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विश्व अस्थमा दिवस: 16 साल के रोहन कैसे लड़ रहे हैं इस बीमारी से

ग्लोबल अस्थमा रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 3.5 करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं. डॉक्टर बताते हैं कि अस्थमा की स्थिति किसी भी उम्र में शुरू हो सकती है.

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''मुझे ये बिल्कुल महसूस नहीं होता कि मैं अस्थमा का मरीज़ हूँ. आपको ख़ुद को प्रेरित करना चाहिए कि आपको इससे लड़ना है.''

ये शब्द हैं ग़ाज़ियाबाद में रहने वाले 16 साल के रोहन सक्सेना के, जो 11वीं कक्षा में पढ़ते हैं

रोहन के लिए अस्थमा से लड़ाई लड़ना आसान नहीं था. उनके जीवन में कई बार ऐसे पल आए, जब उन्हें अस्थमा के अटैक पड़े और अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ा.

वे बताते हैं, ''मुझे मेरे पेरेंट्स ने अस्थमा के बारे में तो बताया था, लेकिन मैंने कभी महसूस नहीं किया. शायद पाँचवी कक्षा में फिज़िकल डेवलप्मेंट की क्लॉस में जब भागना पड़ा, तो मुझे साँस लेने में परेशानी हुई. टीचर ने तुरंत मेरे पैरेंट्स को बुलाया.''

रोहन कहते हैं कि उन्हें आपातकालीन स्थिति के लिए इन्हेलर लेने और एलर्जी की दवा खाने को कहा गया, जो उन्होंने क़रीब आठ साल तक ली.

रोहन की माँ रेशमा सक्सेना कहती हैं- रोहन जब दो ढ़ाई साल का था, तो डेढ़ साल के अंतराल पर ही हमें उसे दो बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. अब भी जैसे ही हमें स्कूल से फ़ोन आता है, हम तुरंत भागते हैं. एक डर हमेशा रहता है.

उनके अनुसार, ''जब भी प्रदूषण बढ़ने लगता है, मैं अपने बच्चों को लेकर चिंतित हो जाती हूँ.''

ब्यूटिक का काम करने वाली रेशमा सक्सेना कहती है, ''मैं और मेरे दोनों बेटों को अस्थमा है. हमें बहुत ख़्याल रखना पड़ता है. प्रदूषण, एलर्जी, डस्ट या किसी तरह के स्ट्रेस से क्योंकि यही उसके ट्रिगर प्वाइंट होते हैं.''

भारत में अस्थमा के मामले

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रेशमा जैसे कई लोग हैं, जो अस्थमा या दमा से पीड़ित हैं.

हालाँकि डॉक्टर अस्थमा को कोई बीमारी मानने की बजाए एक स्थिति बताते हैं, जिसमें मरीज़ को साँस लेने में दिक़्क़त आती है.

सर गंगाराम अस्पताल में छाती रोग विशेषज्ञ डॉ अभिनव गुलियानी कहते हैं, ''अस्थमा की स्थिति किसी को किसी भी उम्र में शुरू हो सकती है. इसमें साँस के रास्ते में या साँस की नली में किसी प्रकार की हवा या कण की वजह से सूजन आ जाती है, जिससे हवा की आवाजाही में परेशानी आती है. ये एक तरह की एलर्जी होती है.''

ग्लोबल अस्थमा रिपोर्ट 2022 के मुताबिक़ भारत में तीन करोड़ पचास लाख लोगों को अस्थमा है.

अस्थमा के लक्षण

  • साँस लेने के दौरान सीटी बजने जैसी आवाज़ आना
  • साँस उखड़ना
  • छाती में जकड़न महसूस करना
  • खाँसी होना

जब ये लक्षण बिगड़ने लगते हैं, तो अस्थमा का अटैक आता है.

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अस्थमा से जुड़ी चुनौतियाँ

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वहीं डॉक्टर वेद प्रकाश अस्थमा से जुड़ी एक और बात पर ध्यान दिलाते हैं.

वे अस्थमा से जुड़ी चुनौतियों के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि अस्थमा एक ऐसी स्थिति है जिसे पहचानने में लोगों को वक़्त लगता है और वो इस बीमारी से निपटने के लिए घरेलू नुस्ख़े अपनाते रहते हैं.

वे बताते हैं कि इस बीमारी को लेकर लोगों में जागरूकता भी कमी है. ऐसे में अस्थमा के मामले ज़्यादा हैं क्योंकि अभी भी लोगों को इस बीमारी के बारे में ज्ञान नहीं है.

डॉ वेद प्रकाश लखनऊ में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में प्लमनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन के प्रमुख हैं.

इसी बात पर अपनी सहमति जताते हुए डॉ अभिनव गुलियानी कहते हैं कि उनके पास कई ऐसे में मरीज़ आते हैं, जो घरेलू इलाज करते हैं और उन्हें ये डर होता है कि उन्हें इन्हेलर की आदत पड़ जाएगी.

वे बताते हैं कि अस्थमा की दो स्थिति होती हैं - एक हल्का अस्थमा और दूसरा गंभीर.

अगर किसी को हल्का अस्थमा है, तो ऐसे में मरीज़ को साल में एक-दो बार छाती में जकड़न महसूस हो सकती है या साँस लेने में तकलीफ़ हो सकती है.

वहीं गंभीर अस्थमा के मामले सात या आठ फ़ीसदी ही होते हैं और दवा लेने के बावजूद वो नियंत्रण में नहीं आता है. उस पर ध्यान देने की ज़रूरत है और इनके लिए नए इलाज भी सामने आ रहे हैं.

डॉ अभिनव गुलियानी कहते हैं, ''कई बार स्थिति ख़तरनाक हो जाती है जबअस्थमा तेज़ी से बढ़ता है. अगर इतना बढ़ जाए कि साँस के रास्ते में ही रूकावट आ जाए, तो मरीज़ की मौत भी हो सकती है.

डॉक्टर अस्थमा के शिकार मरीज़ों को सलाह देते हैं कि वे धूल से बचें, प्रदूषण के दौरान मास्क का इस्तेमाल करें और मौसम बदलने से पहले दवा लेना शुरू कर दें और हमेशा इन्हेलर रखें.

अस्थमा बचपन से लेकर बुढ़ापे में कभी भी हो सकता है और कई कारण होते हैं, जो मरीज़ के शरीर पर अधिक प्रभाव डाल सकते हैं, जिसे वो ट्रिगर प्वॉइंट बताते हैं.

में शामिल हैं-

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रोहन सक्सेना के लिए ट्रिगर प्वॉइंट स्ट्रेस या तनाव था और एलर्ज़ी की दवा उन्हें और प्रभावित करती थी.

जैसे उन्हें सुबह उठने में परेशानी होती थी. धीरे-धीरे उन्होंने इससे पिंड छुड़ाने की कोशिश की.

वे बताते हैं, ''मैंने नौंवी कक्षा में एलर्जी की दवा छोड़ दी, मुझे कोई परेशानी महसूस नहीं हुई और अपने पैरेंट्स को भी बताया. एक हफ़्ते के बाद जब डॉक्टर के पास गए तो उन्होंने केवल आपात स्थिति में ही लेने को कहा. मैं जब 10वीं में गया, तो मुझे एग्ज़ाम को लेकर स्ट्रेस हुआ.''

''मेरी माँ ने मुझे दवा लेने को कहा. मैंने दो एग़्जाम में दवा ली, फिर मुझे लगा कि मैं वापस लौट रहा हूँ. मैंने खुद को समझाया हालाँकि मेरी मम्मी ने कहा कि तुम दवा ले लो. लेकिन मैंने ख़ुद को मोटिवेट किया और बिना दवा लिए एग्ज़ाम दिए. लेकिन साँस उखड़ने पर मैं इन्हेलर का इस्तेमाल करता हूँ.''

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रोहन जिस इन्हेलर की बात कर रहे हैं, दरअसल वो एक उपकरण होता है जिसमें दवा डाली जाती है, जो साँस के ज़रिए अंदर जाती है और साँस के रास्ते में जो रुकावट होती है वो उसे खोलने में मदद करता है या वहाँ सूजन को कम करता है.

रोहन अपने पास इन्हेलर हमेशा रखते हैं और अपने स्ट्रेस को कम करने के लिए खाना भी बनाते हैं, वहीं ख़ुद को फ़िट रखने के लिए जिम भी जाते हैं.

डॉ वेद प्रकाश बताते हैं कि अस्थमा का भार अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, जिसमें बच्चों का स्कूल न जाने से लेकर लोगों का नौकरी पर ना जा पाना शामिल है.

वे बताते हैं, ''पहले ये देखा जाता था कि एलर्जी जैसी समस्याएँ विकसित देशों में ज़्यादा देखने को मिलती थीं लेकिन हाल में आई रिपोर्टों के अनुसार निम्न और मध्य आय वाले देशों में अस्थमा के मामले बढ़े हैं. जिसका उल्लेख ग्लोबल अस्थमा रिपोर्ट में भी मिलता है.''

डॉक्टरों के अनुसार दवा लेकर अस्थमा पर नियंत्रण पाया जा सकता है और कई ऐसे एथलीट, फिल्म अभिनेता और अभिनेत्रियाँ हैं, जिन्हें अस्थमा है लेकिन वो सब काम करते हैं.

ऐसे में आपको अपने लक्षणों की तरफ ध्यान देना है कि वो किस मौसम या स्थिति में आपको परेशान ज़्यादा करता है और उसी के मुताबिक़ इलाज कराना है.

उदाहरण के तौर पर अगर अप्रैल के महीने में आपको लगे कि आपको अस्थमा की शिकायत ज़्यादा हो रही है, तो दवा पहले से लेना शुरू कर दें.

उसके बाद आपको ये महसूस हो सकता है कि अस्थमा था ही नहीं.

ऐसे में आप इस स्थिति पर कंट्रोल पा सकते हैं, इसे ख़त्म नहीं किया जा सकता.

जाँच नियमित तौर पर कराते रहे और फेफड़ों को फुलाने, कसरत और लाइफ़स्टाइल को बेहतर करने पर ध्यान दें.

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