Prashant Kishor News: PK ने क्यों बनाई नई पार्टी? 'जन सुराज' ही क्यों रखा नाम? जानें पर्दे के पीछे का सच

Prashant Kishor News: बिहार की सियासत में मंगलवार (दो अक्टूबर 2024) को बड़ी हलचल मच गई। जब भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण चुनावी रणनीतिकार के रूप में प्रख्यात प्रशांत किशोर ने अपनी नई पार्टी 'जन सुराज' का ऐलान किया। बिहार की राजनीति में बदलाव की चाह रखने वाले प्रशांत किशोर ने इस पार्टी का गठन क्यों किया और उन्होंने इसे 'जन सुराज' नाम ही क्यों दिया, इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है।

जब प्रशांत किशोर ने 2022 में बिहार के गांव-गांव जाकर पदयात्रा शुरू की थी, तब बहुत कम लोग उन्हें गंभीरता से ले रहे थे। लेकिन अब, जब 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, उनकी पार्टी और उनकी रणनीतियों पर न केवल आम जनता बल्कि बड़े राजनीतिक दलों की भी नजर है।

Prashant Kishor Jan Suraaj Party Bihar

क्यों बनाई 'जन सुराज' पार्टी ? (Why Prashant Kishor form New Party)
प्रशांत किशोर ने 'जन सुराज' का गठन उन लोगों की आवाज बनने के लिए किया है, जो मौजूदा राजनीति से असंतुष्ट हैं। मीडिया में दिए गए कई इंटरव्यू में प्रशांत ने बताया कि बिहार के लोग लंबे समय से लालू यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं के विकल्प की तलाश कर रहे थे। उन्होंने दावा किया कि पार्टी उन लोगों ने बनाई है, जो पिछले 30-35 सालों से किसी ठोस विकल्प का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने खुद को इस प्रक्रिया में सिर्फ एक कुम्हार की तरह बताया, जिसने मिट्टी को इकट्ठा कर उसे एक रूप दिया।

'बिहार में बदलाव की चाह बहुत गहरी'
प्रशांत किशोर ने यह भी कहा कि वह पिछले दो सालों में बिहार के कई गांवों में घूमे और लोगों से जुड़े। उनकी पदयात्रा के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि बिहार में बदलाव की चाह बहुत गहरी है। उनका दावा है कि 'जन सुराज' पार्टी का गठन लोगों के इसी बदलाव की मांग को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

क्यों रखा 'जन सुराज' ही नाम? (Jan Suraj Party Name Mystery)
प्रशांत किशोर ने अपनी पार्टी का नाम 'जन सुराज' रखा, जिसका सीधा अर्थ है - लोगों का शासन। प्रशांत का कहना है कि यह पार्टी जनता के द्वारा और जनता के लिए बनाई गई है। उनका मकसद बिहार में एक नई राजनीतिक व्यवस्था लाना है, जो सिर्फ नेताओं के लिए नहीं, बल्कि आम जनता के लिए काम करे।

'जन सुराज' की रणनीति और बिहार की राजनीति
अगर, आगामी विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारती है, तो सभी प्रमुख दलों की हार्ट बीट बढ़ सकती है। प्रशात ने जोर दिया कि उनकी पार्टी जाति या धर्म पर आधारित राजनीति नहीं करेगी, बल्कि सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करेगी। उनका कहना है कि बिहार की राजनीति में जाति और धर्म का महत्व जरूर है, लेकिन यह अंतिम सच नहीं है। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे 2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार के कई जातिगत समीकरण टूट चुके हैं।

प्रशांत किशोर ने कहा कि उनकी पार्टी का उद्देश्य उन लोगों को राजनीति में लाना है, जिन्होंने पहले कभी चुनाव नहीं लड़ा। वे अपने उम्मीदवारों को सक्षम, ईमानदार और बिना दाग के चुनने पर जोर दे रहे हैं।

40 सीटों पर उतारेंगे मुस्लिम उम्मीदवार
प्रशांत किशोर ने यह भी खुलासा किया कि पिछले 30 सालों से मुसलमानों ने सिर्फ लालू यादव को वोट दिया है, लेकिन अब वे बदलाव चाहते हैं। उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी विधानसभा की 40 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारेगी, जिससे मुस्लिम वोटरों को एक नया विकल्प मिलेगा।

विकास का मॉडल प्रशांत किशोर का मूल मंत्र?
प्रशांत किशोर का मानना है कि बिहार में विकास सिर्फ सड़कों और नालियों के निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनका दावा है कि उनकी पार्टी बिहार को बेंगलुरु और चेन्नई जैसी बड़ी आर्थिक ताकतों से मुकाबला करने योग्य बनाएगी, जहां बिहार के लोग 10-12 हजार रुपये की नौकरियों के लिए दूसरे राज्यों में नहीं जाएंगे, बल्कि दूसरे राज्य के लोग बिहार आकर काम करेंगे।

एनडीए और आरजेडी के बीच सीधा मुकाबला
पीके के मुताबिक, आने वाले चुनावों में एनडीए और उनकी पार्टी 'जन सुराज' के बीच सीधा मुकाबला होगा। उन्होंने दावा किया कि आरजेडी (RJD) इस मुकाबले में तीसरे नंबर पर होगी। उनके अनुसार, मुसलमानों के जन सुराज के समर्थन में आने से आरजेडी कमजोर होगी और एनडीए को चुनौती मिलेगी।

पार्टी के भविष्य को लेकर प्रशांत किशोर का क्या है नजरिया?
प्रशांत किशोर ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर उनकी पार्टी चुनाव में सफल नहीं होती है, तो वे निराश नहीं होंगे। उनकी उम्र अभी 45 साल है, और उनके पास राजनीति में काम करने के लिए बहुत समय है। वे भविष्य के चुनावों की तैयारी में जुट जाएंगे।

प्रशांत किशोर की 'जन सुराज' पार्टी बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आई है। पार्टी का उद्देश्य जनता के मुद्दों को केंद्र में रखते हुए एक नई राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना है। उनका जोर जाति और धर्म से ऊपर उठकर विकास और जनकल्याण पर है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की जनता आगामी चुनावों में उनके इस नए प्रयोग को कितना समर्थन देती है।

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