'जींस-शर्ट' वाले दीपक प्रकाश को मिला कौन सा मंत्रालय? बेटे को मंत्री बनाए जाने पर कुशवाहा ने तोड़ी चुप्पी?
Deepak Prakash Panchayati Raj Vibhag: नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण के ठीक एक दिन बाद शुक्रवार (21 नवंबर) को नई सरकार में विभागों का बंटवारा कर दिया गया। सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहे उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश, जो शपथ के दौरान जींस और शर्ट में नजर आए थे, अब पंचायती राज विभाग के मंत्री बनाए गए हैं।
सोशल मीडिया पर दीपक प्रकाश के पहनावे को लेकर खूब बहस हुई थी, लेकिन मंत्रालय मिलने के बाद अब चर्चा इस बात की है कि उन्हें कैसा जिम्मा सौंपा गया है। इसके अलावा परिवारवाद का भी उपेंद्र कुशवाहा पर आरोप लग रहा है। सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि इनके पिता सांसद हैं, मां स्नेहलता कुशवाहा सासाराम से इसी बार चुनाव जीती हैं और वो विधायक बनी हैं। अब बेटा बिना चुनाव लड़े मंत्री बन गए हैं। अब उपेंद्र कुशवाहा ने बेटे को मंत्री बनाए जाने पर चुप्पी तोड़ी है।

बेटे को मंत्री बनाए जाने पर उपेंद्र कुशवाहा ने क्या-क्या कहा?
उपेंद्र कुशवाहा ने 21 नवंबर को एक्स पोस्ट में बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने पर चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने लिखा, "कल से मैं देख रहा हूं,हमारी पार्टी के निर्णय को लेकर पक्ष और विपक्ष में आ रही प्रतिक्रियाएं, उत्साहवर्धक भी, आलोचनात्मक भी! आलोचनाएं स्वस्थ भी हैं, कुछ दूषित और पूर्वाग्रह से ग्रसित भी। स्वस्थ आलोचनाओं का मैं हृदय से सम्मान करता हूं। ऐसी आलोचनाएं हमें बहुत कुछ सिखाती हैं, संभालती हैं। क्योंकि ऐसे आलोचकों का मकसद पवित्र होता है। दूषित आलोचनाएं सिर्फ आलोचकों की नियत का चित्रण करती हैं। दोनों प्रकार के आलोचकों से कुछ कहना चाहता हूं।''
उन्होंने आगे लिखा, ''पहले स्वस्थ आलोचकों से:- आपने मेरे उपर परिवारवाद का आरोप लगाया है। मेरा पक्ष है कि अगर आपने हमारे निर्णय को परिवारवाद की श्रेणी में रखा है, तो जरा समझिए मेरी विवशता को। पार्टी के अस्तित्व व भविष्य को बचाने व बनाए रखने के लिए मेरा यह कदम जरुरी ही नहीं अपरिहार्य था। मैं तमाम कारणों का सार्वजनिक विश्लेषण नहीं कर सकता, लेकिन आप सभी जानते हैं कि पूर्व में पार्टी के विलय जैसा भी अलोकप्रिय और एक तरह से लगभग आत्मघाती निर्णय लेना पड़ा था। जिसकी तीखी आलोचना बिहार भर में हुई। उस वक्त भी बड़े संघर्ष के बाद आप सभी के आशीर्वाद से पार्टी ने सांसद, विधायक सब बनाए। लोग जीते और निकल लिए। झोली खाली की खाली रही। शुन्य पर पहूंच गए। पुनः ऐसी स्थिति न आए, सोचना जरूरी था।''
उन्होंने आगे लिखा, ''सवाल उठाइए, लेकिन जानिए। आज के हमारे फैसले की जितनी आलोचना हो, लेकिन इसके बिना फिलहाल कोई दूसरा विकल्प फिर से शुन्य तक पहुंचा सकता था। भविष्य में जनता का आशीर्वाद कितना मिलेगा, मालूम नहीं। परन्तु खुद के स्टेप से शुन्य तक पहुंचने का विकल्प खोलना उचित नहीं था। इतिहास की घटनाओं से यही मैंने सबक ली है। समुद्र मंथन से अमृत और जहर दोनों निकलता है। कुछ लोगों को तो जहर पीना ही पड़ता है। वर्तमान के निर्णय से परिवारवाद का आरोप मेरे उपर लगेगा। यह जानते/समझते हुए भी निर्णय लेना पड़ा, जो मेरे लिए जहर पीने के बराबर था। फिर भी मैंने ऐसा निर्णय लिया। पार्टी को बनाए/बचाए रखने की जिद्द को मैंने प्राथमिकता दी। अपनी लोकप्रियता को कई बार जोखिम में डाले बिना कड़ा/बड़ा निर्णय लेना संभव नहीं होता। सो मैंने लिया।''
कुशवाहा ने आखिर में लिखा, ''पूर्वाग्रह से ग्रसित आलोचकों के लिए बस इतना ही:- "सवाल जहर का नहीं था,वो तो मैं पी गया। तकलीफ उन्हें तो बस इस बात से है कि मैं फिर से जी गया।'' अरे भाई, रही बात दीपक प्रकाश की तो जरा समझिए -विद्यालय की कक्षा में फेल विद्यार्थी नहीं है। मेहनत से पढ़ाई करके कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की डिग्री ली है, पूर्वजों से संस्कार पाया है उसने। इंतजार कीजिए, थोड़ा वक्त दीजिए उसे। अपने को साबित करने का। करके दिखाएगा। अवश्य दिखाएगा। आपकी उम्मीदों और भरोसा पर खरा उतरेगा। वैसे भी किसी भी व्यक्ति की पात्रता का मूल्यांकन उसकी जाति या उसके परिवार से नहीं, उसकी काबिलियत और योग्यता से होना चाहिए।आप सबों का आभार।''
दीपक प्रकाश की पूरी कहानी
राजनीतिक माहौल में पली-बढ़ी परवरिश
दीपक प्रकाश ऐसे परिवार से आते हैं, जहां राजनीति और सामाजिक कामकाज हमेशा से जीवन का हिस्सा रहे हैं। उनके दादा, स्वर्गीय मुनेश्वर सिंह, जंदाहा के प्रसिद्ध समाजसेवी थे और समता कॉलेज की स्थापना में उनकी बड़ी भूमिका रही थी। इस वजह से बचपन से ही दीपक का माहौल सामाजिक और सार्वजनिक गतिविधियों से जुड़ा रहा।
पिता की राजनीतिक विरासत से मिला बड़ा मंच
उनके पिता उपेंद्र कुशवाहा बिहार की राजनीति का जाना-माना नाम हैं। वे राज्यसभा सांसद, लोकसभा सांसद, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और केंद्र में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री रह चुके हैं। राजनीति के साथ-साथ वे लंबे समय तक समता कॉलेज, जंदाहा में प्रोफेसर भी रहे। ऐसे में यह साफ है कि दीपक का बचपन राजनीति, शिक्षा और सामाजिक जीवन की मिश्रित विरासत में बीता।
मां भी विधायक, घर में राजनीति पुरानी परंपरा
दीपक की मां स्नेहलता कुशवाहा भी सक्रिय राजनीति में हैं और इस बार सासाराम से विधायक चुनी गई हैं। यानी परिवार में राजनीति नई बात नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है।
कितने पढ़े-लिखे हैं दीपक प्रकाश?
- दीपक का जन्म 22 अक्टूबर 1989 को हुआ। उनकी शुरुआती पढ़ाई पटना में हुई।
- 2005: ICSE बोर्ड से 10वीं पास
- 2007: CBSE बोर्ड से 12वीं पास
- 2011: MIT मणिपाल से कंप्यूटर साइंस में B.Tech पूरा
तकनीकी शिक्षा पूरी करने के बाद वे 2011 से 2013 तक एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम करते रहे। कुछ साल नौकरी करने के बाद उन्होंने कॉरपोरेट दुनिया छोड़कर बिजनेस की ओर कदम बढ़ाए और इसके बाद राजनीति में सक्रिय हुए।
राजनीति में एंट्री-धीरे-धीरे लेकिन मजबूती के साथ
हालांकि वे बचपन से राजनीतिक माहौल में थे, लेकिन उनकी सक्रिय भूमिका 2019-20 के आसपास शुरू हुई। इसी दौरान उन्होंने पिता के संगठनात्मक कामकाज में सहयोग देना शुरू किया। युवाओं से जुड़े मुद्दों, पार्टी की रणनीति और सामाजिक न्याय के एजेंडे को समझते हुए वे धीरे-धीरे एक पहचान बना पाए।
अब मंत्री-लेकिन छह महीने में MLA/MLC बनना जरूरी
कैबिनेट में शामिल होने के बाद दीपक के सामने अब संवैधानिक औपचारिकता भी खड़ी है। चूंकि वे चुनाव जीतकर नहीं आए हैं, इसलिए उन्हें छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना होगा। चर्चाओं के मुताबिक NDA-RLM के बीच पहले ही यह तय हो चुका था कि मंत्री पद के साथ उन्हें एमएलसी की सीट भी दी जाएगी। यानी उनका राजनीतिक सफर अब औपचारिक रूप से भी तेजी पकड़ने वाला है।












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