Bihar SIR: बिहार वोटर लिस्ट में दिखा दिलचस्प ट्रेंड, जिलेवार आंकड़ों में जो सामने आया, वो चौंकाने वाला

Bihar SIR News: बिहार की नई वोटर लिस्ट जो विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) प्रक्रिया के बाद तैयार की गई है, इसको लेकर विवाद जारी है। 01 अगस्त को चुनाव आयोग द्वारा जारी की गई नई लिस्ट में राज्य में कुल 7.24 करोड़ मतदाताओं को सूची में जगह मिली है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जनवरी 2025 में जारी की गई वोटर लिस्ट से यह संख्या करीब 56 लाख कम है। यानी इतने मतदाता अब सूची में शामिल नहीं हैं।

चुनाव आयोग के मुताबिक ये नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि संबंधित व्यक्ति की मौत हो चुकी है, किसी का नाम दो जगह दर्ज था, कोई स्थायी रूप से बिहार से बाहर चला गया है, या फिर वे अब "अनट्रेसेबल" यानी पता नहीं चल पा रहे हैं। लेकिन जिलेवार विश्लेषण में चौंकाने वाला ट्रेंड और आंकड़े सामने आए हैं।

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मुस्लिम बहुल जिलों में ज्यादा नाम कटे?

जब नई सूची का जिलेवार विश्लेषण किया गया तो एक दिलचस्प लेकिन गंभीर ट्रेंड सामने आया है। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक जिलेवार विश्लेषण से सामने आया है कि जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है (2011 की जनगणना के अनुसार), वहां से मतदाताओं के नाम ज्यादा हटाए गए हैं। (वनइंडिया हिंदी इन दावों की पुष्टि नहीं करता है)

इस विश्लेषण के मुताबिक जिन जिलों में मुस्लिम जनसंख्या ज्यादा थी, वहां वोटर लिस्ट से नाम कटने की संख्या भी आम तौर पर अधिक थी। लेकिन -यह कहना कि मुसलमानों को ही असमान रूप से (disproportionately) बाहर किया गया, इसके लिए और गहराई से विश्लेषण करना जरूरी है। फिलहाल ये आंकड़े केवल एक संकेत दे रहे हैं, निष्कर्ष नहीं।

दूसरी ओर, अनुसूचित जातियों (Scheduled Castes - SC) को लेकर ठीक उल्टा ट्रेंड देखा गया। जब SC जनसंख्या के प्रतिशत की तुलना वोटर लिस्ट से हटे नामों की संख्या से की गई, तो नकारात्मक संबंध पाया गया है। इसका सीधा मतलब है कि जिन जिलों में SC आबादी अधिक थी, वहां वोटर लिस्ट से नाम कटने की संख्या अपेक्षाकृत कम रही। यह भी एक दिलचस्प सामाजिक संकेत है, लेकिन इस पर भी और विस्तार से अध्ययन की जरूरत है कि किन वजहों से यह अंतर आया।

बिहार SIR पर ओवैसी का हमला: 'मुस्लिम इलाकों को बनाया गया निशाना'

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में मतदाता सूची की SIR प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया का सबसे ज्यादा असर उन जिलों पर पड़ा जहां मुस्लिम आबादी अधिक है।

ओवैसी ने कहा, "बिहार SIR का नतीजा बिल्कुल साफ है-56 लाख नाम काटे गए हैं। सबसे ज्यादा नाम उन्हीं इलाकों से हटे हैं जहां मुसलमानों की आबादी ज्यादा है और जहां के लोग आजीविका के लिए पलायन करते हैं।"

उन्होंने आगे कहा कि इस प्रक्रिया से सबसे अधिक नुकसान समाज के उन कमजोर तबकों को हो रहा है, जिनके पास अपने मताधिकार के अलावा कोई और आवाज या मंच नहीं है। ओवैसी ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताते हुए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग दोनों पर निशाना साधा।

ओवैसी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब राज्य में 2025 विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया राजनीतिक बहस के केंद्र में है।

सूत्रों के मुताबिक, ओवैसी के आरोपों पर चुनाव आयोग का कहना है कि "अगर किसी मतदाता का नाम सूची से हट गया है, तो वह निर्धारित समयसीमा में दावा या आपत्ति दर्ज करा सकता है। यदि जाँच में दावा सही पाया गया, तो संबंधित व्यक्ति का नाम फिर से मतदाता सूची में जोड़ा जाएगा।"

बिहार SIR मामला: 65 लाख वोटरों के नाम हटाने पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब

बिहार में जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। यह याचिका एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दाखिल की और जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एनके सिंह की पीठ के समक्ष इस पर सुनवाई हुई।

कोर्ट में क्या कहा गया?

प्रशांत भूषण ने कोर्ट में कहा, "ड्राफ्ट लिस्ट में कहा गया है कि 65 लाख नाम हटाए गए हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया कि वे कौन लोग हैं। केवल यह कहा गया है कि 32 लाख ने पलायन किया है। न ही यह स्पष्ट किया गया है कि कितने मृतक हैं और कितनों के नाम डुप्लीकेट थे। दो निर्वाचन क्षेत्रों में तो जानकारी दी गई, लेकिन बाकी जिलों का क्या?"

उन्होंने यह भी कहा कि BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) की सिफारिश पर नाम हटाए गए हैं, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई है।

कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि ECI द्वारा अपनाई गई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के तहत राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को यह जानकारी दी जाती है। इस पर चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि वे साबित करेंगे कि यह जानकारी राजनीतिक दलों को दी गई है।

कोर्ट ने ECI से कहा, "हमें उन राजनीतिक दलों की सूची दीजिए जिन्हें यह जानकारी दी गई। हम इस मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को करेंगे। तब तक अपना जवाब दाखिल कीजिए।"

जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि हम यह सुनिश्चित करेंगे कि हर संभावित प्रभावित वोटर को आवश्यक जानकारी मिले।

उन्होंने ECI के वकील से कहा, "शनिवार (09 अगस्त) तक जवाब दाखिल करें फिर हम जांचेंगे कि क्या जानकारी साझा की गई और क्या नहीं।''

ADR की याचिका में क्या कहा गया?

ADR ने अपनी याचिका में कहा कि 25 जुलाई को ECI ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया था कि लगभग 65 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं।

इनमें से 22 लाख मृतक बताए गए, 7 लाख के नाम दो जगह दर्ज थे और 35 लाख वोटर या तो पलायन कर चुके थे या उनका पता नहीं चल रहा था। लगभग 1.2 लाख वोटरों के नामांकन फॉर्म अभी तक नहीं मिले हैं।

ECI ने यह भी कहा कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के साथ 65 लाख हटाए गए नामों की सूची कुछ राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट्स (BLAs) को दी गई थी। लेकिन ADR का आरोप है कि उस सूची में यह नहीं बताया गया कि किसका नाम किस कारण से हटाया गया।

अब चुनाव आयोग को 12 अगस्त से पहले जवाब देना होगा कि 65 लाख नामों को किस आधार पर हटाया गया और यह जानकारी किन राजनीतिक दलों को दी गई। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में गंभीरता से सुनवाई कर रहा है।

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