Industrial Capital Bihar: बेगूसराय में इंडस्ट्रीज़ तो हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं को रोज़गार नहीं !
Industrial Capital Bihar: स्थानीय युवाओं की मानें तो ठेकेदार हर मज़दूरों के नाम पर बाजाबता कंपनी पॉलिसी के हिसाब से वेतन लेता है। इसके बावजूद भी 100 में से सिर्फ 30 युवाओं को कॉन्ट्रैक्ट बेस पर रोज़गार मिलता है।
Industrial Capital Bihar: बेगूसराय ज़िले को बिहार की औद्योगिक राजधानी कहा जाता है, यहां आईओसीएल, बरौनी फर्टीलाइज़र, पेप्सी प्लांट जैसे कई उद्योग लगे हुए हैं लेकिन स्थानीय लोगों को रोज़गार नहीं मिल रहा है। बेगूसराय में उद्योग लगाने के बाद सरकार की तरफ़ से दावे ज़रूर होते रहे हैं कि स्थानीय युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर बढ़े हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीकत कुछ और ही है। यहां दूसरे प्रदेशों और जिले से आए युवाओं को रोजगार तो मिल रहा है लेकिन स्थानीय युवा अभी भी बेरोज़गारी का दंश झेल रहे हैं।

रोजगार की तलाश में स्थानीय युवा
बेगूसराय ज़िले में पहले से ही आईओसीएल और फर्टिलाइज़र संचालित है लेकिन यहां के युवाओं को रोज़गार की तलाश में दूसरे प्रदेशों में जाना पड़ रहा है। इतना ही नहीं देश के दूसरे प्रदेशों में भी अगर नौकरी नहीं मिलती है तो युवा नौकरी के लिए विदेश का रुख कर रहे हैं। वन इंडिया हिंदी ने बेगूसराय जिले के बेरोज़गार युवाओं से इस मुद्दे पर बात-चीत की तो पता चला कि उन्हें डायरेक्ट कंपनी में तो रखा ही नहीं जाता है। वहीं ठेकेदारों द्वारा थर्ड पार्टी वेडर के ज़रिए दिहाड़ी मज़दूरी पर रखा जाता है जिसमें 12 घंटे तक मज़दूरी करने के 300 से 500 रुपये क्षमता के मुताबिक दिया जाता है।

थर्ड पार्टी वेंडर के ज़रिए दिहाडी मज़दूरी
स्थानीय युवाओं की मानें तो ठेकेदार हर मज़दूरों के नाम पर बाजाबता कंपनी पॉलिसी के हिसाब से वेतन लेता है। इसके बावजूद भी 100 में से सिर्फ 30 युवाओं को कॉन्ट्रैक्ट बेस पर रोज़गार मिलता है। वन इंडिया हिंदी ने इस बाबत आईओसीएल और फर्टिलाइज़र प्रबंधन से बात करने की कोशिश की तो उनके अधिकारी ने गोलमटोल जवाब देते हुए मामले से किनारा कर लिया। वहीं प्रबंधन के सूत्रों ने बताया कि स्थानीय लोगों को इसलिए ठेकेदार (थर्ड पार्टी वेंडर) द्वारा रखा जाता है, ताकि मज़दूर यूनियनबाज़ी नहीं कर सके।

कंपनी में रिक्तियां निकलती हैं, पर भर्ती नहीं
सूत्रों की मानें को कंपनी में रिक्तियां निकाली जाती हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं को तरजीह देने की बजाए दूसरे प्रदेशों के युवाओं को नौकरी पर रखा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि अगर स्थानीय युवाओं को कंपनी रोल पर नियुक्त किया जाएगा तो यूनियन बाज़ी होगी और इससे कंपनी का कार्य बाधित होगा। वहीं दूसरे प्रदेशों के युवाओं को नौकरी पर रखने से यूनियन बाज़ी नहीं होगी, क्योंकि बाहर से आए हुए युवा यूनियन के चक्कर में नहीं पड़ते हैं, उन्हें भी अपनी सुरक्षा को देखना होता है।

पेप्सी बॉटलिंग प्लांट से भी नहीं मिला रोज़गार
बेगूसराय में कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बरौनी में पेप्सी के बॉटलिंग प्लांट का उद्घाटन किया था। बिहार में आद्यौगिक विकास के लिए यह मील का पत्थर माना जा रहा था इस प्लांट के उद्घाटन के बाद यह दावे किए जा रहे थे कि स्थानीय युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर पैदा होंगे। पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा पेप्सी का बॉटलिंग प्लांट बरौनी में लगा तो सही लेकिन स्थानीय युवाओं को रोज़गार के नाम पर मायूसी ही हाथ लगी।

300 करोड़ रुपये के निवेश की बनी थी योजना
हजारों युवाओं को रोज़गार मिल सके इसलिए बेगूसराय में सरकार की तरफ से इलेक्ट्रॉनिक क्लस्टर योजना बनाई गई। देश और विदेश की बड़ी कंपनियां इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में निवेश करे इस बाबत उद्योग विभाग ने योजना भी बनाई। उम्मीद की जा रही थी कि जल्द ही बेगूसराय में इलेक्ट्रॉनिक क्रांति आएगी। इसके मद्देनज़र 200 एकड़ ज़मीन भी चिन्हित की गई थी। बताया जा रहा था कि कम से कम 300 करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई गई है। ज़रूरत पड़ने पर निवेश राशि बढ़ाई जाने की बात सामने आई थी ।

ठंडे बस्ते में इलेक्ट्रॉनिक क्लस्टर की योजना
बेगूसराय के इलेक्ट्रॉनिक क्लस्टर बनने से जिले के क़रीब 3 हज़ार युवाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद जताई जा रही थी। प्रदेश सरकार ने सारे पहलुओं पर विचार करने के बाद ही राज्य में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्यूफैक्चरिंग क्लस्टर विकसित करने का फ़ैसला लिया था । बिहार औद्योगिक विकास प्राधिकारण (बियाडा) ने बेगूसराय जिला औद्योगिक क्षेत्र में इस क्लस्टर के मद्देनज़र 200 एकड़ जमीन आरक्षित भी किया । क्लस्टर के लिए चिन्हित की गई ज़मीन नेशनल हाईवे 28 से सिर्फ़ 300 मीटर की दूरी पर है। इसके साथ ही नेशनल हाईवे 31 की दूरी 2.2 किलोमीटर है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों को बियाडा ने बतौर इनवेस्टर निवेश करने के लिए इनवेस्टर ईओआई जारी भी किया था, लेकिन अब वह योजना भी अब ठंडे बस्ते में चली गई है।
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