बिहार में अबकी बार इन चुनौतियों से कैसे निपटेंगे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

पटना- नीतीश कुमार सोमवार को सातवीं बार सियासी तौर पर देश के बेहद जागरूक बिहार जैसे सूबे के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। लगातार चौथी बार तो नीतीश की अगुवाई में विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद सीएम पद पर उनकी ताजपोशी होने जा रही है। बिहार एनडीए शासित ऐसा एकमात्र राज्य है, जहां भारी बहुमत से केंद्र की सत्ता पर लगातार दो बार काबिज हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी ने भी नीतीश कुमार को ही अपना लीडर मानकर चुनाव जीता है। लेकिन, फिर भी तय लग रहा है कि नीतीश कुमार को अपने इस नए कार्यकाल में (जिसे आखिरी होने का वह खुद इशारा कर चुके हैं) कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

How will Chief Minister Nitish Kumar deal with these challenges this time in Bihar?

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      बिहार विधानसभा का चुनाव इस बार भी एनडीए ने नीतीश कुमार के चेहरे को आगे रखकर जीता है। लेकिन, गठबंधन में सीटों का गणित ऐसा बैठा कि नीतीश सीएम तो बनने जा रहे हैं, लेकिन उनकी कई बेबसी अभी से महसूस होनी शुरू हो गई है। उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद मीडिया से कहा है- 'मैं नहीं बनना चाहता था मुख्यमंत्री। लेकिन, भाजपा के नेताओं के आग्रह और निर्देश के बाद मैंने मुख्यमंत्री बनना स्वीकार किया। मैं तो चाहता था की मुख्यमंत्री भाजपा का ही कोई बने।' पिछले कुछ दिनों में नीतीश ने अपनी इस तरह की भावना पहली बार जाहिर नहीं की है। 10 नवंबर को जब चुनाव परिणाम आया था और बीजेपी 74 सीटें और जेडीयू 43 सीटें लेकर आई थी, उसके बाद उन्होंने कम से कम दो बार इस बात की ओर इशारा किया कि विधायक दल के नेता पर फैसला एनडीए को करना है। मतलब, आज नीतीश भाजपा नेताओं के आग्रह पर सीएम बन रहे हैं तो जाहिर है कि आने वाले दिनों में पार्टी उनसे कई तरह का 'अनुरोध' और कर सकती है। जबसे बिहार में जदयू और भाजपा की दोस्ती हुई है, उसमें ऐसा पहली बार लग रहा है कि बिहार में जेडीयू का कद बीजेपी के सामने काफी छोटा है। इस स्थिति में कम विधायकों वाले नेता को गठबंधन की सरकार को लीड करना बहुत आसान नहीं रहने वाला। वैसे भी नीतीश कोई मनमोहन सिंह जैसे राजनेता तो हैं नहीं, जिनपर कांग्रेस और यूपीए ने 10 साल तक 'राजनीति' का कोई बोझ पड़ने ही नहीं दिया था। वो तो राजनीति के धुरंधर रहे हैं, लेकिन इस बार हालात बदले-बदले नजर आ रहे हैं।

      नीतीश कुमार की दूसरी मजबूरी ये हो सकती है कि इस बार उन्हें अपने चहेते उपमुख्यमंत्री और इमरजेंसी आंदोलन के दौरान के उनके साथी सुशील कुमार मोदी के बगैर ही सरकार चलानी पड़े। 15 साल में बीच के कुछ वर्ष ही ऐसे गुजरे हैं, जब नीतीश और सुशील मोदी में कोई सियासी मतभेद नजर आया हो। नीतीश के साथ साए की तरह चिपके रहने के चलते उन्हें बिहार के भाजपा कार्यकर्ताओं की आलोचनाओं का शिकार भी होना पड़ता रहा है। ऐसे में अगर भाजपा किसी नए नेता को यह जिम्मेदारी सौंपती है तो उनके साथ बदले सियासी गणित में मुख्यमंत्री के लिए तालमेल बिठाना आसान नहीं होगा।

      बिहार में एनडीए की 125 सीटों में 4 वीआईपी और 4 हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के पास है। ये दोनों दल इस चुनाव से पहले तक राजद के साथ थे। 'हम' के मांझी तो वह सियासी कलाकार हैं, जो नीतीश के रहमोकरम पर सीएम बनकर उन्हीं को पहले झटका भी दे चुके हैं। यानि, एनडीए का बहुमत अभी इन दोनों गुलाटीबाज पार्टियों की मोहताज है। अगर इन्होंने कोई खेल किया तो नीतीश सरकार कभी भी संकट में आ सकती है। ऊपर से एग्जिट पोल की हवाई भविष्यवाणियों के मद में चूर आरजेडी ट्रंप की तरह अभी भी हार मानने को तैयार नहीं हुई है। यानि नीतीश कुमार को स्थिर सरकार चलाने के लिए बाकी राजनीतिक गतिविधियों पर भी हमेशा चौकसी रखने की जरूरत पड़ने वाली है। वैसे भाजपा के लिए नीतीश को ज्यादा परेशान करना भी उतना आसान नहीं होगा, क्योंकि नीतीश ने तो सिर्फ आखिरी चुनाव का ऐलान कर रखा है, एनडीए ही उनका आखिरी ठिकाना है इसका वादा उन्होंने नहीं किया है। 2017 में वे लालू को इसकी पूरी फिल्म दिखा चुके हैं।

      चाहे चिराग पासवान की एनडीए छोड़कर चुनाव लड़ने की वजह से हुआ हो, लेकिन इतना तय है कि इस समय तेजस्वी यादव की अगुवाई वाला महागठबंधन 110 विधायकों के साथ बिहार में मजबूत विपक्ष की भूमिका में है। तेजस्वी की आरजेडी में 15 साल बाद भी सत्ता में पहुंचते-पहुंचते पिछड़ने का गुस्सा भी है तो कम से कम अगले पांच साल के इंतजार की मजबूरी वाली मायूसी भी। राजद को पता है कि पहली कैबिनेट में 10 लाख सरकारी नौकरी देने वाला तेजस्वी का 'चुनावी शिगूफा' भले ही परिणाम नहीं बदल पाया, लेकिन बिहार के बेरोजगार युवाओं के सीने में एक आग जरूर लगा गया है। ऐसे में नीतीश सरकार को उन 19 लाख रोजगार के वादों पर भी जल्द काम शुरू करके दिखाना होगा, जिसका सब्जबाग दिखाकर सहयोगी भाजपा उनकी पार्टी की बड़ा भाई बन गई है।

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