Nishant Kumar: कैसे बिना चुनाव लड़े बिहार के डिप्टी CM बन सकते हैं निशांत कुमार? 2030 तक सेट राजनीतिक करियर!
Nishant Kumar Political Career: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नई चर्चा तेज है। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार बिना चुनाव लड़े ही सत्ता के बड़े चेहरे बन सकते हैं। राजनीतिक हलकों में जिस तरह की रणनीति की चर्चा हो रही है, उससे लगता है कि आने वाले समय में निशांत कुमार का राजनीतिक सफर बेहद तेजी से आगे बढ़ सकता है। सूत्रों की मानें तो पूरा समीकरण ऐसा तैयार किया जा रहा है, जिससे उनकी एंट्री सीधे सत्ता के गलियारों तक हो सके।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना अब तय है। जैसे ही वे राज्यसभा के सदस्य चुने जाएंगे, वैसे ही उनकी बिहार विधान परिषद (MLC) की सीट खाली हो जाएगी। यही सीट जेडीयू की रणनीति का सबसे अहम हिस्सा मानी जा रही है।

दरअसल जून में भी विधान परिषद की छह सीटें खाली होने वाली हैं। लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार की खाली होने वाली सीट ही निशांत कुमार के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प हो सकती है। इस सीट पर चुनावी चुनौती की संभावना बेहद कम है और कार्यकाल भी लंबा बचा हुआ है।
विधान परिषद से राजनीति में एंट्री की तैयारी (Nishant Kumar Political Entry)
जेडीयू के अंदर यह चर्चा तेज है कि निशांत कुमार को पहले पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल कराया जाएगा। इसके बाद उन्हें विधान परिषद के रास्ते बिहार की किसी एक सदन में पहुंचाया जा सकता है।
राजनीतिक गणित यह कहता है कि अगर नीतीश कुमार राज्यसभा चले जाते हैं, तो उनकी विधान परिषद वाली सीट का कार्यकाल वर्ष 2030 तक रहेगा। ऐसे में इसी सीट के जरिए निशांत कुमार को सदन में भेजा जा सकता है। इसका मतलब यह होगा कि बिना किसी सीधे चुनाव के वे कई साल तक विधान परिषद के सदस्य बने रह सकते हैं।
अगर इस समीकरण को समझना है तो नीतीश कुमार के विधान परिषद के सफर पर नजर डालनी होगी। वे पहली बार 2006 में बिहार विधान परिषद के सदस्य बने थे और उसी समय मुख्यमंत्री भी थे। इसके बाद 2012 में वे फिर से विधान पार्षद चुने गए।
इसके बाद 2018 और फिर 2024 में भी वे निर्विरोध विधान परिषद के सदस्य बने। अब अगर वे राज्यसभा जाते हैं तो उनकी सीट खाली होगी और यही सीट निशांत कुमार के लिए राजनीतिक रास्ता बन सकती है।

कैसे बिना चुनाव लड़े ही बिहार के डिप्टी CM बन सकते हैं निशांत कुमार?
बिहार में MLC (विधान परिषद सदस्य) का चुनाव सीधे जनता नहीं करती, बल्कि यह एक अप्रत्यक्ष चुनाव होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171 के मुताबिक विधान परिषद के सदस्य कई अलग-अलग समूहों के जरिए चुने जाते हैं। इसमें लगभग एक-तिहाई सदस्य राज्य के विधायक (MLA) चुनते हैं, एक-तिहाई सदस्य नगर निगम, नगर परिषद और जिला परिषद जैसे स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि चुनते हैं। इसके अलावा 1/12 सदस्य स्नातक मतदाता और 1/12 सदस्य शिक्षक चुनते हैं, जबकि कुछ सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत भी करते हैं।
विधान परिषद राज्य का उच्च सदन होता है, जबकि विधानसभा निचला सदन माना जाता है। इसलिए MLC भी कानून बनाने, बहस करने और सरकार को जवाबदेह बनाने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं। इसी वजह से उनका दर्जा लगभग विधायक के समान माना जाता है, हालांकि वे सीधे जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि नहीं होते।
जहां तक मुख्यमंत्री बनने की बात है, भारतीय संविधान के अनुसार कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बन सकता है, लेकिन उसे छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी होता है। इसी नियम के तहत कई नेता पहले मुख्यमंत्री बने और बाद में MLC बने। बिहार में भी नीतीश कुमार कई बार विधान परिषद के सदस्य रहते हुए मुख्यमंत्री रहे, क्योंकि वे विधानसभा के बजाय विधान परिषद के सदस्य के रूप में सदन का हिस्सा थे।
यही कारण है कि अगर कोई नेता सीधे विधानसभा चुनाव नहीं जीतता, तब भी वह MLC बनकर मुख्यमंत्री या मंत्री पद पर रह सकता है। इसी राह पर चल निशांत कुमार भी डिप्टी सीएम बन सकते हैं।

बिहार में नया सत्ता फॉर्मूला? (Bihar Political Formula)
एनडीए से जुड़े सूत्रों का दावा है कि बिहार की सत्ता का नया फार्मूला भी तैयार किया जा रहा है। इस फॉर्मूले के तहत भाजपा का मुख्यमंत्री और जेडीयू के दो उपमुख्यमंत्री हो सकते हैं।
अगर ऐसा होता है तो जेडीयू कोटे से एक डिप्टी सीएम का चेहरा निशांत कुमार हो सकते हैं। इस तरह उनकी राजनीतिक शुरुआत सीधे सत्ता के शीर्ष पदों में से एक से हो सकती है।
पार्टी में नेतृत्व को लेकर असमंजस (JDU Leadership Crisis)
नीतीश कुमार के बाद पार्टी का नेतृत्व कौन संभालेगा, इसे लेकर भी जेडीयू में चर्चा चल रही है। जिन नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं उनमें कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा, केंद्रीय मंत्री लल्लन सिंह, मंत्री अशोक चौधरी और विजय चौधरी शामिल हैं।
हालांकि पार्टी के भीतर यह भी आशंका है कि अगर इन नेताओं में से किसी एक को नेतृत्व दिया गया तो गुटबाजी बढ़ सकती है। कई कार्यकर्ता यह मानते हैं कि पार्टी के ग्राउंड स्तर के नेता इन चेहरों को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे।
निशांत कुमार क्यों बन रहे सबसे मजबूत विकल्प (Why Nishant Kumar)
पार्टी के अंदर कई कारण बताए जा रहे हैं कि क्यों निशांत कुमार को भविष्य का चेहरा माना जा रहा है। पहला कारण यह है कि वे नीतीश कुमार के बेटे हैं और पार्टी के भीतर उन्हें सर्वमान्य चेहरा माना जा सकता है। इससे गुटबाजी की संभावना कम हो सकती है।
दूसरा कारण सामाजिक समीकरण है। निशांत कुमार कुर्मी समाज से आते हैं। कुर्मी और कोइरी समुदाय वही सामाजिक आधार है जिसने दशकों तक नीतीश कुमार की राजनीति को मजबूत किया है।
तीसरा कारण उनकी छवि है। निशांत अभी तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे हैं और उनके खिलाफ किसी तरह का विवाद या आरोप नहीं है। इसलिए उन्हें साफ छवि वाले चेहरे के रूप में पेश किया जा सकता है।
जेडीयू कार्यकर्ताओं में नाराजगी भी (JDU Workers Anger)
हालांकि इन चर्चाओं के बीच जेडीयू कार्यकर्ताओं में नाराजगी की खबरें भी सामने आ रही हैं। कई कार्यकर्ताओं का आरोप है कि बिना विधायक दल की बैठक के ही नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजने का फैसला कर लिया गया।
खासकर कुर्मी और कोइरी वोट बैंक के बीच असंतोष की चर्चा हो रही है। यही वह सामाजिक आधार है जिसने लंबे समय तक नीतीश कुमार को सत्ता तक पहुंचाया।
डिप्टी सीएम बनने के तीन विकल्प (Deputy CM Possibility)
पार्टी सूत्रों के मुताबिक निशांत कुमार को लेकर तीन तरह की राय सामने आ रही है। पहली राय यह है कि उन्हें पहले जनता के बीच लाया जाए और धीरे-धीरे बड़ा पद दिया जाए।
दूसरी राय यह है कि भाजपा के मुख्यमंत्री के साथ जेडीयू से दो उपमुख्यमंत्री बनाए जाएं। इनमें एक अनुभवी नेता हो और दूसरा चेहरा निशांत कुमार का हो, ताकि वे सत्ता और राजनीति की बारीकियां सीख सकें।
तीसरी संभावना यह भी बताई जा रही है कि कुछ समय बाद उन्हें सीधे मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश किया जाए, हालांकि फिलहाल इसकी संभावना कम मानी जा रही है।
बिहार की राजनीति का नया अध्याय? (Bihar Politics Future)
नीतीश कुमार के दिल्ली जाने की तैयारी के साथ ही बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। जेडीयू के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट रखना है।
ऐसे में पार्टी के कई नेताओं को लगता है कि अगर निशांत कुमार राजनीति में आते हैं और नेतृत्व संभालते हैं तो पार्टी एकजुट रह सकती है। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो जेडीयू के भीतर टूट और असंतोष की आशंका भी बढ़ सकती है।
यही वजह है कि बिहार की राजनीति में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या निशांत कुमार आने वाले समय में सत्ता के नए केंद्र बनेंगे। अगर पार्टी की रणनीति सफल हुई तो उनका राजनीतिक सफर 2030 तक के लिए लगभग तय माना जा सकता है।
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