Sharda Sinha Death: पति के जाने से काफी टूट चुकी थीं शारदा सिन्हा, 2017 से इस गंभीर बीमारी से लड़ रही थी जंग
Sharda Sinha Death News: बिहार की प्रतिष्ठित आवाज़ शारदा सिन्हा, जिन्हें प्यार से लोग 'बिहार की कोकिला' भी बुलाते हैं। उन्होंने भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य पर एक अमिट छाप छोड़ी है। बिहार की लोक परंपराओं में गहराई से निहित उनके गीत की देश भर में अलग ही चर्चा थी।
होली, छठ, शादी और त्योहारों के उत्सव पर उनके गीत खुशियों में चार चांद लगा देते हैं। हर घर में गूंजने वाले गीत और सुरों की मल्लिका शारदा सिन्हा अब इस दुनिया में नहीं रहीं। जिनकी आवाज़ ने जीवन के कई त्यौहारों में खुशियों का रंग भर दिया, मंगलवार देर रात उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।

दिल्ली के एम्स में उन्होंने आखिरी सांसें लीं। अपने पीछे वह एक ऐसी विरासत छोड़ गईं जो उनकी शारीरिक उपस्थिति से कहीं बढ़कर है। हालांकि अब वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ दिवाली से लेकर छठ पर्व तक हर गली, घर और छठ घाट पर गूंजती रहेगी और उनकी आत्मा को जीवित रखेगी।
72 साल की उम्र में उनके जाने से न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके बेटे अंशुमान सिन्हा ने खुलासा किया कि शारदा सिन्हा 2017 से मल्टीपल मायलोमा, कैंसर के एक गंभीर रूप से जूझ रही थीं, फिर भी उन्होंने अपने संघर्ष को निजी रखा। हमेशा अपनी गायकी के ज़रिए खुशियां फैलाना पसंद किया।
अंशुमान सिन्हा ने बताया कि उनके पिता ब्रजकिशोर सिन्हा के निधन के बाद से ही उनकी मां की मानसिक स्थिति में भारी गिरावट आई। इस नुकसान ने उन्हें काफी प्रभावित किया, इसके बाद ही 2017 में वह इस भयानक बीमारी की चपेट में आ गईं, उसके खिलाफ आंतरिक लड़ाई में कमजोर पड़ गई और ज़िंदगी की जंग हार गईं।
परिवार को उनकी स्थिति के बारे में पता होने के बावजूद, शारदा सिन्हा अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को लोगों की नज़रों से दूर रखना चाहती थीं, जो उनकी ताकत और लचीलेपन का प्रमाण था। नियमित स्वास्थ्य जांच के बाद भी उनकी बीमारी में तेज़ी से बढ़ी । इस वजह से डॉक्टर्स की सलाह पर उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया।
अस्पताल में काफी संघर्ष के बाद भी वह बीमारी की वजह से दम तोड़ गईं। बिहार के प्रसिद्ध कैंसर विशेषज्ञ डॉ. बीपी सिंह, (मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में काम चुके हैं) के मुताबिक मल्टीपल मायलोमा एक प्रकार का कैंसर है, जो रोगी की हड्डियों, गुर्दे को बुरी तरह से प्रभावित करता है।
इसके साथ ही शरीर की स्वस्थ लाल और सफेद रक्त कोशिकाओं, प्लेटलेट्स का उत्पादन करने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। मल्टीपल मायलोमा का कोई इलाज नहीं है, उपचार लक्षणों को प्रबंधित कर सकते हैं और इसकी प्रगति को धीमा कर सकते हैं।
यह रोग सफेद रक्त कोशिकाओं में उत्पन्न होता है, स्वस्थ कोशिकाएं एंटीबॉडी का उत्पादन करके संक्रमण से बचाव में सहायता करती हैं। हालांकि, मल्टीपल मायलोमा में, अस्थि मज्जा में कैंसरग्रस्त प्लाज्मा कोशिकाएं स्वस्थ रक्त कोशिकाओं को पछाड़ देती हैं, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है और रोगी के स्वास्थ्य में समग्र गिरावट आती है।












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