भाजपा की वजह से घटा सियासी क़द, फिर भी BJP के साथ क्यों जा रहे चिराग पासवान, समझिये गणित
Bihar By Election : चिराग पासवान ने मीडिया से मुखातिब होते हुए कहा था कि गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात कर कई मुद्दों पर चर्चा हुई जो कि आगे भी जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी भाजपा उम्मीदवारों को जिताने की हर....
Bihar By Election : बिहार में उपचुनाव को लेकर सियासी समीकरण भी बदले-बदले नज़र आ रहे हैं। गोपालगंज सीट पर जहां जदयू नेता श्यम सुंदर (पूर्व विधायक) ने भाजपा उम्मीदवार कुसुम देवी को समर्थन दे दिया है। वहीं अब एलजेपी में दरार पड़ने के बाद एनडीए से किनारा कर चुके चिराग पासवान ने भाजपा उम्मीदवार को समर्थन देने का ऐलान किया है। सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज़ है कि भाजपा की वजह से चिराग का सियासी कद घट गया, इसके बावजूद वह भाजपा से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं। आखिर इसके पीछे की वजह क्या है ? सियासी गलियारों में तेज़ हुए चर्चा के बीच हम आपको राजनीतिक समीकरण बताने जा रहे हैं कि क्या-क्या संभावनाएं हो सकती हैं।
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क्या NDA में जाएंगे चिराग पासवान ?
चिराग पासवान ने मीडिया से मुखातिब होते हुए कहा था कि गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात कर कई मुद्दों पर चर्चा हुई जो कि आगे भी जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी भाजपा उम्मीदवारों को जिताने की हर मुमकिन कोशिश करेगी। चिराग पासवान के इस बयान के बाद सियासी गलियारों में संभावनाओं की सियासत शुरू हो गई। यह चर्चा तेज़ है कि आने वाले दिनों में चिराग पासवान फिर से एनडीए का दामन थामेंगे। हालांकि चिराग पासवान ने एनडीए में जाने की बात पर स्थिति साफ नहीं की है। वहीं उन्होंने कहा कि भाजपा के साथ भविष्य में गठबंधन के लिए भाजपा से बातचीत जारी रहेगी।

चिराग को लगा सियासी झटका
बिहार में बदले सियासी समीकरण को देखते हुए यह बात तो साफ है कि भाजपा के साथ चिराग पासवान के संबंध फिर से मधुर हो रहे हैं। जो कि आने वाले समय में नए सियासी समीकरण तैयार करने की ओर इशारा कर रही है। आपको बता दें कि रामविलास पासवान (चिराग पासवान के पिता) एनडीए में शामिल थे। इसके साथ-साथ वह मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री की ज़िम्मेदारी भी संभाल रहे थे। 2020 में जब रामविलास पासवान का निधन हुआ तो उनके सियासी विरासत को संवारने के लिए चिराग पासवान औऱ पशपति पारस (चिराग के चाचा) के बीच तकरार भी हुई। पशुपति पारस ने ऐसा दांव खेला कि एलजेपी के सभी सांसद उनके साथ हो गए और पशुपति पारस तेंद्रीय मंत्री बन गए। वहीं चिराग को तगड़ा सियासी झटका लगा और वह अकेले रह गए।

भाजपा के साथ मिलकर तलाश रहे भविष्य !
एलजेपी में ऐसी दरार पड़ी की पार्टी तक अलग हो गई। चिराग पासवान को लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) नाम से नई पार्टी बनानी पड़ी। वहीं पिता के निधन के बाद चिराग पासवान को भाजपा की तरफ़ से भी ज्यादा तवज्जो नहीं मिला । वह पार्टी और पद सभी चीज़ों से महरूम रह गए। पिता के निधन के बाद पार्टी टूटी तो चिराग पासवान को अपना वजूद बचाने के लिए सहारे की ज़रूरत पड़ने लगी। यह बात चिराग भी बखूबी जानते हैं कि वह बिहार की सियासत में अकेले खुद के बल पर कामयाब नहीं हो सकते हैं। वहीं क्षेत्रीय पार्टी तो महागठबंधन के साथ है। ऐसे में उन्हें विकल्प के तौर पर भाजपा ही दिखी जहां उनका सियासी भविष्य सुरक्षित रह सकता है। इसलिए वह भविष्य में एनडीए के साथ जा सकते हैं।

6 फीसद मतदाता पर पासवान समुदाय की सियासत
बिहार में चिराग पासवान के पास एनडीए के साथ जाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं हैं, इसके कई कारण हैं। बिहार में सियासी समीकरण बदलने के बाद महागठबंधन की सरकार बनी जिसमें चिराग पासवान को जगह नही मिली। बिहार में वोट बैंक की बात की जाए तो जातीय समीकरणों से प्रदेश की सियासत चलती है। इसमे सबसे ज्यादा दबदबा ओबीसी और दलित समुदायों का है। प्रदेश के 55 फीसद ओबीसी मतदाताओं पर जदयू और राजद का क़ब्ज़ा है। इसके अलावा प्रदेश में 16 फीसदी दलितों की आबादी है। इसमें पासवान वोटर की तादाद 6 फीसद है जो कि एलजेपी की प्रो वोटर्स माने जाते हैं। वहीं एलजेपी में पड़ी दरार की वजह से इन मतदाताओं के फीसद भी बदल सकते हैं।

संभावनाओं की सियासत कर रहे चिराग
पासवान मतदाताओं के 6 फीसद के सहारे ही एलजेपी की सियासत ट्रैक पर रहती है। चूंकि अब एलजेपी में दरार है तो, चिराग पासवान और पशुपति पारस के बीच अपने वोट बैंक को बचान सबसे बड़ी चुनौती है। पशुपति पारस एनडीए में शामिल हैं। वहीं चिराग पासवान भी संभावनाओं की सियासत कर भाजपा से करीब होने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि आने वाले समय में वह अपने वोट बैंक को समेट सकें। इसलिए ही उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशियों के समर्थन में उतर कर चिराग पासवान अपना श्कति प्रदर्शन करना चाह रहे हैं ताकि भविष्य में वह अपने सियासी सफर को आसानी से तय कर सकें।
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