4.30 को कहते हैं साढ़े चार तो 2.30 को क्यों नहीं कहते हैं साढ़े ढाई ? जानिए क्या है यह लोचा

जब कोई वक्त देखना सीखता है तो उस वक्त हर किसी के दिमाग में एक सवाल जरूर आता है कि कि जब 10:30, 11:30, 12:30 को ‘साढ़े दस’, ‘साढ़े ग्यारह’ और ‘साढ़े बारह’ तो बोलते हैं मगर 1:30 को ‘साढ़े एक’ क्यों नहीं बोलते

नई दिल्‍ली, 30 नवंबर। बचपन में सभी को घड़ी की सुई देखकर उसमें टाइम बताना सिखाया जाता है। हालांकि जब कोई वक्त देखना सीखता है तो उस वक्त हर किसी के दिमाग में एक सवाल जरूर आता है कि जब 10:30, 11:30, 12:30 को 'साढ़े दस', 'साढ़े ग्यारह' और 'साढ़े बारह' तो बोलते हैं मगर 1:30 और 2:30 को भी 'साढ़े एक' और 'साढ़े दो' क्यों नहीं बोलते हैं ? आज हम आपको इसी सवाल का जवाब देने वाले हैं।

 सब कुछ भारतीय गिनती की है माया

सब कुछ भारतीय गिनती की है माया

भारतीय गिनती की ही देन है जिसके कारण बचपन में टाइम बताने में गलती हो जाती थी। भारतीय गिनती में ही 'साढ़े' (Saadhe), 'पौने' (Paune), 'सवा' (Sava) और 'ढाई' (Dhai) का प्रचलन है। जिसका इस्तेमाल वक्त देखने में किया जाता है। आपको बता दें ये सभी शब्द फ्रैक्शन में चीजों को बताने के लिए इस्तेमाल होते हैं।भोपाल समाचार वेबसाइट के अनुसार इस वक्त बच्चों को 2,3,4,5 के पहाड़े याद कराए जाते हैं लेकिन पिछली जनरेशन को 'चौथाई', 'सवा', 'पौने', 'डेढ़' और 'ढाई' के पहाडे़ भी पढ़ाए जाते थे।

 वक्त बचाने के लिए किया जाता है ऐसा

वक्त बचाने के लिए किया जाता है ऐसा

समय हर किसी का महत्वपूर्ण होता है इसलिए सिर्फ वक्त बचाने के लिए इन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे 'साढ़े एक' कहने ज्यादा आसान है 'डेढ़' या 'ढाई' कहना होता है। छोटे शब्दों में सब कुछ क्लिर होता है। जैसे जब घड़ी में 4 बजकर 45 मिनट होते हैं तो उसे आसन और कम शब्दों में पौने पांच कह देते हैं।

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    वजन में भी होता हैं इनका इस्तेमाल

    वजन में भी होता हैं इनका इस्तेमाल

    आपको बता दें कि हमारे देश में वजन को तौलने के लिए भी इन 'साढ़े' (Saadhe), 'पौने' (Paune), 'सवा' (Sava) और 'ढाई' शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। इतना ही नहीं बताया जाता है कि पुराने वक्त में ज्योतिषी भी इन शब्दों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं।

     सुई में होता था कन्फ्यूजन

    सुई में होता था कन्फ्यूजन

    बचपन में जब कोई पूछता था कि वक्त कितना हुआ है तो उस वक्त सबसे बड़ा कन्फ्यूजन यह होता था कि कौन सी घंटे वाली सुई है और कौन सी मिनट वाली हैं। कई बात बचपन में घंटे वाली सुई को मिनट वाली सुई समझ कर वक्त बता दिया करते थे। जिसके बाद समझाया जाता था कि छोटी सोई मिनट वाली होती है और बड़ी सुई घंटे वाली।

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