सौरभ पांडेय कौन हैं? जिन्होंने चिराग पासवान को नेता बनाया, 2025 में LJP(R) की जीत की नींव 2020 में रखी थी
Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 202 सीटों पर जीत दर्ज कर प्रचंड बहुमत हासिल किया, जिसमें भाजपा को 89 और जदयू को 85 सीटें मिलीं। इस ऐतिहासिक जीत के साथ नीतीश कुमार ने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वहीं, विपक्षी महागठबंधन महज़ 35 सीटों पर सिमट गया।
इस शानदार प्रदर्शन का एक बड़ा कारण चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) रही, जिसने लड़ी गई 29 सीटों में से 19 पर शानदार विजय प्राप्त की। चिराग की पार्टी ने एनडीए की जीत में निर्णायक भूमिका निभाकर बिहार की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ स्थापित की है, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है।

2020 का साहसी लेकिन जोखिम भरा दांव
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) ने एनडीए से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का साहसी फैसला लिया था। यह निर्णय भले ही पार्टी को केवल एक सीट पर जीत दिला पाया, लेकिन इसका राजनीतिक प्रभाव बहुत बड़ा था। LJP को करीब 6% वोट मिले और यह लगभग 38 सीटों पर जनता दल यूनाइटेड (JDU) की हार का मुख्य कारण बनी, जिससे JDU 115 सीटों पर लड़कर भी मात्र 43 सीटें ही जीत पाई। इस अकेलेपन के बाद, चिराग पासवान को पार्टी और परिवार में बड़ी टूट का सामना करना पड़ा और वे राजनीतिक रूप से अकेले पड़ गए। हालांकि, यही कठिन फैसला उन्हें बिहार की राजनीति में एक स्वतंत्र और मजबूत नेता के रूप में स्थापित करने वाला मील का पत्थर साबित हुआ।
एलजेपी(R) की सफलता के पीछे का 'सेनापति': कौन हैं सौरभ पांडेय?
सौरभ पांडेय, चिराग पासवान के करीबी सलाहकार, निजी सहायक और राजनीतिक रणनीतिकार हैं, जो 2010 से उनके साथ जुड़े हुए हैं। पेशे से वकील सौरभ को राम विलास पासवान ने 2020 में अपना 'बेटा' और चिराग का 'भाई' बताते हुए उनकी राजनीतिक ऊंचाइयों का श्रेय दिया था। चिराग के बचपन के मित्र सौरभ को पार्टी में 'सेनापति' कहा जाता है।
2020 के बिहार चुनाव में, उन्होंने ही एनडीए से अलग होकर अकेले लड़ने का जोखिम भरा, लेकिन दूरदर्शी फैसला लिया। इस रणनीति ने पार्टी को केवल एक सीट दिलाई, पर 6% वोट शेयर और 38 JDU सीटों पर हार का कारण बनकर चिराग को एक स्वतंत्र नेता के रूप में स्थापित किया। सौरभ द्वारा तैयार "बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट" विज़न डॉक्यूमेंट और नारों ने चिराग को मजबूती दी।
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चिराग के चाचा ने सौरभ पांडेय पर लगाया था आरोप
2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले पर, उनके चाचा पशुपति कुमार पारस ने रणनीतिकार सौरभ पांडेय पर ही पार्टी को अलग-थलग करने का आरोप लगाया था। जवाब में, सौरभ पांडेय ने स्पष्ट किया था कि यह निर्णय रामविलास पासवान जी की इच्छा के अनुरूप था। उन्होंने कहा था, 'रामविलास पासवान जी चाहते थे कि चिराग को नेता बनाया जाए, और चिराग को एक सशक्त नेता के रूप में स्थापित करने के लिए 2020 का यह फैसला लेना बहुत जरूरी था।'
राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत किशोर से क्यों कर रहे हैं तुलना?
राजनीतिक विश्लेषक 2020 में सौरभ पांडेय द्वारा निभाई गई भूमिका की तुलना 2025 में प्रशांत किशोर के जनसुराज अभियान से करते हैं। 2020 में सौरभ पांडेय की रणनीति का परिणाम यह रहा कि एलजेपी ने भविष्य के लिए एक मजबूत नींव रखी। दूसरी ओर, 2025 के चुनाव में प्रशांत किशोर के अभियान का वैसा व्यापक और सीधा चुनावी प्रभाव देखने को नहीं मिला। सौरभ पांडेय ने 2020 में जो कठिन राह चुनी थी, उसी के कारण 2025 में एलजेपी (रामविलास) गठबंधन में 29 सीटें पाकर 19 सीटें जीतने में सफल रही और बिहार की राजनीति में एक निर्णायक शक्ति बन गई।
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