NEET 2024 paper leak: 90 दिन से जेल में बंद आरोपी संजीव मुखिया को मिली जमानत, जानिए कोर्ट ने क्या कहा?
NEET 2024 paper leak Sanjeev Mukhia: देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-2024 एक बार फिर विवादों में आ गई है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित इस परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक मामले में कई गिरफ्तारियां हुई हैं और मामला अब सीबीआई की निगरानी में है। इस हाई-प्रोफाइल केस में मुख्य आरोपी संजीव मुखिया को पटना सिविल कोर्ट में स्थित CBI की विशेष अदालत से जमानत मिल गई है, जिससे कानूनी प्रक्रिया को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
संजीव मुखिया ने अदालत को बताया कि वह 90 दिनों से न्यायिक हिरासत में है, लेकिन CBI अब तक उसके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल नहीं कर सकी है। इस दलील के बाद न्यायाधीश सुनील कुमार सिंह की अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के तहत उसे जमानत दी।

जमानत कैसे मिली?
पटना सिविल कोर्ट स्थित सीबीआई की विशेष अदालत संख्या दो ने आरोपी संजीव मुखिया को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के तहत जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। जज सुनील कुमार सिंह की अदालत में संजीव ने दलील दी कि वह 90 दिनों से न्यायिक हिरासत में है और अभी तक उसके खिलाफ सीबीआई द्वारा आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया है। अदालत ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।
NEET पेपर लीक मामला: कब क्या हुआ?
- 5 मई 2024: देशभर में NEET परीक्षा आयोजित हुई।
- पटना (शास्त्रीनगर थाना): पेपर लीक मामले में एफआईआर संख्या 358/2024 दर्ज।
- ईओयू को सौंपी गई जांच, बाद में केंद्र सरकार ने सीबीआई को दी जिम्मेदारी।
- 23 जून 2024: सीबीआई ने FIR RC224/2024 दर्ज की।
- अब तक 49 आरोपी गिरफ्तार, 45 के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल।
संजीव मुखिया कौन है?
संजीव मुखिया इस मामले का मुख्य आरोपी है और अन्य परीक्षाओं में पेपर लीक मामलों में भी शामिल रहा है। लंबे समय तक फरार रहने के बाद उसे पटना पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेजा था।
- 1 मई 2025: से वह न्यायिक हिरासत में था।
- 28 अप्रैल 2025: को CBI की मांग पर पेशी वारंट जारी हुआ था।
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सरकारी कर्मचारी भी लपेटे में
जैसे-जैसे NEET-2024 प्रश्नपत्र लीक मामले की जांच आगे बढ़ी, जांच एजेंसियों को इसमें सरकारी कर्मचारियों की संलिप्तता के प्रमाण मिलने लगे। कई संदिग्ध अधिकारियों की भूमिका ने जांच को और भी पेचीदा बना दिया, जिससे मामला केवल शैक्षणिक या आपराधिक न होकर प्रशासनिक भ्रष्टाचार का भी गंभीर उदाहरण बन गया। इसके चलते भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धाराएं भी आरोप पत्र में जोड़ी गईं, जिससे अब यह मामला केवल सामान्य न्यायालय की बजाय पूरी तरह से CBI की विशेष अदालत के अधिकार क्षेत्र में आ गया।
सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी ने इस केस को और भी गंभीर बना दिया है और यह संकेत दिया है कि केवल गिरोह नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर के लोग भी इस संगठित अपराध में शामिल हो सकते हैं। यह स्थिति देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।
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