कभी बहू के साथ झोंटा-झोंटी, अब बेटी पर उठे चप्पल — लालू परिवार की कलह की कहानी हर बार दर्दनाक क्यों होती है?
Lalu Yadav Family Feud History (Rohini Acharya controversy): बिहार की राजनीति में लालू यादव का परिवार हमेशा सुर्खियों में रहा है, लेकिन इस बार जो तूफान उठा है उसने पूरे प्रदेश को हिला दिया है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राजद की करारी हार के बाद जो विवाद भड़का, उसने घर और पार्टी दोनों की तस्वीर बदल कर रख दी है। लालू की बेटी रोहिणी आचार्य का राजनीति और परिवार से दूरी बनाने का फैसला केवल एक पारिवारिक झगड़ा नहीं, बल्कि उस संघर्ष का ताजा अध्याय है, जो इस परिवार में पिछले तीन दशक से चलता आ रहा है।
रोहिणी की पीड़ा: किडनी दान करने वाली बेटी को 'गंदी किडनी देने वाली' कहा गया
चुनाव नतीजों के अगले ही दिन रोहिणी आचार्य अचानक मीडिया के सामने फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने लिखा कि उन्होंने अपने पिता को बचाने के लिए बिना परिवार और ससुराल की अनुमति के किडनी दान कर दी, लेकिन आज उसी बलिदान पर उन्हें ताना मारा जा रहा है।

रोहिणी का दावा है कि समीक्षा बैठक के दौरान उन्हें गालियां दी गईं, चप्पल उठाकर मारने की कोशिश हुई और तेजस्वी यादव के कुछ करीबी सहयोगियों ने बेहद घटिया बातें कीं।
इस घटना ने रोहिणी का मन तोड़ दिया। उन्होंने राजनीति छोड़ने और परिवार से दूरी बनाने का ऐलान कर दिया। अगले ही दिन उनकी तीन बहनें रागिनी, चंदा और राजलक्ष्मी भी पटना का घर छोड़कर दिल्ली चली गईं। तेज प्रताप पहले से परिवार से अलग चल रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने खुलकर रोहिणी का समर्थन किया। ऐसे में आइए जानें लालू परिवार में कब-कब कलह हुए हैं?
राजद के लिए बड़ा खतरा: क्या परिवार की टूट से पार्टी भी बिखरेगी?
लालू परिवार सिर्फ एक घर नहीं,राजद की रीढ़ है। बेटियों का गुस्सा और तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा रहे हैं। अगर यह दरार गहरी हुई तो विपक्षी गठबंधन कमजोर होगा और बीजेपी को बिहार में अपना आधार और मजबूत करने का मौका मिल सकता है। तेजस्वी यादव लगातार विपक्ष का चेहरा बने रहे हैं, लेकिन परिवार की यह लड़ाई सीधे-सीधे उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर रही है।
लालू परिवार में कलह की शुरुआत कोई नई बात नहीं: कब-कब हुआ परिवार में क्लेश
🟡 1. 1990-2000: ससुराल पक्ष और साधु-सुभाष विवाद
लालू यादव के सीएम बनने के बाद राबड़ी देवी के भाई साधु यादव और सुभाष यादव का कद बढ़ा। सत्ता की लड़ाई, पद की खींचतान और महत्वाकांक्षाओं की वजह से परिवार दो गुटों में बंटने लगा।
साधु यादव अक्सर लालू पर "परिवार को नजरअंदाज करने" का आरोप लगाते थे। 1997 में राजद के गठन के समय भी यह तनाव चरम पर था। यह परिवार के भीतर पहली बड़ी टूट की शुरुआत थी।
🟡 2. 2017-2019: तेज प्रताप-ऐश्वर्या विवाद और 'उत्तराधिकारी' की लड़ाई
जब तेज प्रताप की शादी टूटने लगी, तब यह विवाद घर के बाहर खुला। तेज प्रताप ने पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए, जबकि परिवार इसे दबाना चाहता था। तेज प्रताप की छोड़ी हुई पत्नी ऐश्वर्या ने आरोप लगाया था कि उनको ससुराल प्रताड़ित किया गया है। उन्होंने मीडिया के सामने आकर रोते हुए अपनी सास राबड़ी देवी पर झोंटा-झोंटी करने यानी बाल पकड़कर मारने-पीटने का आरोप लगाया था।
इसी बीच तेजस्वी को पार्टी का वारिस माना गया। तेज प्रताप ने खुद को हाशिये पर महसूस किया, जिससे दोनों भाइयों के बीच खाई और चौड़ी होती गई।
🟡 3. मई 2025: तेज प्रताप का निष्कासन
एक महिला के साथ "12 साल के रिश्ते" का दावा करते वीडियो ने लालू को कड़ा कदम उठाने पर मजबूर किया। तेज प्रताप को राजद से 6 साल के लिए बाहर कर दिया गया। वे महुआ से स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़े और हार गए। इस घटना ने परिवार और पार्टी दोनों में स्थायी दरार डाल दी।
🟡 4. सितंबर 2025: रोहिणी बनाम संजय यादव
लोकसभा चुनाव 2024 के बाद रोहिणी ने तेजस्वी के सलाहकार संजय यादव को "जयचंद" कहा। उन्होंने परिवार के सभी सदस्यों को सोशल मीडिया पर अनफॉलो कर दिया। यह संकेत था कि परिवार अब साफ-साफ दो हिस्सों में बंट चुका है तेजस्वी गुट और बाकी गुट।
🟡 5. नवंबर 2025: चप्पल-कांड के बाद परिवार का खुला विद्रोह
बिहार चुनाव की हार के बाद समीक्षा बैठक में रोहिणी को अपमानित किया गया। उन्होंने कहा कि उन्हें "गंदी किडनी देने वाली" बोल गया, पिता को किडनी देने के बदले करोड़ों रुपये लेने का आरोप लगाया गया। यह बात उन्हें अंदर तक झकझोर गई। उन्होंने अपने पोस्ट में साफ-साफ कहा कि अब रोहिणी जैसी बेटी किसी घर में पैदा नहीं होनी चाहिए।
अगले 24 घंटों में रोहिणी, रागिनी, चंदा और राजलक्ष्मी सभी पटना छोड़कर चली गईं। परिवार का एक बड़ा हिस्सा पहली बार एक साथ तेजस्वी के खिलाफ खड़ा हो गया।
भविष्य की तस्वीर: अगर सुलह नहीं हुई, तो 2029 तक राजद का अस्तित्व दांव पर
राजद पहले ही चुनाव में तीसरी पोजीशन पर खिसक चुका है। परिवार की इस आग ने पार्टी की संरचना हिला दी है। तेजस्वी को एक मजबूत नेता के रूप में बचाने के लिए परिवार का साथ जरूरी था, लेकिन अब वही परिवार उनके खिलाफ खड़ा दिख रहा है। अगर यह टकराव शांत नहीं हुआ, तो 2029 लोकसभा चुनाव तक राजद गंभीर संकट में आ सकती है।












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