Bihar Politics: बेगूसराय की इस विधानसभा सीट पर देश में पहली बार हुई थी बूथ कैप्चरिंग और फिर शुरू हुई

First Time Booth Capturing In India: देश भर में लोकसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। पक्ष विपक्ष के बीच अपराध, भ्रष्टाचार को लेकर ज़ुबानी जंग छिड़ी हुई है। इसी क्रम में EVM से चुनाव को लेकर भी बहस हो रही है। ऐसे में क्या आप जानते हैं कि EVM से चुनाव का चलन क्यों तेज़ हुआ। आइए जानते है इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह क्या रही है।

हिंदुस्ता में चुनावी मौसम में हिंसा और बड़े पैमाने पर जबरदस्ती वोट डालने का पुराना इतिहास रहा है। ऐसा भी समय गुज़रा है जब पूरे के पूरे गांव के लोगों का वोट जबरन किसी दूसरे पार्टी को डलवाया जाता था। या फिर गांव के लोग डर से वोट डालने भी नहीं जाते थे।

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चुनाव आयोग को मतदान करवाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। इसी क्रम में बूथ कैप्चरिंग के काले अध्याय ने हिंदुस्तान में जन्म लिया था। पहली बार देश में ऑन रिकॉर्ड चुनाव में धांधली (जबरन वोट डलवाने की घटना) 1957 में दर्ज की गई थी।

1975 में बिहार विधानसभा चुनाव चल रहा था, इसी दौरान प्रदेश के बेगूसराय ज़िले में एक उम्मीदवार न सिर्फ, विपक्षी दल के उम्मीदवार के सपोर्ट में आया। बल्कि वोटर्स को मतदान करने से रोकते हुए जबरदस्ती अपने पक्ष में वोटिंग भी करवा ली।

इस घटना को उस वक्त बूथ कैप्चर की संज्ञा दी गई और फिर चुनाव में बूथ कैप्चरिंग की घटना आम हो गई। EVM से मतदान शुरू होने से पहले पहले चुनाव में दबंग उम्मीदवार और उनके कार्यकर्ता आसानी से बूथ कैप्चर की वारदात को अंजाम देते चले आने लगे।

1957 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में मटिहानी विधानसभा सीट (बेगुसराय) के रचियाही पोलिंग स्टेशन पर देश की पहली बूथ कैप्चरिंग हुई थी। चुनाव में कांग्रेस पार्टी और लेफ्ट दलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रचियाही बूथ पर तीन बड़े गांव के वोटर्स मतदान करने जाते थे। 1957 के चुनाव में सरयुग प्रसाद सिंह और लेफ्ट पार्टी के चंद्रशेखर प्रसाद सिंह के बीच मुकाबला था। कांग्रेस उम्मीदवार 1952 के चुनाव में जीते थे, लेकिन इस चुनाव में लेफ्ट पार्टी के उम्मीदवार चंद्रशेखर प्रसाद सिंह ने कांग्रेस उम्मीदवार को कड़ी टक्कर दे रखी थी।
सरयुग प्रसाद सिंह को लगा कि अगर रचियाही बूथ पर वोटिंग हुई तो वह कमज़ोर पड़ सकते हैं। इसके बाद उन्होंने बाहुबल का इस्तेमाल करते हुए लोगों को मतदान से रुकवाने लगे। उनपर वोट नहीं डालने देने का आरोप तो लगा ही, इसके साथ ही दूसरे के बदले भी मतदान करवाने का आरोप लगा।

यह वह दौर था जब अगर कोई किसी दूसरे के बदले वोट डाल दे ते उसकी पहचान कर पाना बहुत ही मुश्किल होता था। हालांकि यह मामला आग की तरह उजागर हुआ, जिसके बाद चुनाव आयोग ने माना कि मतदान में धांधली हुई है। इसके बात ही हिंदुस्तान के इतिहास में बूथ कैप्चरिंग की पहली वारदात बेगूसराय के मटिहानी विधानसभा में दर्ज की गई थी।

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