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आखिर जानवरों की तरह कान क्यों नहीं हिला पाते इंसान? नहीं पता होगी ये वजह

Why can't humans move their ears: आपने देखा होगा कि जानवर अपने कान हिला पाते हैं। गाय भैंस की बात करें तो वे अकसर अपने कान हिलाते हैं। ताकि मक्खी, मच्छरों को दूर भगा सकें। जानवरों के पास इंसानों की तरह हाथ पैर हैं और हम जानवरों से कई मायनों में समान हैं तो ऐसे में हम उनकी तरह अपने कान क्यों नहीं हिला पाते। अगर कोशिश करते भी हैं तो ऐसा लगता है मानो हमारा अपने कानों पर कोई कंट्रोल ही नहीं है।

इंसान जानवरों की तरह अपने कान नहीं हिला सकता। मगर जानवर हिला सकते हैं और इसकी पीछे की वजह ऑरिकुलर मसल्स होती हैं। इंसानों में ये मसल्स अविकसित या यूं कहें कि इन्होंने काम करना ही बंंद कर दिया है। जानवरों की बात करें तो इनके कान बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। ये कानों से खतरे का अहसास करने से लेकर अपनी भावनाओं को व्यक्त तक कर सकते हैं।

humans move their ears

इंसानों में कानों की गतिशीलता की कमी हमारी देखने और अन्य इंद्रियों पर निर्भरता भी हो सकती है। इस विकास ने कान हिलाने की जरूरत को कम जरूरी बना दिया है। जिसके चलते हमारी कानों की मांसपेशियां किसी काम की नहीं हैं। वहीं इसके विपरीत खरगोश और हिरण जैसे जानवर जिंदा रहने के लिए अपने कानों पर ही निर्भर हैं। उन्होंने अपनी इस क्षमता को बनाए रखा है।

दिलचस्प बात ये है कि मानव आबादी का एक छोटा हिस्सा अभी भी कुछ हद तक अपने कान हिला सकता है। ये मामूली हरकत आमतौर पर तीन कर्णपेशियों में से एक या अधिक पर नियंत्रण के कारण होती है। हालांकि, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि इससे सुनने की क्षमता भी बढ़ जाएगी।

मानव कान की शारीरिक रचना में तीन कर्णपेशियाँ शामिल हैं: अग्र, श्रेष्ठ और पश्च। कान हिलाने की क्षमता वाले जानवरों में ये मांसपेशियां दिमाग के मोटर कॉर्टेक्स द्वारा कंट्रोल होती हैं जो मांसपेशियों को संकेत भेजती हैं, जिससे वे कानों को ध्वनियों की ओर उन्मुख कर पाती हैं। मनुष्यों में ये मांसपेशियाँ मौजूद तो होती हैं लेकिन अविकसित होती हैं और प्रभावी ढंग से काम करने के लिए जरूरी तंत्रिका कनेक्शन की कमी होती है।

ये विकासवादी मार्ग इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे मानव विकास ने कुछ विशेषताओं को दूसरों पर प्राथमिकता दी है, जिसके कारण कुछ क्षमताएं, जैसे कि कान की हरकत, खो गई हैं, जबकि नई क्षमताएं, जैसे कि हाथों से काम कर पाना मिली हैं। इंसानों की बदलती शारीरिक जरूरतों ने अपने आप को वातावरण के अनुकूल ढाल लिया है।

इंसानों की जानवरों की तरह अपने कान हिलाने में असमर्थता विकासवादी बदलावों का परिणाम है, जिसने कान की मांसपेशियों को अविकसित बना दिया है। जबकि ये विशेषता हमारे पूर्वजों में उपयोगी रही होगी, अन्य इंद्रियों और संचार विधियों के विकास ने इसे अप्रचलित कर दिया है।

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