Bihar Politics: कैसे लालू-तेजस्वी को कंट्रोल में रखने की रणनीति अपना रही कांग्रेस ? 5 संकेतों से समझिए
Bihar Politics: बिहार में कांग्रेस ने हाल ही में कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिनसे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वह राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व यानी लालू यादव और तेजस्वी यादव को सियासी तौर पर नियंत्रण में रखने की रणनीति अपना रही है, जिससे वह पार्टी को हल्के में लेने की भूल न करें।
कांग्रेस ने चुनावी राज्य बिहार में अपनी पकड़ मजबूत करने और आरजेडी पर दबाव बनाने के लिए कई बड़े बदलाव किए हैं।

Bihar Politics: 1. प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर दलित नेतृत्व पर दांव
कांग्रेस नेतृत्व ने बिहार विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले राजेश कुमार को प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है। 56 वर्षीय राजेश कुमार दलित समुदाय से आते हैं और पूर्व मंत्री दिलकेश्वर राम के बेटे हैं। इनकी नियुक्ति के लिए कांग्रेस ने सवर्ण (भूमिहार) नेता और लालू यादव के करीबी माने जाने वाले अखिलेश प्रसाद सिंह को किनारे कर दिया है।
यह कदम स्पष्ट रूप से आरजेडी को जातीय समीकरण के मोर्चे पर चुनौती देने के लिए उठाया गया लगता है। क्योंकि, पिछले कुछ समय से आरजेडी की ओर से यह कोशिश चल रही है कि वह सिर्फ मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण पर निर्भर न रहकर, दलित और अति-पिछड़ा समुदाय को भी अपने साथ जोड़े। इसके लिए तेजस्वी लगातार सभाएं कर रहे हैं।
Bihar News: 2. एक युवा नेता को बिहार कांग्रेस प्रभारी बनाना
कांग्रेस ने हाल ही में कृष्णा अलावारु को बिहार कांग्रेस का नया प्रभारी बनाया है। युवा, आक्रामक और टेक्नोक्रेट छवि वाले अलावारु को भेजकर पार्टी ने यह संकेत दिया है कि वह संगठन में नई ऊर्जा भरना चाहती है।
मोहन प्रकाश की जगह उन्हें लाना यह दिखाता है कि कांग्रेस अब बिहार में आरजेडी की 'बी' टीम कहलाने के बजाय स्वतंत्र रूप से अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। अलावारु पहले ही संकेत दे चुके हैं कि कांग्रेस को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए और वह अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
Bihar Congress: 3. मुख्यमंत्री पद को लेकर चौंकाने वाला रुख
हाल ही में कांग्रेस के एक विधायक ने यह बयान देकर तेजस्वी यादव को बड़ा झटका दिया कि बिहार विधानसभा चुनाव में जीत के बाद मुख्यमंत्री का फैसला कांग्रेस आलाकमान की सहमति से और सीटों की संख्या के आधार पर होगा।
यह बयान स्पष्ट रूप से आरजेडी को संकेत देने के लिए था कि कांग्रेस सिर्फ समर्थन देने वाली पार्टी नहीं रहेगी, बल्कि सत्ता की साझेदार बनना चाहती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि कांग्रेस भविष्य में खुद को बिहार की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहती है।
कांग्रेस का यह रुख लालू यादव के उस बयान के बदले के रूप में भी देखा गया है, जिसमें उन्होंने इंडिया ब्लॉक की कमान कांग्रेस (बायडिफॉल्ट राहुल गांधी) से लेकर ममता बनर्जी को सौंपने की पैरवी कर चुके हैं।
Bihar Congress Politics: 4. कन्हैया कुमार की पदयात्रा: युवा मतदाताओं पर फोकस
कांग्रेस ने कन्हैया कुमार को बिहार में पदयात्रा के लिए उतारा है। इस यात्रा का उद्देश्य बेरोजगारी के मुद्दे पर युवा मतदाताओं को कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करना है।
दिलचस्प बात यह है कि कन्हैया कुमार उसी भूमिहार समुदाय से आते हैं, जिससे अखिलेश प्रसाद सिंह भी हैं, जिन्हें कांग्रेस ने चुनाव से कुछ महीने पहले ही प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया है।
इसका अर्थ यह है कि कांग्रेस तेजस्वी यादव को यह भी संदेश देना चाहती है कि उसके पास युवा नेतृत्व भी है और स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहने की क्षमता भी। खासकर बेरोजगारी के मुद्दे को वह अकेले तेजस्वी के हाथों में छोड़े रखने के लिए तैयार नहीं दिख रही है।
Bihar Political News: 5. मुस्लिम-दलित समीकरण को फिर से साधना
कांग्रेस ने पहले ही विधायक दल के नेता पद की जिम्मेदारी शकील अहमद खान को दी हुई है, जो कि मुस्लिम समुदाय से आते हैं। अब प्रदेश अध्यक्ष के रूप में दलित नेता राजेश कुमार की नियुक्ति से कांग्रेस ने अपना पारंपरिक मुस्लिम-दलित समीकरण मजबूत करने की कोशिश की है। वहीं अगड़े चेहरे के रूप में कन्हैया कुमार को आगे कर दिया है।
यह रणनीति आरजेडी के लिए एक नई चुनौती बन सकती है, क्योंकि यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस अब बिहार में अपने मूल जनाधार को फिर से स्थापित करने की दिशा में काम कर रही है।
Bihar Congres-RJD Politics: कांग्रेस अलग चुनाव लड़ने की तैयारी दिखाकर आरजेडी को दिल्ली वाला डर दिखा रही है?
इन तमाम संकेतों से यह स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस खुद को बिहार में आरजेडी के दबदबे से बाहर निकालने की कोशिश कर रही है। पप्पू यादव जैसे नेता भी कांग्रेस से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे यह संभावना बढ़ जाती है कि कांग्रेस एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में उभरना चाहती है।
ऐसे में अगर आरजेडी कांग्रेस की इच्छा मुताबिक सीटों की मांग को सहजता से स्वीकार नहीं करती है, तो वह अपने दम पर चुनाव लड़ने का फैसला भी कर सकती है। दिल्ली में कांग्रेस पहले ही आम आदमी पार्टी (AAP) के खिलाफ जाकर ऐसा कर चुकी है। बिहार में भी अगर गठबंधन को लेकर असहमति बनी रही, तो कांग्रेस आरजेडी के लिए कड़ी चुनौती पेश कर सकती है।
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