फिल्म से पहले राजद का टीजर जारी, हम बड़े दिल वाले और अब ‘वो’ भी हमारे

फिल्म से पहले राजद का टीजर जारी, हम बड़े दिल वाले और अब ‘वो’ भी हमारे

नई दिल्ली। राजद को जैसे ही जीत की सुगंध मिली उसने खुद को बदले हुए अंदाज में पेश करना शुरू कर दिया। उसने फिल्म से पहले टीजर जारी कर जनता को बेहतरीन पेशकश का भरोसा दिलाया। राजद ने जीत पर कार्यकर्ताओं को काबू में रहने का फरमान जारी कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब वह नब्बे के दशक वाला दल नहीं है। उसका दिल अब बड़ा हो चुका है और बहारों की मंजिल सबके लिए है। तभी तो उसने कार्यकर्ताओं को विरोधियों और हारे हुए प्रत्याशियों से भी शिष्ट आचरण करने का सख्त निर्देश दिया है। एग्जिट पोल के संकेतों से राजद खुश तो है लेकिन वह सर्तक भी है। वह बिल्कुल नहीं चाहता कि कोई उस पर फिर जंगलराज की तोहमत लगाये। जो हुआ सो हुआ। तेजस्वी इसके लिए माफी मांग चुके हैं। अब बारी कार्यकर्ताओं की है। अनुशासनहीनता बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदब से ही रहना होगा। कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं की वजह से राजद को 15 साल का वनवास भोगना पड़ा है। अब और मंजूर नहीं। खुद को बदलने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं।

 क्या जनता ने तेजस्वी को माफी कर दिया ?

क्या जनता ने तेजस्वी को माफी कर दिया ?

तेजस्वी ने सितम्बर महीने में दो बार जनता से उस दुर्व्यवहार के लिए माफी मांगी थी जो राजद के 15 साल के शासन के दौरान हुए थे। उन्होंने कहा था, "जब उनकी पार्टी शासन में थी तब वे बहुत छोटे थे। जनता को उस समय जो भी कष्ट हुए उसके लिए मैं माफी मांगता हूं। अगर जनता मुझे एक बार मौका देगी तो मैं दावा करता हूं कि अब ऐसा फिर नहीं होगा।" एक्जिट पोल में इस बात का अनुमान लगया गया है कि इस बार सवर्ण नौजवानों से राजद को वोट दिये हैं। इसकी वजह से ही महागठबंधन को 44 फीसदी वोट मिलता दिखाया जा रहा है। अगर वास्तविक नतीजे भी ऐसे ही रहते हैं तो यह बिहार की राजनीति के लिए ऐतिहसिक घटना होगी। यदि बड़े पैमाने पर सवर्ण वोटर राजद की तरफ मुड़ते हैं तो बने बनाये सारे समीकरण छिन्न-भिन्न हो जाएंगे। राजद इस अनुमान को एक मौके की तरह लपकना चाहता है। तेजस्वी सभी समुदाय में अपनी पैठ बनाना चाहते हैं। वे केवल एमवाइ तक सीमित नहीं रहना चाहते। लोकसभा चुनाव में हार के बाद राजद कार्य समिति की बैठक में ही फैसला हुआ था कि जीत के लिए सबका विश्वास हासिल करना होगा। एमवाई के पड़ाव से पार्टी को आगे निकलना पड़ेगा। अब लगता है कि राजद अपनी तय मंजिल की तरफ कदम बढ़ा चुका है। इसलिए उसने कार्यकर्ताओं को अगाह किया है कि वे जातीय विद्वेष के आधार पर कोई काम नहीं करें।

क्या राजद बदल गया है ?

क्या राजद बदल गया है ?

एग्जिट पोल के संकेतों मुताबिक, सवर्ण नौजवानों ने राजद को इसलिए वोट किये क्योंकि उन्होंने 1990 के दशक के आतंक को नहीं देखा। लेकिन जिन लोगों ने उस दौर की पीड़ा को भोगा है उनकी पसंद अभी भी एनडीए ही है। उस दौर के लोगों का कहना है कि न केवल सवर्ण बल्कि अतिपिछड़ी जातियों के साथ भी बहुत बुरा सलूक हुआ था। आरोप के मुताबिक, 1997 में जब लालू यादव को चारा घोटला मामले में जेल जाना पड़ा था उस समय दानापुर के आसपास राजद समर्थकों ने रोड ब्लॉक कर गाड़ियों को रोक दिया था। राहगीरों की जातियां पूछ कर उनसे मारपीट की गयी थी। उस दौर में सवर्ण जातियों के बीच खौफ का आलम था। 2002 में लालू यादव की दूसरी पुत्री रोहिणी आचार्य की शादी हुई थी। उस समय आरोप लगा था कि कई कार शो रूम से 45 नयी चमचमाती हुई गांड़ियां उठा ली गयीं थीं। आरोपों के मुताबिक इन गाड़ियों का इस्तेमाल बारातियों आने-लेजाने के लिए किया गया था। शादी के बाद उन्हें पहुंचा दिया गया था। इस खौफ में पटना के कई कार शो रूम कई दिनों तक बंद रहे थे। यह भी आरोप लगा था कि उस समय पटना की कई दुकानों से करीब एक सौ सोफा उठाये गये थे जिन्हें पंडाल में लगाया गया था। इससे पूरे बिहार में एक दहशत का माहौल बन गया था। उस दौर में खौफ पैदा करने वाली कई और घटनाएं हुईं जिसे पुराने लोग आज भी नहीं भूले हैं।

 क्या अतीत से मिला सबक ?

क्या अतीत से मिला सबक ?

लालू यादव ने जब 1990 में मुख्यमंत्री के रूप में अपना काम शुरू किया था तब उनकी छवि एक सक्रिय प्रशासक की थी। उन्होंने सचिवालय और सरकारी कार्यालयों में औचक निरीक्षण कर मुलाजिमों के बीच हड़कंप मचा दिया था। लेटलतीफ कर्मचारी समय पर आने लगे। दफ्तर समय पर खुलने लगे। चूंकि लालू फैसला ऑन स्पॉट करते थे इसलिए अफसर और कर्मचारी दोनों डरते थे। इससे सरकारी ऑफिसों की कार्यसंस्कृति ही बदल गयी थी। लालू यादव गांव- गांव घूम कर खुद गरीबों की खैरियत पूछने लगे। लालू यादव एक करिश्माई नेता बनने लगे। लेकिन ये खुशगवार मौसम बहुत कम समय के लिए रहा। इस बीच लालू यादव के कुछ करीबी लोगों ने समानांतर सत्ता स्थापित कर ली। फिर तो एक दूसरे लालू यादव सामने आ गये। जातिवाद और आतंकराज ने बिहार की फिजां ही बदल दी। अतीत से सीख लेकर अब तेजस्वी राजनीति की नयी पारी खेलना चाहते हैं। तभी उन्होंने कार्यकर्ताओं को जोश में होश बनाये रखने की नसीहत दी है।

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