Shaligram Stone: गंडक नदी का जलस्तर घटते ही दुर्लभ पत्थर की तलाश में जुटे ग्रामीण, जानिए क्यों ?
Shaligram Stone: शालिग्राम पत्थर को पहचानने ने की कला हर किसी में नहीं है, लेकिन लोग बताते हैं कि नेपाल गंडक अधिवास औऱ वाल्मीकि नगर के बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक लाखों पत्थरों के बीच शालिग्राम पत्थर को पहचानने की...
Shaligram Stone: बिहार में धर्मिक मान्यताओं से जुड़ी कई दिलचस्प खबरें आपने पढ़ी होगी। एक ऐसी ही धार्मिक मान्यातों से जुड़ी खबर से हम आपको रूबरू करवाने जा रहे हैं। जिसे पढ़कर आप भी कहेंगे कि वाकई बिहार में कई दिलचस्प धार्मिक मान्याताएं हैं। हम बात कर रहे हैं दुर्लभ पत्थर शालिग्राम (शालिग्राम महाराज) की जिसकी तलाश में वाल्मिकिनगर (बगहा) के बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक तलाश में जुटे हुए हैं। वाल्मीकि नगर के सैकड़ों बच्चे, महिलाएं और पुरुष गंडक नदी का जलस्तर कम होने के साथ ही गंडक नदी में शालिग्राम पत्थर की तलाश कर रहे हैं।

‘शालिग्राम महाराज’ की भी दी जाती है संज्ञा
दुर्लभ पत्थर शालिग्राम को लोग शालिग्राम महाराज भी कहते हैं। बुज़ुर्गों की मानें तो शालिग्राम पत्थर से लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। आपको बता दें कि शालिग्राम पत्थर गंडक नदी में ही पाया जाता है। शालिग्राम पत्थर से वाल्मीकि नगर के कई परिवारों का गुज़ारा होता है। इतना ही नहीं नेपाल के गंडक अधिवास के भी कई घरों के लोग इस काम को सदियों से करते आ रहे हैं।

दुर्लभ पत्थर को पहचानने की कला
शालिग्राम पत्थर को पहचानने ने की कला हर किसी में नहीं है, लेकिन लोग बताते हैं कि नेपाल गंडक अधिवास औऱ वाल्मीकि नगर के बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक लाखों पत्थरों के बीच शालिग्राम पत्थर को पहचानने की कुव्वत है। ग़ौरतलब है कि यह लोग साधारण ज़मीन पर नहीं बल्कि गंडक नदी के लाखों पत्थरों के बीच में भी शालिग्राम पत्थर को पहचानने की सलाहियत रखते हैं। यही वजह है कि गंडक नदी का जलस्तर कम होने के साथ ही यह लोग शालिग्राम पत्थर की तलाश शुरू कर देते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो हर साल बरसात खत्म होने के बाद गांव के सभी लोग गंडक नदी से शालिग्राम ढूंढने के काम में लग जाते हैं।

गंडक नदी के गर्भ में शालिग्राम
ग्रामीणों का कहना है कि हिमालय से पवित्र गंडक नदी निकलती है और इस नदी के गर्भ में ही जिंदा शालिग्राम रहते हैं। शालिग्राम महाराज का धार्मिक महत्व भी है, इसलिए देश और विदेश दोनों जगह इस दुर्लभ पत्थर की खासी मांग है। बुज़ुर्गों की मानें तो शास्त्रों के हिसाब से हिंदुस्तान में प्रयागराज और वाल्मीकि नगर त्रिवेणी में संगम। भारत में इन दो संगम के अलावा कहीं भी संगम नहीं है। यही वजह है कि पूरी दुनिया यहां के अलावा शामलिग्राम नहीं मिलते हैं। वाल्मीकि रामायण के ज़िक्र के मुताबिक सोनभद्र, ताम्रभद्र और नारायणी के पाक मिलन को ही त्रिवेणी संगम की संज्ञा दी गई है।

कुदरती निशान से होती है पत्थर की पहचान
दुर्लभ काले पत्थर शालिग्राम की चक्र, गदा आदि के कुदरती निशान से पहचान की जाती है। वहीं पंडितों की मानें तो शिवपुराण के हवाले से उन्होंने बताया कि एक बार भगवान विष्णु को कीड़े का शक्ल एख्तियर करना पड़ा। तो वह वास करने गंडक नदी (गंडकी) में चले गए। जिसके बाद उन्होंने एक पत्थर में डेरा जमाया। भगवान विष्णु ने जिस पत्थर मे वास किया उसका रंग काला था। यही वजह है कि लोग दुर्लभ शालिग्राम (काला पत्थर) की लोग पूजा करते हैं। हर रोज़ पत्थर बढ़ता जाता है। आपको बता दें कि शालिग्राम पत्थर का चोरी छिपे कारोबार किया जाता है। देश के ज्यादातर धार्मिक स्थलों पर बिक्री होती है। वहीं बड़े पैमाने पर इसकी तस्करी भी की जाती है।
ये भी पढ़ें: Bihar की सबसे ऊंची शिव प्रतिमा बनाने में लगे इतने साल, जानिए कब होगा दीदार ?












Click it and Unblock the Notifications