Motivational Story: ‘लड़की होकर अकेले बाहर जाती है', लोगों ने दिए थे ताने, मुरली ने मेडल जीत कर दिया जवाब
Motivational Story: बिहार में आज भी समाज के लोग बेटियों के घर से बाहर निकलने को अच्छा नहीं मानते हैं। समाज की परवाह किए बगैर मुरली ने दूसरी लड़कियों के लिए मिसाल पेश की है, जमुई की बेटी की हर कोई सराहना कर रहा है।

Motivational Story: बिहार में बेटियां बेटों की तरह ही अपने हुनर का परचम लहराते हुए प्रदेश का नाम रोशन कर रही हैं।लेकिन फिर भी समाज में बेटियों को ताना ही सुनने को मिलता है। समाज के लोग क्या कह रहे हैं, इसकी परवाह किए बिना जमुई की बेटी ने अपने सफर की शुरुआत की और मेडल जीत कर लोगों को जवाब भी दिया। यह कहानी है जमुई की रहने वाली बेटी मुरली दीक्षित की, जब वह जैवलिन थ्रो की प्रैक्टिस करने घर से बाहर निकलती थी तो लोग कहते थे लड़की होकर अकेले घर से बाहर जाती है, तरह-तरह के ताने देते थे। सबकी बातों को अमनसुना कर उसने मेहनत की और अब धीरे-धीरे कामयाबी की बुलंदियों को छू रही हैं।

गांव के लोग मुरली को देते थे थाना
मुरली ने साल 2015 जैवलिन थ्रो खेलना शुरू किया था, इसकी प्रैक्टिस के लिए वह घर घर से केकेएम कॉलेज जमुई जाया करती थी, जब वह घर से निकलती थी तो लोग कहते थे, घर वालों ने छूट दी हुई है, लड़की होकर अकेले बाहर जाती है। लोगों की बात सुनकर घर वाले भी खेल छोड़कर पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह देने लगते थे। मुरली सबकी बातें सुनकर परेशान तो ज़रूर हो जाती थी लेकिन उसने कभी हिम्मत नहीं हारी। घर वालों के कम सहयोग के बाद भी उसने अपनी प्रैक्टिस जारी रखी। एक दो बार कामयाबी मिलने के बाद पिता ने सपोर्ट करना शुरू किया।

'बहुत ही मुश्किल से होता था परिवार का गुजारा'
मुरली ने बाताया कि उस दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, बहुत ही मुश्किल से परिवार का गुजारा होता था। इसलिए लाठी फेंक कर ही प्रैक्टिस किया करती थी। मुरली ने कहा कि लड़कियां उस वक्त में घर से निकलने में एतराज़ करती थी, उस समय मैं बरुअट्टा गांव (जमुई) में जैवलिन थ्रो की प्रैक्टिस करती थी। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए जैवलिन खरीदना तो सपने जैसा था। बाद में कुछ सहयोग मिलने से 10 हज़ार रुपये में जैवलीन खरीदी। 2016 में पहली बार देवघर में हुए ईस्ट जोन अंडर-16 में प्रतियोगिता में भाग ली थी।
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कई बार जीत चुकी हैं मेडल
2016 ईस्ट जोन अंडर-16 में प्रतियोगिता में कामयाबी नहीं मिल पाई लेकिन मुरली ने हिम्मत नहीं हारी। उसने मेहनत जारी रखी आज की तारीख में नेशनल स्तर तक की प्रतियोगिताओं में मुरली 20 मेडल पर कब्जा जमा चुकी हैं। 2020 में पटियाला में प्रैक्टिस के दौरान एल्बो में चोट लग गई लकिन उसने प्रैक्टिस जारी रखा। नेशनल सीनियर एथलेटिक्स 2022 (रायपुर) में 49.95 मीटर का थ्रो किया। गुवाहाटी में जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप वर्ष 2016 में गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया। 2017 और 2018 में ईस्ट जोन यूथ नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीती। नेशनल जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2019 में पहला स्थान मिला। 2019 से पहला स्थान हासिल करने के बाद ही मुरली के सपनों को उड़ान मिली। खेलो इंडिया यूथ गेम 2020 में सिल्वर मेडल जीता। मुरली अभी भी भारतीय खेल प्राधिकरण सिलीगुड़ी में ट्रेनिंग ले रही हैं।
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