Explainer: क्या कांग्रेस का खेल खराब कर रहे हैं लालू! एकतरफा बैटिंग से किसे मिल रहा है फायदा?
Lok Sabha Election 2024: बिहार में जिस तरह से महागठबंधन या इंडिया ब्लॉक में सीटों का बंटवारा हुआ है, उससे साफ है कि लालू यादव के मन की चली है। उन्होंने जिसके लिए जो सीटें तय कीं, बात वहीं पर आकर फाइनल हुई। लालू की राजनीति के सामने गठबंधन में शामिल कांग्रेस और वामपंथी दलों के एक से एक धुरंधर भी चारों खाने चित नजर आए।
बिहार में विपक्षी दलों का महागठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर उसी इंडिया ब्लॉक का हिस्सा है, जो बीजेपी और मोदी सरकार के विरोध में एक समय में 28 पार्टियों ने मिलकर बनाया था। इसकी अगुवाई नीतीश कुमार ने पटना में ही की थी और दिलचस्प बात ये है कि लालू यादव और उनकी पार्टी से मायूस होकर ही उन्होंने उसका साथ छोड़ दिया।

महागठबंधन पर हुआ लालू का फुल कंट्रोल
नीतीश के निकलने के बाद कम से कम बिहार में गठबंधन का पूरा कंट्रोल लालू यादव के हाथों में आ गया। पहले तो सीटों के बंटवारे पर बातचीत की दौर को उन्होंने बहुत लंबा खींचा। कांग्रेस और वामपंथी दलों के पास राजद के पीछे चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। नीतीश थे नहीं, जिनके सामने लालू इतनी मनमानी कर पाते। इसी दौरान लालू ने एकतरफा ही सीटों पर आरजेडी उम्मीदवारों की घोषणा भी शुरू कर दी।
लालू के चक्कर में पप्पू चुनाव से पहले हुए फेल
पप्पू यादव की पत्नी पहले से ही कांग्रेस का झंडा उठाए हुए हैं। पार्टी की उनपर इतनी मेहरबानी है कि पप्पू ने इस बार 'हाथ' से भाग्य आजमाने के लिए अपनी पार्टी का भी उसमें विलय कर दिया। इतना बड़ा फैसला लेने से पहले वे तसल्ली के लिए लालू का आशीर्वाद भी ले आए; और कभी जमकर खरी-खोटी सुना चुके उनके बेटे तेजस्वी यादव से पुराना गिला-शिकवा भुलाने की अपील भी कर आए।
पप्पू को उम्मीद थी कि उनकी पत्नी रंजीत रंजन पर 10 जनपथ का इतना भरोसा है कि पूर्णिया सीट पर कांग्रेस के टिकट पर इस बार चुनाव लड़ने की गारंटी तो पक्की है। लालू से आशीर्वाद पाकर इतने गदगद थे कि लग रहा था कि पत्नी राज्यसभा में पहुंच ही चुकी हैं, महागठबंधन का उम्मीदवार होने की वजह से उनकी भी लोकसभा में पहुंचने की संभावना बन सकती है।
सुपौल की उम्मीद पर भी फिर गया पानी
लालू ने नीतीश की पार्टी जेडीयू से आई बीमा भारती को पूर्णिया का टिकट देकर पप्पू के साथ ऐसा खेल कर दिया कि वे न इधर के रह गए और न उधर के। फिर उनके समर्थकों को इधर-उधर से यह सब्जबाग दिखाने की कोशिश हुई कि पूर्णिया न सही तो सुपौल में क्या दिक्कत है।
पप्पू यादव तो वहां से भी हाथ आजमा लेंगे। लेकिन, लालू ने कांग्रेस के लिए जो 9 सीटें छोड़ीं, उसमें 10 जनपथ के इस नए भरोसेमंद के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रहने दी गई।
लालू के मन में चल क्या रहा है?
लालू ये सब क्यों कर रहे हैं? महागठबंधन में अपने ही सहयोगियों के सामने रोड़े क्यों अटका रहे हैं? इसका जवाब सियासत के माहिर लालू यादव से ज्यादा कौन दे सकता है। जब से लालू सजायाफ्ता हुए हैं, उनकी राजनीति को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि वह सिर्फ एक मिशन पर काम कर रहे हैं। यह मिशन है, तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाना। उनके मौजूदा फैसलों में इसको लेकर कुछ संकेत जरूर मिल रहे हैं।
बेगूसराय में कन्हैया की उम्मीदों पर लगा ब्रेक!
मसलन, उन्होंने न तो फिर से पप्पू यादव को फिर से बिहार की राजनीति में चमकने मौका दिया है और न ही बेगूसराय की सीट ही कांग्रेस को दी, जहां से कन्हैया कुमार भाजपा के दिग्गज गिरिराज सिंह के खिलाफ अबकी बार महागठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर टक्कर दे सकते थे। पिछली बार सीपीआई के टिकट पर वे दूसरे नंबर पर रहे थे तो उसमें उनकी पार्टी के रोल से ज्यादा खुद उनकी भाजपा-विरोधी छवि ने अधिक काम किया था।
औरंगाबाद में भी कांग्रेस नेताओं की तोड़ी उम्मीद
इसी तरह से औरंगाबाद सीट भी कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है। पूर्व आईपीएस निखिल कुमार का यहां आज भी राजनीतिक रसूख बचा हुआ है। फिर भी लालू ने इस सीट पर अपना उम्मीदवार उतार दिया है और गठबंधन की सबसे बड़ी सहयोगी के सामने कोई मौका नहीं छोड़ा है कि वह दूसरे विकल्प पर विचार भी कर सके।
हालांकि, बिहार में सत्ताधारी गठबंधन एनडीए पिछली बार से ज्यादा मजबूत हुआ है। लेकिन, महागठबंधन ने भी जिस तरह से सभी 40 सीटों के लिए तालमेल किया है, उससे वह जोरदार टक्टर देने की स्थिति में नजर आ रहा है।
लेकिन, जिस तरह से कांग्रेस की संभावना वाली सीटों पर राजद ने अपने उम्मीदवार बिना किसी से राय लिए उतार दिए हैं, उससे सवाल उठता है कि लालू इंडिया ब्लॉक की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के साथ किस तरह का गठबंधन धर्म निभा रहे हैं?












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