंगा लेकिन गाय के दूध का सेवन करूंगा। इसीलिए कुछ लोग उस कुत्ते की दूध पिलाकर सेवा कर रहे हैं। दूसरी ओर चर्चा है कि अभी तक तो किसी भी महिला ने इस तरह कुत्ते को जन्म नहीं दिया है इसलिए ज्यादातर लोग भ्रमित स्थिति में है। मामला अपनेआप में एक संदेह पैदा करता है कि क्या यह कुदरती रूप से किसी भी तरह संभव है भी या नहीं?
तस्वीरों में साफ़ देखा जा सकता है कि कुत्ते का बच्चा एक आम कुत्ते के बच्चे की तरह पूर्णता कुत्ते के ही समान है, इसमें एक भी प्रतिशत इंसानों जैसे कोई लक्षण नहीं हैं। देखने भर से ही साफ़ समझ आ रहा है कि यह मात्र एक झूठ है फिर भी लोगों की भीड़ इस 'कुदरत के करिश्मे' को देखने के लिए उमड़ पड़ी है और लोग खूब चढ़ावा भी चढ़ा रहे हैं। कुत्ते और महिला दोनों की पूजा भी कर रहे हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वैज्ञानिक दृश्टिकोण से देखें तो यह असंभव है कि किसी इंसान और कुत्ते के सम्भोग से कोई बच्चा पैदा किया जा सके। हम सभी एक ही प्रकार की सामग्री के विभिन्न संयोजनों से बने हैं, जैसे प्रोटीन और अमीनो एसिड, हमारे जीन और डीएनए। दो जीवों के डीएनए मिलकर एक नया संयोजन बनाते हैं और तब जाकर एक बच्चा जन्म ले पाता है। परन्तु यह प्रक्रिया एक ही प्रजाति के दो जीवों के डीएनए से मिलकर ही संभव हो पाती है। अलग अलग प्रजाति के जीव मिलकर एक नया संयोजित डीएनए नहीं बना सकते। मनुष्य में 46 गुणसूत्र (23 जोड़े) और कुत्तों में 78 (39 जोड़े) होते हैं। यदि गुणसूत्रों के ये सेट पार करने और नए डीएनए बनाने का प्रयास करते हैं, तो कुत्ते और मानव से 23 मिलान के बाद, कुत्ते के पास अतिरिक्त 16 जोड़े होते हैं। वे 16 जोड़े यूं ही गायब नहीं होते हैं। भ्रूण को कुत्ते के आधे डीएनए के लिए सिर्फ 2/3 लक्षण नहीं मिलते हैं और यह जोड़ी बनाने में विफल रहता है और कुछ नहीं होता है।

अंधविश्वास से बचना होगा
कुछ अंधविश्वास लोगों के व्यक्तिगत जीवन तक ही सीमित है जैसे 'बिल्ली को देखकर रास्ता बदलना' आदि। लेकिन कुछ अंधविश्वास ऐसे हैं जिनकी एक सभ्य समाज में बिलकुल भी इज़ाज़त नहीं होनी चाहिये जैसे 'बलि प्रथा' आदि। अल्पावधि सुधारों के लिये हमें ऐसे कानूनों की आवश्यकता है जो इन कुरीतियों के अंत में सहायक हो और दाभोलकर जैसे तर्कवादियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता हो। जबकि दीर्घकालिक सुधार हेतु शिक्षा, तर्कसंगत सोच और वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देना होगा। संविधान की वह धारा 51-ए में मानवीयता एवं वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देने में सरकार के प्रतिबद्ध रहने की बात की गई है और यह सुनिश्चित की जानी चाहिये। साथ ही ज़रूरत यह भी है कि अंधविश्वासों को 'परंपराओं और रीति-रिवाज़ों' से अलग रखा जाए, क्योंकि ये किसी देश के लोकाचार को प्रतिबिंबित करती हैं और अक्सर समाज के उत्थान में सहायक होती हैं।
यह याद रखना उचित है कि इस सामाजिक मुद्दे से निपटने के लिये कानून लाने का मतलब केवल आधी लड़ाई जीतना होगा। सूचना अभियानों के माध्यम से इस तरह की प्रथाओं से जुड़े मिथकों को दूर करने के लिये समुदाय/धार्मिक विद्वानों को शामिल करके जनता के बीच जागरूकता बढ़ाकर सुधार किये जाने की आवश्यकता है।












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