Chirag Paswan: दलितों में सबसे 'ताकतवर' जाति के हैं चिराग पासवान? बिहार की कास्ट पॉलिटिक्स में कितनी है पकड़?
Bihar Politics (Chirag Paswan): बिहार की राजनीति में अगर सबसे अहम फैक्टर की बात की जाए तो जाति हमेशा सबसे ऊपर रही है। यहां चुनाव हो या टिकट बंटवारा, हर चीज जातिगत समीकरण देखकर तय होती है। विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने से पहले पार्टियां यह गणना करती हैं कि किस जाति की कितनी आबादी है और कौन-सी जातियां एक-दूसरे की विरोधी या सहयोगी हैं।
ऐसे में जब बिहार चुनाव की चर्चा होती है तो जाति को नजरअंदाज करना नामुमकिन है। ऐसे में वनइंडिया की खास सीरिज "जाति की पाति" में हम नेताओं के बारे में बताएंगे, जिनकी जाति, समुदाय और पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उनके राजनीतिक करियर को दिशा दी। इस लेख में बात लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान की। कास्ट पॉलिटिक्स में चिराग पासवान बड़ा नाम हैं।

Chirag Paswan Caste: चिराग पासवान किस जाति से हैं?
चिराग पासवान, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और दिवंगत केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के बेटे हैं। वे दुसाध यानी पासवान जाति से आते हैं, जिसे बिहार में दलित समाज की सबसे प्रभावशाली जाति माना जाता है।
पासवान समाज को दलित वोटबैंक का सबसे मजबूत स्तंभ कहा जाता है। 2023 की जातीय जनगणना के मुताबिक, बिहार की कुल आबादी में पासवान जाति का हिस्सा करीब 5.3% (लगभग 69 लाख लोग) है। यह संख्या यादवों के बाद दूसरी सबसे बड़ी और संगठित मानी जाती है। दलित वोटबैंक में अकेले पासवान समाज का हिस्सा करीब 27% है।

दलित राजनीति का 'पासवान फैक्टर'
बिहार की दलित राजनीति पर लंबे समय तक रामविलास पासवान का दबदबा रहा। भोला पासवान शास्त्री और रामविलास पासवान -ये दोनों ही बड़े नेता पासवान जाति से थे। चिराग उसी परंपरा के वारिस माने जाते हैं।
राजनीतिक पिच पर पासवान वोटरों की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि उनकी संख्या अकेले किसी पार्टी को सत्ता तक न सही, लेकिन किसी गठबंधन को हार-जीत दिलाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। यही वजह है कि चाहे एनडीए हो या महागठबंधन, हर दल चिराग पासवान के साथ खड़ा होना चाहता है।
नीतीश कुमार और 'महादलित कार्ड'
बिहार की राजनीति में एक वक्त ऐसा भी आया जब नीतीश कुमार ने दलितों को दो हिस्सों -दलित और महादलित -में बांट दिया। उन्होंने पासवान (दुसाध) जाति को छोड़कर बाकी 21 दलित जातियों को महादलित का दर्जा दे दिया। इसका असर यह हुआ कि पासवान समाज और एलजेपी (रामविलास) का वोटबैंक अलग-थलग हो गया। लेकिन इसके बावजूद पासवान समुदाय की संगठित ताकत ने चिराग पासवान को एक बड़ा राजनीतिक खिलाड़ी बनाए रखा।

बिहार में पासवान जाति का पॉलिटिकल इम्पैक्ट
बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से 38 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इनमें पासवान जाति का वोट निर्णायक माना जाता है। यही वजह है कि हर चुनाव में पासवान समाज का झुकाव जिस पार्टी की तरफ होता है, उसकी जीत की संभावना और बढ़ जाती है।
दूसरी तरफ, पासवान समाज केवल बिहार ही नहीं, बल्कि झारखंड और उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी असर रखता है। यही वजह है कि चिराग पासवान का कद सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार बढ़ रहा है।
चिराग पासवान का निजी जीवन और करियर
चिराग रामविलास पासवान जन्म 31 अक्टूबर 1982 को हुआ। 2024 से चिराग भारत सरकार में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के केंद्रीय मंत्री हैं और हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। राजनीति में आने से पहले चिराग पासवान ने फिल्मी दुनिया में भी किस्मत आजमाई थी। 2011 में वह "मिले ना मिले हम" फिल्म में नजर आए। हालांकि, यह फिल्म चली नहीं और चिराग ने राजनीति का रास्ता चुना। 2014 में उन्होंने जमुई लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था और भारी मतों से जीते थे।
शिक्षा में चिराग कंप्यूटर इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे, लेकिन उन्होंने कॉलेज बीच में छोड़ दिया था। चिराग अपने राज्य के बेरोजगार युवाओं के लिए "रोजगार फाउंडेशन" चला रहे हैं। 2021 में उन्होंने अयोध्या राम मंदिर निर्माण में योगदान दिया। राजनीतिक रणनीति में चिराग अपने पार्टी नेतृत्व और युवा वोटबैंक को जोड़कर बिहार में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं।

क्या दलितों का सबसे बड़ा 'ताकतवर कार्ड' हैं चिराग?
अगर जातिगत समीकरण देखें तो चिराग पासवान न सिर्फ दलित राजनीति के अहम चेहरा हैं, बल्कि यादवों के बाद सबसे बड़ा वोटबैंक पासवान जाति होने की वजह से उन्हें 'किंगमेकर' भी माना जाता है।
भले ही अकेले दम पर चिराग की पार्टी बिहार की सत्ता तक न पहुंच पाए, लेकिन गठबंधन की राजनीति में उनकी ताकत इतनी है कि वे किसी भी समीकरण का खेल बदल सकते हैं।












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