सदियों से चला आ रहा है सांप-सीढ़ी का खेल, जानिये 'मोटपक्ष' से जुड़ी दिलचस्प बातें...

History of Saanp Seedhi: सांप सीढ़ी एक ऐसा खेल है, जिसका क्रेज न सिर्फ बच्चों बल्कि बूढ़ों में भी देखने को मिलता है। हालांकि, इंटरनेट के इस जमाने औऱ बदलते दौर में ऑनलाइन गेमिंग ने अपने पैर पसार लिए हैं, जिससे ये गेम कहीं छिप गए हैं लेकिन सांपसीढ़ी बचपन का एक पसंदीदा और मशहूर खेल हुआ करता था। इस गेम को तो सभी ने खेला होगा लेकिन बेहद कम ही लोग इसके इतिहास के बारे में जानते होंगे।

सांप औऱ सीढ़ी... सीढ़ियों और ढेरों छोटे-बड़े सांपों के खेल का नाम सांपसीढ़ी यूं ही नहीं पड़ा। हम देखते हैं कि पासे के नंबर इस बात का निर्णय करते हैं कि आप सीढ़ी चढ़कर ऊंचाइयों पर जाएंगे या आपको सांप डस लेगा। लेकिन इन ऊंचाईयों और नीचे गिरने वाले इस गेम का ये नाम बड़ा ही सोच समझकर रखा गया है।

Saanp Seedhi

दरअसल, पुराने वक्त में बच्चों को नैतिक शिक्षा देने के लिए इस खेल का इस्तेमाल किया जाता है। तब सांपों को अवगुणों का प्रतीक माना जाता था, वहीं सीढ़ियों को तरक्की और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। सीढ़िया यहां नैतिक और सद्गुणों का प्रतीक हुआ करती थीं।

दिलचस्प बात ये है कि पुराने समय में इस गेम को सांपसीढ़ी के नाम से नहीं बल्कि मोटपक्ष के नाम से जाना जाता था। मोटपक्ष में ही सीढ़ियों और सांपों को अलग अलग तरीके से परिभाषित किया गया था। मोटपक्ष खेलना बच्चों के नैतिक विकास के लिए बेहद अच्छा माना जाता था।

आजकल पुराने गेम्स की बात की जाए तो लूडो का क्रेज लोगों में हमेशा से ही देखने को मिलता रहा है। कोरोना काल में जिस एक गेम की चर्चा जोरों-शोरों पर थी वो था लूडो। लेकिन सांपसीढ़ी का खेल लूडे से ज्यादा आसान लगता था। क्योंकि इसमें ज्यादा दिमाग नहीं लगाना पड़ता। इस गेम में सारी बातें सिर्फ पासे के नंबर्स पर ही निर्भर करती हैं।

सांपसीढ़ी की शुरुआत 13वीं शताब्दी में हुई थी। इसे मोक्ष पटामु या फिर मोटपक्ष के नाम से लोग जानते थे। कई लोगों का मानना है कि ये खेल 13वीं शताब्दी में स्वामी ज्ञानदेव द्वारा बनाया गया था।

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