IOCL Barauni: बरौनी रिफ़ाइनरी से हम लोगों को क्या मिला है, आप नहीं दिखा सकते हैं, ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
IOCL Barauni News: बिहार के बेगूसराय जिला को औद्योगिक नगरी की संज्ञा दी जाती है। यहां कई बड़े उद्योग भी हैं। हिंदुस्तान फर्टिलाइज़र कॉर्पोरेशन लिमिटेड, पेप्सी प्लांट और इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लिमिटेड जैसी बड़ी कंपनिया हैं। IOCL बरौनी रिफाइनरी दुनिया के मशहूर कारखानों में से एक है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यहां ज़िंदगी नर्क से बदतर हो रही है।
वन इंडिया हिंदी से बात करते हुए बरौनी रिफ़ाइनरी के आस-पास के गांव (सबौरा, महना, नूरपूर, देवना. सिघौल आदि) में रहने वाले लोगों ने बेबाबाकी से अपनी बात रखी। ग्रामीणों का आरोप है कि हमारे क्षेत्र में प्रदूषण बढ़ने की वजह यह बरौनी रिफ़ाइनरी है। स्थानीय लोगों के बच्चे बेरोज़गार हैं, लेकिन रिफ़ाइनरी में उन्हें नौकरी नहीं मिलती है।

हम लोग रिफाइनरी द्वारा छोड़े जाने वाले ज़हरीले गैस का सेवन कर रहे हैं। हमारे बच्चों को थर्ड पार्टी वेंडर और ठेकेदारों द्वारा रिफ़ाइनरी में काम करवाया जाता है। परमानेंट नौकरी के बारे में सोचना तो जैसे पाप है। ठेकेदार द्वारा रिफ़ाइनरी में काम करने के दौरान हमारे बच्चों के साथ कुछ हादसा होता है, तो उचित मुआवज़ा भी नहीं दिया जाता है।
कुछ दिन पहले रिफाइनरी में काम करने के दौरान एक युवक करीब 30 मीटर की ऊंचाई से गिरा और मौके पर ही उसकी मौत हो गई। लेकिन रिफाइनरी प्रबंधन और ठेकेदार द्वारा कहा गया कि जीवित है, इलाज के लिए अस्पताल ले जा रहे हैं। हमेशा ही इस तरह से मौके से शव को किनारा कर दिया जाता है, ताकि लोग आंदोलन पर नहीं करे।
पीड़ित परिवार और मज़दूरों के आश्रितों को सरकार द्वारा बनाये नियम और कानून के तहत मुआवज़ा नहीं मिलता है। स्थानीय ठेकेदार बाहुबल दिखाते हुए मामले को दबा देते हैं। मीडिया के लोगों को भी रिफ़ाइनरी प्रबंधन और ठेकेदार द्वारा पैसे दिये जाते हैं। इसलिए इस तरह के गंभीर मुद्दे पर कोई हेडलाइन नहीं बनती है।
नूरपूर गांव (बेगूसराय) के रहने वाले मोहम्मद मेराज ने वन इंडिया हिंदी से बात करते हुए कहा कि मैंने बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम के तहत विभिन्न मुद्दों पर शिकायत की थी। वायु प्रदूषण के मामले में जांच की गई, अनियमितता भी पाई गईं थी। आरोपी पक्ष को नियमित रूप से निगरानी करने का आदेश भी मिला था, लेकिन यह सारे मामले काग़ज़ों तक ही रह जाते हैं। हक़ीक़त में कोई कार्रवाई नहीं होती है।
स्थानीय लोगों को रिफाइनरी द्वारा सुविधाओं के नाम पर स्वास्थ्य शिविर लगाया जाता है, जो कि सिर्फ खानापूर्ति है। कुछ गिनी चुनी दवाओं को 10 से 20 लोगों के बीच बांटकर तस्वीरें ले ली जाती हैं और स्वास्थ शिविर काग़ज़ों पर कामयाब नज़र आता है।
स्वास्थ्य शिविर लगाने का मतलब है कि ग्रामीणों की पूरी तरह से जांच की जाए। शुगर, ब्लड प्रेशर, आंख, कान और नाक आदि से जुड़ी समस्याओं की जांच हो। खून जांच, बॉडी चेकअप आदी की जाए, लेकिन यह सब कुछ भी नहीं होता है।
प्रदूषण की रोकथाम के लिए 'स्वच्छ भारत और हरित भारत' नाम से मुहिम चलाते हैं। उसके तहत गिने चुने कुछ लोगों को गांव के मुखिया के पास जाकर उनके द्वारा ग्रामीणों को किट दिये जाते हैं। उस पैकेट में साबुन, हैंडवाश, रूमाल रहता है। एक पौधा दे दिया जाता है।
यह भी गांव के हर व्यक्ति को नहीं, गिने चुने लोगों को दिया जाता है। इसकी तस्वीर ले ली जाती है। इस तस्वीर के माध्यम से कागज़ों पर दिखा दिया जाता है, ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच किट और पौधे बांटे गए हैं, लेकिन यह काग़ज़ों पर हकीकत है, जमीनी स्तर पर सिर्फ फसाना है।












Click it and Unblock the Notifications