Bihar News: बेगूसराय में पहली बार ऐसा हुआ, रुकी DM की सैलरी, 35 साल बाद इंसाफ की आस, जानिए मामला
Begusarai DM Salary On Hold: बिहार के बेगूसराय की अदालत ने पीड़ित को न्याय मिलने तक जिला मजिस्ट्रेट का वेतन रोककर सुर्खियाँ बटोरी हैं। यह असामान्य निर्णय तब आया है जब एक व्यक्ति 35 साल से न्याय की गुहार लगा रहा था, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली।
इस लंबे इंतजार के दौरान उसकी पत्नी का निधन हो गया। तेघरा मुंसिफ कोर्ट के इस फैसले को जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। यह मामला प्रोफेसर श्यामदेव पंडित सिंह और अन्य लोगों द्वारा दुलारू सिंह और अन्य के खिलाफ दर्ज किया गया था।

न्यायालय ने जिला प्रशासन को अवैध रूप से कब्जाई गई भूमि को वापस लेने का आदेश दिया था। 1999 में अनुकूल निर्णय के बावजूद प्रशासन ने एक दशक से अधिक समय तक कोई कार्रवाई नहीं की। 2014 में पटना उच्च न्यायालय ने भी पीड़ित के पक्ष में फैसला सुनाया, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।
27 सितंबर 2024 को तेघड़ा मुंसिफ कोर्ट ने जिला प्रशासन और पुलिस से उनकी निष्क्रियता के बारे में स्पष्टीकरण मांगा। लेकिन, उन्होंने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। 25 जनवरी 2025 तक बेगूसराय के पुलिस अधीक्षक (एसपी) अभी भी यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि आदेशों का पालन क्यों नहीं किया गया।
कोर्ट ने एसपी को अगली सुनवाई से पहले आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। साथ ही इस आदेश की एक प्रति बेगूसराय के मुख्य जिला एवं सत्र न्यायाधीश के माध्यम से पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी भेजी जाए।
इस फैसले से बेगूसराय में अधिवक्ताओं और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे लोगों में खुशी की लहर है। वकीलों का मानना है कि इससे न्यायपालिका में लोगों का भरोसा बढ़ेगा। यह फैसला उन पीड़ितों के लिए एक मिसाल है जो सालों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
न्यायालय ने जिला कोषागार अधिकारी को निर्देश दिया है कि न्याय मिलने तक डीएम का वेतन जारी न किया जाए। इस आदेश की प्राप्ति के सात दिन के भीतर हलफनामा दाखिल करना होगा। इसका पालन न करने पर अवमानना और अन्य कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला दशकों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है। श्यामदेव प्रसाद सिंह ने अपनी ज़मीन से अवैध कब्ज़ा हटाने के लिए केस नंबर 06/1999 के तहत शुरू में यह मामला दायर किया था, लेकिन अधिकारियों ने कई अदालती आदेशों की अनदेखी की।
वादी ने अदालत के निर्देशानुसार खर्च के रूप में 49,015 रुपये भी जमा किए थे, लेकिन उसे दस साल तक प्रशासनिक निष्क्रियता का सामना करना पड़ा। इस ऐतिहासिक फैसले का उद्देश्य अधिकारियों को उनके कर्तव्यों के प्रति जवाबदेह बनाकर इस तरह के लंबे समय से चले आ रहे अन्याय को सुधारना है।












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