कोरोना वायरस: पुरुष मास्क पहनने से परहेज क्यों करते हैं?

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काफी बहस के बाद मोनिका ने आख़िरकार घर छोड़कर अपने मां-बाप के घर जाने का फैसला ले लिया. उनके पति इडुआर्डो लगातार मास्क पहनने से इंकार करते रहे हैं. इसलिए मोनिका ने फैसला लिया कि वो अपने सात साल के बेटे के साथ अपने मायके चली जाएंगी.

मोनिका ब्राज़ील की राजधानी रियो डि जेनेरियो के एक क़रीब के शहर नितेरोई में अपने परिवार के साथ रहती हैं. अमरीका के बाद ब्राज़ील दुनिया का दूसरा ऐसा देश है जहाँ कोरोना के संक्रमण से सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं.

मोनिका बीबीसी से कहती हैं, "मुझे अस्थमा है जो मुझे कोरोना के संक्रमण के अधिक जोखिम वाले दायरे में लाता है. लेकिन मेरे पति को लगता था कि मैं नाहक ही बहुत परेशान हो रही हूँ."

"उनका तर्क था कि उन्हें मास्क पहनने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि जब वो घर से निकलते हैं तब वो किसी बंद जगह पर नहीं जाते हैं. वो यह बात नहीं सोचते थे कि वो मुझे और मेरे बेटे को जोखिम में डाल रहे हैं."

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कोरोना से पुरुषों की मौत ज्यादा होने पर ही ये रवैया क्यों?

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जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आकड़ों के मुताबिक 9 जुलाई तक दुनिया भर में 1.2 करोड़ लोग करोनो से संक्रमित हो चुके हैं और जिसमें से साढ़े पांच लाख लोगों की मौत हो चुकी है. ज्यादातर देशों में जहाँ के आकड़े उपलब्ध है, मौत की दर पुरुषों में ज्यादा देखी गई है.

हालांकि अध्ययनों और सर्वे से पता चला है कि पुरुष महिलाओं की तुलना में सुरक्षात्मक उपकरणों और मास्क पहनने से परहेज कर रहे हैं. पिछली महामारियों के दौरान भी पुरुषों में यही रवैया देखा गया था.

कोरोना के संक्रमण से बचने के लिए मास्क पहनने की सलाह व्यापक तौर पर स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा दी गई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने भी कहा है कि "मास्क पहनना कोरोना के संक्रमण को बढ़ने से रोकने की एक व्यापक रणनीति है." हालांकि डब्लूएचओ ने कपड़े या फिर ग़ैर-मेडिकल मास्क के प्रभाव को लेकर कहा है कि इनका असर को लेकर पर्याप्त प्रमाण नहीं है, इसलिए जब सोशल डिस्टेंसिंग संभव नहीं हो तब ही इसका इस्तेमाल किया जाए.

पूर्वाग्रह का मामला

तो अगर मास्क की मदद से कोरोना के संक्रमण को कम किया जा सकता है तो फिर पुरुष इसे पहनने से परहेज क्यों करते हैं?

मिडलसेक्स यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के सीनियर लेक्चरर वैलेरियो कैपरैरो और बर्कले के मैथेमैटिकल साइंस रिसर्च इंस्टीट्यूट की कैनेडियन गणितज्ञ हेलेनी बार्सिलो का पुरुषों के व्यवहार को लेकर बहुचर्चित विश्लेषण प्रकाशित हुआ है.

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इन दोनों ही विशेषज्ञों ने अमरीका में रह रहे करीब 2,500 लोगों पर एक सर्वे किया और पाया कि पुरुष ना सिर्फ़ महिलाओं की तुलना में मास्क पहनने को लेकर हिचकते हैं बल्कि यह भी मानते हैं कि "यह कमजोरी की निशानी है और कूल नहीं है."

वैलेरियो कैपरैरो बताते हैं कि, "यह खासतौर पर उन देशों में रवैया है जहाँ चेहरा ढकना अनिवार्य नहीं किया गया है."

इस सर्वे में देखा गया है कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में दोगुनी संख्या में इस बात के समर्थन में थीं कि जब "वो घर से बाहर निकलेंगी तो मास्क पहनेंगी."

"पुरुषों का यह भी मानना था कि वो महिलाओं की तुलना में संक्रमण से कम प्रभावित होंगे. जबकि विडंबना यह है कि अधिकारिक आकड़े यह दिखाते हैं कि कोरोना वायरस वाकई में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में ज्यादा प्रभावित करते हैं."

दूसरे कुछ अध्ययनों में यह भी पता चला है कि पुरुष हाथ धोने को लेकर भी महिलाओं की तुलना में कम सकारत्मक रुख अपना रहे हैं. हाल में हुए पोल में यह बात सामने आई है कि 65 फ़ीसदी महिलाओं ने जहाँ माना है कि वो नियमित तौर पर हाथ धो रही है तो वहीं महज 52 फ़ीसदी पुरुषों ने हाथ धोने की बात मानी है.

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राजनीति से प्रभावित व्यवहार

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कैपरैरो और बार्सिलो का अध्ययन अमरीका में हुए सर्वे पर आधारित है. हाल के हफ्तों में यह साफ़ हुआ है कि महामारी के दौरान पुरुष और महिलाएँ कैसे व्यवहार करते हैं, ये राजनीति से बहुत गहरे से प्रभावित हो रहा है.

कई सर्वे में यह बात सामने आई है कि डोनाल्ड ट्रंप के रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों की तुलना में मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग के पालन में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं.

लेकिन इस मामले में भी जेंडर के आधार पर फर्क देखा गया है. रिपब्लिकन पार्टी की 68 फ़ीसद महिला समर्थकों ने घर से बाहर निकलने पर मास्क पहनने का समर्थन किया है जबकि सिर्फ 49 फ़ीसद पुरुषों ने इस पर हामी भरी है.

मास्क के इस्तेमाल से मौत के मामलों में कमी

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मास्क का महत्व उस वक्त और बढ़ गया जब यह बात सामने आई कि कोरोना वायरस हवा में पैदा हो सकता है और बड़े ड्रॉपलेट्स की तुलना में छोटे-छोटे कणों के माध्यम से भी फैल सकता है.

जापानी वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया है कि 22 देशों में मास्क के इस्तेमाल और मौत के आकड़ों में गहरा संबंध है.

शोध संस्थान यूगो के पोल के विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिक डाइसुके मियाजावा और जेन कैनेको यह पाया है कि जिन देशों में लोग मास्क का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनमें प्रति दस लाख पर मरने वालों की संख्या कम पाई गई है.

दिलचस्प तो यह है कि इन 22 देशों में जहाँ मृत्यु दर ज्यादा थी वहाँ कुछ देशों में पुरुषों को मास्क का कम इस्तेमाल करते हुए पाया गया है. इसमें एक ब्रिटेन भी शामिल है.

क्या पुरुष अति-आत्मविश्वास के शिकार हैं?

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यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोपेनहेगन में बिहैवियरल वैज्ञानिक क्रिस्टीना ग्रैवर्ट मास्क पहनने को लेकर पुरुषों और महिलाओं के बीच इस फर्क को देखकर हैरान नहीं हैं.

वो कहती है कि इस बात को लेकर बड़े पैमाने पर अध्ययन हुए है कि जोखिम भरे दौर में पुरुष और महिलाएँ कैसे अलग-अलग व्यवहार करते हैं.

वो बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि डेनमार्क की राजधानी में आप अराम से देख सकते हैं कि कैसे महिलाएँ कोरोना के संक्रमण को रोकने को लेकर किए जाने वाले प्रयासों को लेकर अधिक गंभीर हैं.

वो बताती हैं, "कोपेनहेगन में जब कोरोना के दौरान जब वन-वे स्ट्रीट खोल कर रखा गया ताकि लोगों को एक-दूसरे के चेहरे के सामने से ना गुजरना पड़े तब मैंने देखा कि ज्यादातर पुरुष महिलाओं की तुलना में गलत दिशा में चल रहे हैं."

पुरुषों और महिलाओं के व्यवहार में यह फर्क पिछली महामरियों के दौरान भी देखने को मिला था. मेक्सिको सिटी में हुए एक अध्ययन में यह बात देखी गई थी कि 2009 में स्वाइन फ्लू के संक्रमण के दौरान भी महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक मास्क का इस्तेमाल कर रही थीं.

एशियाई देशों में भी यह फर्क देखने को मिल रहा है जबकि मास्क पहनने को लेकर यहाँ सामाजिक तौर पर ज्यादा स्वीकार्य है. 2002-03 में सार्स के दौरान हॉन्ग कॉन्ग में देखा गया कि महिलाएँ हाथ धोने और मास्क पहनने जैसी सवधानियाँ पुरुषों से ज्यादा बरत रही हैं.

क्या वाकई में पुरुष लपरवाह हैं?

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अध्ययनों के अलावा जो क्रिस्टीना ग्रैवर्ट का निजी अनुभव है, वो इस बात कि तस्दीक करता है. कार का बीमा करने वाली कंपनियाँ महिलाओं से पुरुषों की तुलना में कम पैसे लेती है क्योंकि दुनिया भर में सड़क हादसों में ज्यादातर पुरुष ही शिकार होते हैं लेकिन इसके पीछे का एक विरोधाभास यह भी है कि दुनिया में महिलाओं की तुलना में ड्राइविंग करने वाले पुरुषों की संख्या ज्यादा हैं.

लंदन में रहने वाले शोधकर्ता वैलेरियो कैपरैरो भी मानते हैं कि वो मास्क पहनने को लेकर लपरवाह रहे हैं.

वो बताते हैं, "कुछ महीने पहले जब मैं इटली गया था तब से मैंने मास्क पहनना शुरू किया. वहाँ मास्क पहनना अनिवार्य था. मैं बहुत सावधानी बरत रहा था और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन कर रहा था. इसने मुझे मास्क नहीं पहनने को लेकर ख़ुद को सही ठहराने में मदद की."

हालांकि अब उनका मानना है कि मास्क पहनने को अनिवार्य करने से ज्यादा पुरुष इस सलाह को मानेंगे.

उनका कहना है कि, "अध्ययन यह दिखाते हैं कि दोनों जेंडर के बीच व्यवहार का यह अंतर उन जगहों पर उतना नहीं देखा गया है जहाँ मास्क पहनने को अनिवार्य कर दिया गया है."

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