Bihar Lok Sabha Chunav: बिहार की इन 22 सीटों पर सिर्फ 6 जातियों के लोग ही क्यों बनते हैं सांसद?

Bihar Lok Sabha Election News 2024: बिहार की चुनावी राजनीति पर जातियों का बोलबाला हमेशा से रहा है। लेकिन, जातियों के इस दबदबे में परिसीमन ने भी खास भूमिका निभाई है। 2009 के परिसीमन के बाद बिहार में इस तरह से लोकसभा सीटों का निर्धारण हुआ है कि आधी से ज्यादा यानी 22 सीटों से सिर्फ 6 ही जातियों के नेता ही सांसद चुने जा रहे हैं।

दिलचस्प बात ये है कि इनमें राजपूत और भूमिहार जैसी दो अगड़ी जातियां भी शामिल हैं, जिनकी जनसंख्या कई अधिक आबादी वाली जातियों की तुलना में बहुत ही कम हैं। लेकिन, परिसीमन का ऐसा खेल है कि पार्टियां कोई भी हो, इनके एक नहीं, कई-कई सांसद लोकसभा के लिए चुन लिए जाते हैं।

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बिहार में 214 जातियां, चुनावों में 6 का दबदबा
बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। पिछले साल अक्टूबर में बिहार सरकार ने जातीय सर्वेक्षण के जो आंकड़े जारी किए थे, उसके अनुसार प्रदेश की जनसंख्या 13 करोड़ से कुछ ज्यादा है। इस सर्वे के अनुसार बिहार में कुल 214 जातियां खोज निकाली गई हैं।

लेकिन, तथ्य यह है कि करीब 40 वर्षों से औरंगाबाद में राजपूत उम्मीदवार ही जीतता है और मधेपुरा सीट यादव छोड़कर किसी दूसरी बिरादरी को मिल जाए यह मुमकिन ही नहीं लगता।

कम आबादी वाली जातियों के भी ज्यादा सांसद
जातिगत सर्वे के मुताबिक बिहार में राजपूतों की आबादी महज 3% है। लेकिन, 2019 में 7 राजपूत सांसद लोकसभा के लिए चुने गए थे। जबकि, लगभग 14% यादव होने के बाद भी सिर्फ 5 यादव सांसद ही लोकसभा के लिए चुने गए।

इसी तरह जातिगत जनगणना में भूमिहारों की आबादी लगभग 2.5% बताई गई है। लेकिन, 2019 में इस सवर्ण जाति के 3 सांसदों को जीत मिली थी। वहीं राज्य में पासवान (दलित) जाति की आबाद 5% सामने आई है और 2019 में इसके 4 लोग लोकसभा के लिए चुने गए थे।

वहीं बिहार की राजनीति में लव-कुश के नाम से चर्चित कोइरी (कुशवाहा)-कुर्मी बिरादरी की आबादी क्रमश: 4% और 3% सामने आई है। 2019 में बिहार में 3 कुशवाहा और 1 कुर्मी नेता को लोकसभा में जगह मिली। मतलब, कम आबादी के बावजूद परिसीमन की वजह से लोकसभा क्षेत्रों का निर्धारण इस तरह से है कि कुछ बिरादरियों की बल्ले-बल्ले होती रही है।

5 जातियों के हक में 22 सीटों का समीकरण
मोतिहारी से अलग होने के बाद पूर्वी चंपारण सीट के लिए पहली बार 2009 में चुनाव हुए। इस सीट पर राजपूत जाति के राधामोहन सिंह तभी से जीतते आ रहे हैं। 2024 में चौथी बार भी बीजेपी ने उन्हीं पर दांव लगाया है।

औरंगाबाद सीट मतलब राजपूत सांसद!
औरंगाबाद सीट तो एक तरह से राजपूत जाति का पर्याय ही बन चुकी है। 17 चुनावों में 16 बार इस सीट से राजपूत जाति के नेता ही जीतते रहे हैं। तीन बार से इस सीट पर इसी बिरादरी के सुशील सिंह जीत रहे हैं। इससे पहले इस सीट पर कांग्रेस के निखिल कुमार या उनके परिवार के सदस्य जीतते थे।

मधेपुरा का मतलब गोप को मौका!
इसी तरह से मधेपुरा सीट पर 1980 से यादव ही जीतते आ रहे हैं। अभी दिनेश चंद्र यादव यहां से सांसद हैं। लालू यादव, शरद यादव और यहां तक कि पप्पू यादव जैसे नेताओं ने भी इसका प्रतिनिधित्व किया है।

हाजीपुर सीट मतलब पासवान जाति की जीत की गारंटी!
हाजीपुर की जिस सीट को लेकर अभी एलजेपी के चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति पारस में टकराव की स्थिति देखी गई है, उसपर 1996 से ही पासवान जाति का कब्जा है। पहले इस सुरक्षित सीट से चिराग के पिता रामविलास पासवान चुनाव जीतते थे। 2019 में उनके भाई पशुपति पारस को मौका मिला। सिर्फ 2009 में यहां रामविलास पासवान हारे थे और जदयू के रामसुंदर दास चुनाव जीते थे, जो कि पासवान बिरादरी के नहीं थे।

वैशाली, सारण और आरा में राजपूतों का दबदबा!
इसी तरह से वैशाली लोकसभा सीट पर 1991 से ही लगातार राजपूत जाति के लोग चुनाव जीत रहे हैं। आरा सीट पर भी 1998 से यही चल रहा है। भाजपा ने इस बार भी अपने मौजूदा सांसद और केंद्रीय मंत्री आरके सिंह को टिकट दिया है।

सारण सीट पर भी 1996 से राजपूत जाति के सांसद चुने जा रहे हैं। सिर्फ 2009 में यहां लालू यादव चुनाव जीते थे। इस बार भी बीजेपी ने मौजूदा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी पर दांव लगाया है।

सीवान सीट से अभी राजपूत नेता कविता सिंह सांसद हैं। लेकिन पहले यहां मुसलमान या यादव जाति के सांसद चुनाव जीतते थे। इसी सीट से कुख्यात अपराधी शहाबुद्दीन भी चुनाव जीत चुका है।

नालंदा सीट मतलब कुर्मियों का समर्थन जरूरी!
नालंदा सीट पर लंबे समय से कुर्मी जाति का दबदबा रहा है। 2004 में नीतीश कुमार भी यहां से जीत चुके हैं। उन्हीं की पार्टी से होने की वजह से एक बार जॉर्ज फर्नांडीस को भी यहां का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला था। अभी भी कुर्मी बिरादरी के कौशलेंद्र कुमार यहां के एमपी हैं और इस बार भी वही भाग्य आजमा रहे हैं।

काराकाट में कोइरी और पाटलिपुत्र में यादवों का जलवा!
काराकाट सीट 2009 में बनी थी। तब से यहां कुशवाहा या कोइरी बिरादरी के नेताओं को जीत मिल रही है। अभी महाबली कुशवाहा यहां के सांसद हैं। पाटलिपुत्र लोकसभा सीट भी 2009 से अस्तित्व में है। पटना के पश्चिमी इलाके की इस सीट पर हमेशा से यादवों को जीतने का मौका मिला है। 2014 से लगातार भाजपा के रामकृपाल यादव यहां के सांसद हैं और इस बार भी वही यहां से दांव लगा रहे हैं।

उजियारपुर का जातिगत समीकरण
उजियारपुर सीट भी 2009 में बनी थी। पहली बार यहां कोइरी जाति की नेता अश्वमेघ देवी जीती थीं। उसके बाद से यादव बिरादरी से आने वाले केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय यहां के सांसद हैं और इस बार भी बीजेपी ने उन्हें ही प्रत्याशी बनाया है।

मधुबनी सीट से मुसलमान के बाद यादवों को मौका
मधुबनी सीट पर यादव या मुसलमान उम्मीदवार का कब्जा रहा है। 1998 और 2004 में यहां कांग्रेस के शकील अहमद जीते और 1999, 2009 और 2014 में हुकुदेव नारायण यादव को मौका मिला। अभी वहां उन्हीं के बेटे अशोक यादव सांसद हैं और बीजेपी ने इस बार भी उन्हें ही टिकट दिया है।

समस्तीपुर सीट भी पासवान के नाम!
इसी तरह से अररिया सीट पर 15 वर्षों से मुसलमान या राजपूत सांसद रहे हैं तो पूर्णिया सीट राजपूत या कुशवाहा जाति को मौका मिला है। समस्तीपुर सीट से भी डेढ़ दशक से पासवान जाति की ही जीत हो रही है और इस सीट पर रामविलास पासवान के परिवार के सदस्य ही सांसद चुने जा रहे हैं।

मुंगेर, बेगूसराय में भूमिहारों की जीत पक्की!
वाल्मीकि नगर सीट पर 2009 के बाद से 3 बार कुशवाहा और 1 बार ब्राह्मण उम्मीदवार को मौका मिला है। जबकि, 2009 से नवादा सीट पर भूमिहार नेता को मौका मिल रहा है। मुंगेर सीट पर भी भूमिहार जाति के ही सांसद चुनाव जीतते हैं।

मुंगेर की तरह बेगूसराय सीट भी भूमिहारों के कब्जे में रही है। 2009 में जरूर यहां से मुस्लिम प्रत्याशी सफल हुए थे। जबकि, बांका सीट पर कभी यादव तो कभी राजपूतों को मौका मिलता आया है। यही हाल महाराजगंज का है, जहां पर राजपूतों का हमेशा से दबदबा रहा है।

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