Mahabodhi Temple: बोधगया में धरने पर बौद्ध भिक्षु! क्या है बोधगया टेंपल एक्ट 1949 और क्यों छिड़ी है इस पर जंग?
Mahabodhi temple: वैसे तो बिहार का बोधगया अपनी धार्मिक पहचान और बौद्ध मॉनस्ट्रीज के लिए प्रसिद्ध है लेकिन ये जगह अभी किसी अन्य कारणों से चर्चे में बना हुआ है। गया में 25 बौद्ध भिक्षु पिछले 28 दिनों से धरने पर बैठे हुए हैं और बौद्ध मंदिर में हिंदु पुजारियों की उपस्थिति हटाने की मांग कर रहे हैं।
क्या है बोधगया टेंपल एक्ट 1949? बौद्ध भिक्षु इसे खत्म करने की मांग क्यों कर रहे हैं। आईए विस्तार से जानते हैं...

Mahabodhi Temple: हिंदू बनाम बौद्ध की है लड़ाई
गया का महाबोधि मंदिर अभी चर्चा में बना हुआ है। यहां पर पिछले महीने 12 फरवरी से 28 बौद्ध भिक्षु धरने पर बैठे हैं और मंदिर के प्रबंधन में हिंदू धर्म को लेकर धरना करने रहे हैं। इनका कहना है कि इस मंदिर प्रबंधन कमेटी में दूसरे धर्म के लोगों का क्या काम है?
वो राम मंदिर ट्रस्ट और अन्य धार्मिक स्थलों का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि जब इन कमेटियों में अन्य धर्म के लोग शामिल नहीं होते हैं,तो महाबोधी मंदिर कमेटी में हिंदू धर्म की उपस्थिति क्यों है? इस बार इस आंदोलन का स्वरूप छोटा दिखता है, लेकिन अमेरिका सहित देश के कई हिस्सों जैसे महाराष्ट्र, यूपी और लद्दाख में बोधगया में चल रहे आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन हुए हैं और लोग गया आकर इनको अपना समर्थन दे रहे हैं।
Mahabodhi temple: क्या है बोधगया टेंपल एक्ट 1949?
बोधगया टेंपल एक्ट 1949 (BT Act) एक ऐसा प्रावधान है जिसमें बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी बनाई गई है और इस कमेटी में कुल 9 सदस्य होते हैं । इन सदस्यों में चार बौद्ध और चार हिंदू सदस्य होते हैं और एक अध्यक्ष होता है जो डीएम होता है।
साल 2013 से पहले अगर डीएम हिंदू नहीं है तो किसी अन्य हिंदू सदस्य को ही अध्यक्ष बनाया जाता था, हालांकि 2013 में संशोधन किया गया और डीएम के हिंदू होने के प्रावधान को हटा दिया गया। साल 2002 में वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल महाबोधि मंदिर के आसपास अलग-अलग देशों की कुल 63 मोनेस्ट्रीज़ हैं। बीटीएमसी का कार्यकाल तीन साल का होता है और इस समय इसकी सचिव महाश्वेता महारथी हैं।
Mahabodhi temple: क्या है विवाद का कारण ?
अब सारा मामला मंदिर में हिंदू धर्म का फंसा है.. बीटीएमसी में हिंदू सदस्य क्यों है? बौद्धों का कहना है कि इस कमेटी में हिंदुओं का कोई काम नहीं है हिंदू पुजारी उनके इस पवित्र तीर्थस्थल पर कब्जा कर रहे हैं।
हालांकि, हिंदुओं का कहना है कि मंदिर में हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। दरअसल, यह विवाद 18वीं सदी में उस समय शुरू हुआ था जब टेंपल मैनेजमेंट एक्ट भी पारित नहीं था। उस समय भी महाबोधि मंदिर में बौद्ध धर्म के लोगों को पूर्ण अधिकार नहीं था।
यह पहली बार नहीं है जब बीटी एक्ट से हिंदू सदस्यों को हटाने की मांग उठ रही है इससे पहले भी 1992 में जापान से भारत आकर बस गए बौद्ध भिक्षु सराई सुसाई ने इसके लिए बड़ा आंदोलन किया था। धरने का नेतृत्व कर रहे महासचिव आकाश लामा का कहना है कि हमारी एक ही मांग है बीटी एक्ट रो पूरी तरह खत्म किया जाए। ये मंदिर सिर्फ बौद्ध धर्म का है इस पर अधिकार भी बौद्ध समुदाय को ही मिलना चाहिए।
Mahabodhi temple: 9 सदस्यीय कमेटी
वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल इस महाबोधि मंदिर समिति में कुल 9 सदस्य होते हैं। इनमें एक अध्यक्ष और चार हिंदू और चार बौद्ध को शामिल किया जाता है। जिन चार बौद्ध भिक्षुओं को कमेटी में शामिल किया जाता है उनमें महंत पुजारी भी शामिल होते हैं। बिहार सरकार की ओर से इस कमेटी के सदस्यों को नामित किया जाता है। राज्य सरकार समिति के सदस्यों में से किसी एक को सचिव के रूप में नामित करती है।
Mahabodhi temple: राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में बनी थी कमेटी
इस कमेटी को लेकर कहते हैं कि अगर उस समय की जिस परिस्थिति के अनुसार ये एक्ट बनाए गए होंगे लेकिन अब वो परिस्थिति नहीं है। उस समय वहां जंगल था और बौद्ध के मानने वालों की उपस्थिति कम होगी लेकिन अब तो वह स्थिति नहीं है। इस पर हमारा अधिकार है जो हमें मिलना चाहिए।












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