मीर कासिम की 'रहस्यमयी गुफा' एक छोर मुंगेर में दूसरे का नहीं है पता, गुफा का दिलचस्प है इतिहास
हम बात कर रहे हैं मुंगेर शहर में मौजूद श्रीकृष्ण वाटिका को जो सरकार की अनदेखी की वजह से गुमनामी के पन्नों में समा गया है। इतिहास के मद्देनज़र इस पार्क की काफी अहमियत है, क्योंकि इस पार्क के अंदर ‘मीर कासिम’ की गुफा का...
मुंगेर,26 सितंबर 2022। बिहार में कई ऐतिहासिक धरोहर है जो गुमनामी का शिकार हो रही है। या यू कह लीजिए की सरकार की अनदेखी की वजह से उन धरोहरों को पर्यटक स्थल की सूची में शामिल नहीं किया जा रहा है। बिहार के मुंगेर जिला में एतिहासिक धरोहर को संजोने वाली एक पार्क है लेकिन लोग वहां घूमने जाने का खयाल भी ज़ेहन में नहीं लाते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह वहां की गंदगी है। हमेशा यहां कीचड़ और गंदा पानी ही जमा हुआ नज़र आता है। पार्क की दीवारों का रंग फीका हो गया है। वहीं इमारते जर्जर हो चुकी है। पार्क की चीज़े बेकार हो चुकी हैं।

250 साल पुरानी मीर कासिम की गुफा
हम बात कर रहे हैं मुंगेर शहर में मौजूद श्रीकृष्ण वाटिका को जो सरकार की अनदेखी की वजह से गुमनामी के पन्नों में समा गया है। इतिहास के मद्देनज़र इस पार्क की काफी अहमियत है, क्योंकि इस पार्क के अंदर 'मीर कासिम' की गुफा का तारीख दफ्न है। मीर कासिम की इस गुफा को रहस्यमयी गुफा के नाम से भी लोग जानते हैं, इसके पीछ की वजह बताई जाती है कि 250 साल पुराने इस गुफा का एक छोर तो मुंगेर में है, लेकिन दूसरे छोर का पता नहीं चल पाया है।

अंग्रेज़ों के हमले से बचने के लिए बनाई गुफा
मीर कासिम की गुफा का इतिहास भी काफी रोचक रहा है। इसके बावजूद सरकार की बेरुखी का 'रहस्यमयी गुफा' शिकार है। बिहार में मुगलकाल की बात करने पर मुंगेर का नाम सबसे पहले शुमार किया जाता है। बुजुर्ग बताते हैं कि मुंगेर में गंगा नदी के कष्टहरणी घाट किनारे नवाब मीर कासिम ने एक खुफिया गुफा का निर्माण करवाया था।1760 ई. अंग्रेज़ों के हमले से बचने के लिए इस रहस्यमयी गुफा बनाई गई थी।

मीर कासिम की रहस्यमयी गुफा का इतिहास
मुंगेर में इस गुफा का एक छोर आज भी नज़र आता है, लेकिन गुफा के दूसरे छोर को लेकर किसी के पास सही जानकारी नहीं है। जितने लोगों से पूछें उतनी बातें सामनें आती रही हैं। एक लफ्ज़ मे कहा जाए तो सिर्फ़ अटकलें ही लगाई गई हैं। गुफा का दूसरा छोर मुंगेर के मुफस्सिल थाना क्षेत्र की पीर पहाड़ी के पास निकलने की बात कही जाती है, लेकिन आज तक इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है।

बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद से बदल कर किया मुंगेर
बुजुर्ग बताते हैं कि 1760 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के नवाब मीर कासिम मुंगेर पहुंचे तो तुरंत एक फैसला लिया। मुर्शिदाबाद से बंगाल की राजधानी बदलकर मुंगेर में कर दिया। 1760 में वह मुंगेर आये तो 1764 तक वहीं रहे। इ, दौरान उन्होंने खुद को अंग्रेज़ों से महफूज रखने के लिए मुंगेर को किले में तब्दील कर दिया। शहर को किला में तब्दील करते हुए चारों तरफ मज़बूत और ऊंची दीवारों का निर्माण करवाया गया । इसके साथ ही चारों दिशाओं में पत्थर से चार विशाल दरवाज़े की तामीर की गई। जो कि आज भी मौजूद है और इस बात की गवाही दे रहे हैं।

प्रिंस बहार और राजकुमारी गुल का मकबरा
बुजुर्गों की मानें तो मीर कासिम के बेटे प्रिंस बहार और बेटी राजकुमारी गुल का मकबरा भी इसी वाटिका में है। इस गुफा से छुपकर वह दोनों जा रहे थे। इसी दौरान अग्रेस सिपाहियों ने उन्हें मार दिया था। ऐतिहासिक धरोहर के पर यहां काफी कुछ ऐतिहासिक धरोहरों के तौर पर मौजूद है। इसके बावजूद यहां कुछ भी आकर्षण नहीं है औऱ ना ही कोई सुविधा है। इस वाटिक में एट्री फीस भी नहीं लगती फिर कोई घूमने नहीं आता है। दूर से तो छोड़िए स्थानीय लोग भी यहां आने से परहेज़ ही करते हैं। प्रशासन ने इस गुफा को महफूज़ रखने के लिए चारों तरफ से घेर कर एक छोटे से पार्क के तौर पर श्रीकृष्ण वाटिका का निर्माण करवा दिया है। लेकिन इस ओर सरकार को बिल्कुल भी ध्यान नहीं है। यही वजह है कि ऐतिहासिक धरोहर होते हुए भी मीर कासिम की रहस्यमायी गुफा गुमनामी का शिकार है।
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