Bihar Politics: 'JDU की तीर' से कांग्रेस ने HAM को किया घायल!, NDA के वोट बैंक में महागठबंधन की सेंधमारी

Bihar Politics: बिहार में आगामी चुनाव के मद्देनज़र राजनीतिक दलों विभिन्न समुदायों के वोट बैंक को साधने में लगे हुए हैं। इसी क्रम में कांग्रेस ने मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए जदयू के तीर से जीतन मांझी को घायल कर दिया है। आइए विस्तार से मसझते हैं सियासी समीकरण।

"माउंटेन मैन" के नाम से मशहूर दशरथ मांझी के बेटे भागीरथ मांझी को कांग्रेस ने अपने पाले में कर लिया है। पहले जेडीयू से जुड़े रहे भागीरथ मांझी ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली है। 2025 बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर यह कांग्रेस का मास्टस्ट्रोक माना जा रहा है। NDA के वोट बैंक में सेंधमारी हो सकती है।

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भागीरथ मांझी जिस मुसहर जाति से आते हैं, वह बिहार की आबादी का करीब 3 प्रतिशत है। यह जाति गया और जहानाबाद जैसे इलाकों में खास तौर पर चुनाव जिताने में निर्णायक भूमिका में मौजूद है। उनके पिता की विरासत को देखते हुए, कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि भगीरथ के साथ आने से उसे फ़ायदा होगा।

दशरथ मांझी पहाड़ काटकर रास्ता बनाने के अपने असाधारण कारनामे के लिए पूरे भारत में मशहूर हैं। वहीं दूसरी तरफ़ भागीरथ मांझी राजनीति में सक्रिय रूप से शामिल नहीं रहे। लेकिन बाद में उन्होंने जदयू की सदस्यता ली और अब विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में शामिल हो गए।

राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या भागीरथ के आने से सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन पर कोई असर पड़ेगा, जिसमें जीतन राम मांझी एक प्रमुख नेता हैं। जीतन राम मांझी का मुसहर समुदाय में खासा प्रभाव है, खासकर गया जिले में उन्हें अपने समुदाय का बड़ा नेता माना जाता है।

दशरथ मांझी का नाम तो वजनदार है, लेकिन भागीरथ के पास राजनीतिक अनुभव की कमी उनके प्रभाव को सीमित कर सकती है। अगर भागीरथ को दलित नेता के तौर पर आगे बढ़ाया जाए और उन्हें कोई अहम भूमिका या विधानसभा सीट दी जाए तो कांग्रेस को फायदा हो सकता है। जहानाबाद और गया की 13 विधानसभा सीटों पर मुसहर समुदाय का वोट बैंक अहम है।

इनमें से चार सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। अगर कांग्रेस इनमें से किसी एक सीट से भागीरथ को मैदान में उतारती है तो वोटों का झुकाव उसके पक्ष में हो सकता है। क्षेत्र से परिचित एक अन्य पत्रकार मुकेश पांडे कहते हैं कि भागीरथ का अपने गांव गेहलौर में भी प्रभाव नहीं है।

इसके बावजूद, अगर वह कांग्रेस के बैनर तले चुनाव लड़ते हैं, तो इससे संभावित रूप से कुछ वोट जीतन राम मांझी से दूर हो सकते हैं। 2007 में दशरथ मांझी के निधन के बाद से नीतीश कुमार की सरकार ने गेहलौर गांव में कई विकास परियोजनाएं शुरू की हैं।

इनमें स्ट्रीट लाइट और सड़क जैसी सुविधाओं के साथ इसे पर्यटन स्थल में बदलना शामिल है। दशरथ के सम्मान में एक संग्रहालय और स्मृति भवन भी बनाया गया है। नीतीश प्रशासन ने दशरथ के परिवार को सीमित प्रत्यक्ष लाभ प्रदान किए, लेकिन उनकी पोती को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में नियुक्त किया और इंदिरा आवास योजना के तहत आवास सहायता की पेशकश की।

इन प्रयासों के बावजूद, मांझी समुदाय नीतीश कुमार के प्रति अपेक्षाकृत उदासीन बना हुआ है। आगामी चुनाव यह बताएंगे कि क्या कांग्रेस भागीरथ के आगमन का लाभ उठाकर मुसहर मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बना पाएगी या फिर जीतन राम मांझी का प्रभाव इस जनसांख्यिकीय क्षेत्र पर हावी रहेगा।

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