मिठास के लिए आर्टिफ़िशियल शुगर का करते हैं इस्तेमाल तो ये ज़रूर पढ़ें
डब्लयूएचओ ने अपने नए दिशानिर्देशों में नॉन-शुगर स्वीटनर्स का इस्तेमाल न करने की सलाह दी है
भारत में घर आए मेहमानों से चाय-पानी पूछना आम बात है. मेहमान ने शरबत या लस्सी की जगह अगर चाय पीने की ख़्वाहिश जताई तो अगला सवाल उठता है कि चीनी कितनी चम्मच या फिर बिना चीनी के फीकी चाय.
आपने मेहमानों को यह कहते हुए अक्सर सुना होगा, "मैंने सेहत को देखते हुए चीनी लेना पहले ही छोड़ दिया है. आजकल मैं अपनी चाय या कॉफ़ी में केवल शुगर फ़्री का इस्तेमाल करती हूं."
लेकिन शक्कर छोड़कर शुगर फ़्री या आर्टिफ़िशियल स्वीटनर का इस्तेमाल करने से अगर आपको लगता है कि आपका वज़न कम हो जाएगा या फिर आप ज़्यादा फ़िट हो जाएंगे तो ऐसा नहीं है. ये कहना है विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लयूएचओ का.
क्या कहना है डब्लयूएचओ का?
संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी डब्लयूएचओ ने अपने नए दिशानिर्देशों में नॉन-शुगर स्वीटनर्स (एनएसएस) का इस्तेमाल नहीं करने की सलाह दी है. एनएसएस यानी ऐसी चीज़ें जो मिठास देती हैं लेकिन चीनी नहीं हैं.
डब्लयूएचओ ने ये सिफ़ारिश कुछ समीक्षाओं के आधार पर की है. समीक्षाओं में पाया गया है कि आर्टिफ़िशियल स्वीटनर वज़न घटाने या उससे संबंधित बीमारियों के ख़तरे को कम करने में मदद नहीं करते.
साथ ही यह भी पाया गया है कि चीनी की बजाए एनएसएस के इस्तेमाल से व्यस्कों या बच्चों को वज़न कम करने में लंबी अवधि में मदद नहीं मिलती है.
{image-"लोगों को चीनी के इस्तेमाल को कम करने के लिए अन्य विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए. जैसे फल या ऐसे खाद्य पदार्थ और पेय जिनमें प्राकृतिक मिठास हो.", Source: विश्व स्वास्थ्य संगठन, Source description: , Image: विश्व स्वास्थ्य संगठन hindi.oneindia.com}
डब्लयूएचओ के न्यूट्रिशन एंड फ़ूड सेफ़्टी के निदेशक फ्रांसेस्को ब्रांका का कहना है, "लोगों को चीनी के इस्तेमाल को कम करने के लिए अन्य विकल्पों के बारे में सोचना चाहिए. जैसे फल या ऐसे खाद्य पदार्थ और पेय जिनमें प्राकृतिक मिठास हो और उनमें अलग से मिठास नहीं डाली गई हो."
उनके अनुसार, "एनएसएस में कोई पौष्टिकता नहीं होती. लोगों को अपनी सेहत में बेहतरी लाने के लिए आहार में मिठास कम करने की शुरूआत जल्द कर देनी चाहिए."
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ऑर्टफ़िशियल स्वीटनर्स में क्या-क्या आता है?
एनएसएस का इस्तेमाल टूथपेस्ट, स्किन क्रीम और दवाओं में भी होता है, तो क्या हमें इन्हें भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए?
डब्लयूएचओ का कहना है कि उसकी सिफ़ारिश ख़ुद के केयर और साफ़ सफ़ाई के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों पर लागू नहीं होती.
आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले एनएसएस सुकरालोज़, एसपार्टेम, नीयोटेम और स्टीविआ हैं. सर गंगाराम अस्पताल में एंडोक्रोइनोलोजी और मेटाबॉलिज़म विभाग के डॉ सुरेंद्र कुमार कहते हैं कि ये सब आर्टिफ़िशियल स्वीटनर्स होते हैं. इनका इस्तेमाल एक दो हफ़्ते किया जाए तो ठीक है लेकिन इनके लंबे इस्तेमाल से विपरित असर होता है.
एक उदाहरण देते हुए वो कहते हैं, "स्टीविआ पौधे के पत्तों को सीधा मिठास के लिए इस्तेमाल किया जाए तो ठीक है लेकिन किसी भी प्रकार की प्रोसेस्ड फ़ॉर्म में यानी गोलियों के इस्तेमाल में ये हानिकारक होगा."
डायबीटिज़ से पीड़ित लोग इसका इस्तेमाल करते हैं, हमने इस बारे में भी डॉक्टर से सवाल पूछा.
सवाल: डायबीटिज़ के मरीज़ों के लिए चीनी की जगह ऐसे कृत्रिम मिठास वाली गोलियां लेना कैसा है?
डॉ सुरेंद्र कुमार: डायबीटिज़ वाले मरीज़ को एनएसएस किसी भी रूप में नहीं लेनी चाहिए. अगर कभी स्वाद के लिए लेना भी चाहते हैं तो काफ़ी नियंत्रित मात्रा में लें.
एनएसएस शरीर में कैसे काम करते हैं?
डॉ सुरेंद्र बताते हैं कि चीनी की तुलना में आर्टिफ़िशियल स्वीटनर्स 700 गुना ज़्यादा पावरफुल होते है. ये ब्रेन के एक हिस्से को प्रभावित करते हैं और इससे आपके मेटाबॉलिज़्म पर भी असर पड़ता है.
इसका असर ये होता है कि आप ज़्यादा खाने लगते हैं और उससे आपका वज़न बढ़ने लगता है. उसके बाद आपको अलग-अलग बीमारियां होने का ख़तरा बढ़ जाता है.
कौन-कौन सी बीमारियां होने लगती हैं?
डब्लयूएचओ के मुताबिक़ एनएसएस का लंबी अवधि तक इस्तेमाल करने से टाइप-टू डायबीटिज़ और दिल की बीमारी होने का ख़तरा रहता है. इसके अलावा इससे मौत की भी आशंका रहती है.
डॉ नीरू गेरा बताती हैं कि एनएसएस के इस्तेमाल से वज़न बढ़ेगा जिससे आपको बीपी, कोलेस्ट्रोल की समस्याएं होंगी और इससे दिल की बीमारियां होने का ख़तरा बढ़ेगा.
एनएसएस के इस्तेमाल से होने वाली अन्य बीमारियों के बारे में डॉ सुरेंद्र कुमार कहते हैं, "इनके लंबे समय तक के इस्तेमाल से डिप्रेशन, सिरदर्द, डायबीटिज़, दिल की बीमारी, ब्रैन एटैक और कैंसर होना का ख़तरा बढ़ जाता है."
वे बताते हैं कि लोग शुगर फ़्री समझकर आइसक्रीम या अन्य खाद्य पदार्थ खाने लगते हैं लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि वो कैलोरिज़ तो खा ही रहे हैं. उन्हें ये समझना चाहिए कि ये सब पदार्थ ज़ीरो कैलोरी नहीं हैं.
वहीं गर्मी में लोग डाइट कोला पीते हैं लेकिन उसमें फ़ॉस्फ़ोरस होता है जिसका असर किडनी पर होता है.

चीनी कितनी खा सकते हैं?
डॉक्टरों का कहना है कि मीठा खाने से आपको ख़ुशी मिलती है जिससे तनाव कम होता है लेकिन आप वो मात्रा में मीठा खा रहे हैं ये जानना अहम है.
डॉटर संतुलित मात्रा में चीनी खाने की सलाह देते हैं और इसके अलावा विकल्प के तौर पर ब्राउट शुगर, मैपल सिरप, शहद, गुड़, शक्कर खाने की सलाह देते हैं.
उनके अनुसार, "अगर आप हर खाद्य पदार्थ में चीनी खाएंगे तो उससे शरीर में उसका स्तर बढ़ेगा. आप चाय, कॉफ़ी पीने से पहले मुंह के कोने में थोड़ी सी चीनी दबा लें और फिर फीकी चाए पी लें."
वो कहते हैं, "अगर ऐसा आप किसी भी खाने से पहले कर सकते हैं तो आप उसे नियंत्रित स्तर पर खा पाएंगे और पूरा स्वाद भी आएगा."
वहीं गुड़ लेते समय इस बात का ध्यान रखें कि उसे मुंह में डालकर चबाएं नहीं बल्कि उसे चूस कर खाएं. इससे एक फ़ायदा यह होगा कि आप बार-बार गुड़ नहीं खाएंगे और मुंह में देर तक रहने से आप मिठास का आनंद ले पाएंगे. इससे और खाने की इच्छा नहीं होगी.
डॉक्टरों के अनुसार चीनी एक तरह से ख़ुशी का एहसास देती है लेकिन जैसे ही इसका सेवन आप ज़रूरत से ज़्यादा करेंगे वो आपके शरीर के लिए कड़वी बन जाएगी.
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