पटना: वैलेंटाइन डे को ही मना डाला शहीदे आजम भगत सिंह का 'शहादत दिवस'

एक तरफ जहां 14 फरवरी को पूरा देश वैलेंटाइन डे मना रहा था तो दूसरी तरफ शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की खबरें सोशल मीडिया पर काफी फॉरवर्ड की जा रही थी।

पटना। जिस शहीदे आजम भगत सिंह का नाम लेते ही छाती गर्व से चौड़ी हो जाती है और देश में बच्चों से लेकर बूढ़ों और नेताओं तक जिनकी कुर्बानी को याद कर एक मिसाल देते हैं। वहीं, आजकल के कुछ नेताओं को सिर्फ बयानबाजी करने के अलावा और कुछ याद नहीं रहता है। इसी का ताजा नमूना बिहार के गया में देखने को मिला जहां देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले देशभक्तों का शहादत दिवस वैलेंटाइन डे के दिन ही मना दिया गया। बता दें कि किसी महान पुरुष और नेता का शहादत दिवस उस दिन मनाया जाता है जिस दिन वो देश के लिए हंसते-हंसते दुनिया छोड़ देता है।
पटना: वैलेंटाइन डे को ही मना डाला शहीदे आजम भगत सिंह का 'शहादत दिवस'

एक तरफ जहां 14 फरवरी को पूरा देश वैलेंटाइन डे मना रहा था तो दूसरी तरफ शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की खबरें सोशल मीडिया पर काफी फॉरवर्ड की जा रही थी। लेकिन बिहार के राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेताओं ने सोशल मीडिया की खबरों को देखते हुए इतिहास मानकर इनके शहादत दिवस पर कार्यक्रम का आयोजन कर दिया। फिर पार्टी के द्वारा कार्यक्रम आयोजित करने को लेकर मौके पर कई पार्टी के वरिष्ठ नेता, कार्यकर्ता उपस्थित हुए और उनको को श्रद्धांजलि दी।
पटना: वैलेंटाइन डे को ही मना डाला शहीदे आजम भगत सिंह का 'शहादत दिवस'

सोशल मीडिया पर क्यों वायरल हो रही थी महापुरुषों की कहानी
इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज इन महापुरुषों की कहानी के साथ किसने छेड़छाड़ की ये तो कहा नहीं जा सकता। लेकिन इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के बाद एक नई कहानी सोशल मीडिया पर रच दी गई है। जिसके वायरल होते ही बिहार की एक पार्टी के नेताओं ने इसे सच माना और उनकी शहादत दिवस का आयोजन कर दिया।

गौरतलब है कि 14 तारीख को ना तो इन महापुरुषों को फांसी की सजा सुनाई गई थी और ना ही इन्हें फांसी दी गई। 14 तारीख को प्रिविसी काउंसिल के द्वारा उनकी अपील को खारिज किया गया था। जिसके बाद 14 फरवरी 1931 को कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय ने लॉर्ड इरविन के सामने दया याचिका दाखिल की थी। हलांकि वह याचिका भी खारिज कर दी गई थी। लेकिन इन महान पुरुषों की हकीकत कुछ इस तरह है। जहां 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई थी और उनके 12 साथियों को उम्र कैद की सजा मकर्रर की गई थी। फांसी की सजा सुनाते हुए कहा गया था कि उन्हें 24 मार्च 1931 को फांसी दे दी जाएगी। लेकिन आदेश में परिवर्तन करते हुए उन्हें 23 मार्च की शाम साढ़े सात बजे फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। ये भी पढ़ें: वायरल सच: वैलेंटाइन डे पर ट्विटर पर क्यों ट्रेंड हो रहे हैं भगत सिंह?

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