बिहार: कोरोना के कारण मिनी देवघर में कैसा है बाबा भोले और उनके भक्तों का हाल: ग्राउंड रिपोर्ट

बेगूसराय, गढ़पुरा। वैसे तो पूरे भारत में सावन महीने का मतलब 'शिव' है, लेकिन खासकर के हिंदी पट्टी क्षेत्रों में यह महीना शिव के सत्य और सुंदर से एकाकार होने जैसा लगता है। ऐसा कोई शिवाला नहीं जहां हर-हर बम-बम की गूंज न हो। लेकिन इस बार ग्राउंड पर स्थिति ऐसी नहीं है। हिंदी पट्टी क्षेत्र में झारखंड अवस्थित 'देवघर' भगवान शिव की नगरी के रूप में रूढ़ है। तो वहीं बिहार के बेगूसराय अवस्थित हरिगिरि धाम गढ़पुरा को इसकी ख्याति के कारण 'मिनी देवघर' कहा जाता है। यहां होने वाले श्रावणी मेले को राजकीय दर्जा प्राप्त है। लेकिन इस साल कोरोना संकट के चलते धार्मिक न्यास बोर्ड के निर्देश पर जिला प्रशासन द्वारा दिए गए आदेशानुसार ऐसे आयोजनों को स्थगित कर दिया गया है। यहां मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए पूरी तरह से बंद हैं। जिसके चलते यहां इस बार सुना सुना लग रहा है। बस भगवान शिव की विधिवत पूजा मुख्य पुजारी के द्वारा की जाती है।

मंदिर के पुजारी क्या कहते हैं
इस मंदिर के मुख्य पुजारियों में से एक सोहन झा से जब हमने बात की तो उनका कहना था कि यह सच है कि धार्मिक न्यास बोर्ड और जिलाधिकारी के आदेश के बाद श्रद्धालुओं में मायूसी है, लेकिन अभी भी काफी भक्त मंदिर के पट के बंद होने की जानकारी के बाद भी आ रहे हैं और बाहर से ही पूजा अर्चना कर रहे हैं। जब उनसे यह पूछा गया कि मंदिर का प्रशासनिक तंत्र भक्तों को इस तरह जमा होने से रोकने के लिए क्या क्या कर रहे हैं, तो वो कहते हैं कि मंदिर के पूरे परिसर को बंद रखना संभव नहीं है और न ही ऐसा आदेश है। इस परिसर में कई दुकानें हैं, उनसे लोगों का रोजगार जुड़ा हुआ है। लॉकडाउन में ये लोग पहले से ही अत्यधिक प्रभावित हुए हैं। वैसे भी मंदिर के कपाट बंद होने से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या करीब 85% कम हो गई है।

स्थानीय दुकानदार
इसी परिसर में मिठाई और प्रसाद बेचने वाले गनेशी बताते हैं - देखिए हमलोगों के सामान की मूल खरीदारी बाहर से आए श्रद्धालु करते हैं। जो स्थानीय हैं उनका तो यहां से रोज का बावस्ता है इसलिए वे लोग क्यों खरीदेंगे। इस बार मंदिर का पट ही जब बंद है तो समझिए कि हमारा रोजगार भी बंद ही है। हर जगह का यही हाल है इसलिए हम कहीं जाके भी क्या करेंगे। जो कमाई हुई है वो भोले की कृपा से हुई है आगे जो होगा वो भी भोले की कृपा ही होगी।
ऐसी बातें तो ठीक हैं लेकिन गनेशी के अंदर का दर्द उनके बोलने के तरीके से पता चल ही जाता है। कोरोना के कारण किए गए लॉक डाउन में बहुत प्रभावित होने वाले छोटे छोटे दुकानदारों में वो भी हैं जिनका रोजगार मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं से जुड़ा हुआ है।

बाहर से आए हुए श्रद्धालु
कुंदन कुमार समस्तीपुर से आए हैं। उनकी आस्था यहां से जुड़ी हुई है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आपको ऐसी जानकारी थी कि मंदिर का पट मंदिर न्यास बोर्ड और जिलाधिकारी के आदेश पर बंद रखा गया है। तो उनका कहना था कि हां उन्हें इस बात की जानकारी थी और वो फिर भी आए हैं क्योंकि वो यहां पिछले सात सालों से लगातार आ रहे हैं। कोरोना के सवाल पर वो कहते हैं कि वो फिजिकल डिस्टेंशिंग का ख्याल रखते हैं। इसका ख्याल रखते हुए वे बाबा के दरबार में आए हैं। बाहर से पूजा करके भी वो खुश हैं।

यहां के स्थानीय नागरिक
यहां के एक स्थानीय नागरिक अमरनाथ गुप्ता बताते हैं कि वो सावन महीने में लगभग हर सोमवारी को गंगा नदी के सिमरिया घाट से जल लाकर शिव का जलाभिषेक करते थे लेकिन इस बार वह ऐसा नहीं कर पाएंगे जिसका उन्हें मलाल है। तो वहीं पास खड़े उजागर साहनी कहते हैं कि भक्ति सिर्फ बाबा भोले के पट खुलने पर ही होगी ऐसी बात नहीं है। जब हर जगह ऐसी ही स्थिति है तो हम बाहर से भी उनके दर्शन करके खुश हैं। उनके दरबार में आ गए तो हाजिरी लग गई।

राजकीय सहायता और कोरोना का डर कितना
कोरोना के चलते इस बार यहां लगने वाले मेले को राजकीय सहायता नहीं मिली है, जिसका असर संचालन व्यवस्था पर भी दिखता है। भले मंदिर बंद हों लेकिन कुछ श्रद्धालु तो आ ही रहे हैं। उनके लिए मंदिर की कमिटी के द्वारा न तो पर्याप्त सुविधाओं पर इस बार ध्यान दिया गया है और न ही कोई टीम मंदिर परिसर में फिजिकल डिस्टेंस को मेंटेन करने की कोशिश करती हुई दिखाई दी। इस बारे में जब परिसर के एक दुकानदार मायाराम से बात की तो उनका कहना था कि यहां कोरोना वायरस की गहनता और इसके लिए फिजिकल डिस्टेंस की महत्ता को समझने वाले लोग बहुत कम हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो लोग यहां इस समय नहीं आते।
आने वाले लोगों की संख्या तो लगभग 85 प्रतिशत कम है, जब यह पूछते हैं तो वो बताते हैं कि यहां आने वाले लोगों में 50 प्रतिशत लोग लोकल ट्रेन से आते हैं। गढ़पुरा में रेलवे स्टेशन होने का एक यह फायदा है। और अभी ट्रेनें बंद हैं इसलिए भीड़ नहीं हो रही है। और थोड़े बहुत लोगों में ही सही लेकिन कोरोना का डर तो है ही। रोजी रोजगार के सवाल पर कहते हैं कि यह अच्छा होता कि मंदिर खुली होती तो हमारा रोजगार भी चल पड़ता। अब हर जगह तो सरकार दुकानों को छूट दे ही रखी है और लोग वहां की दुकानों में जाकर खरीदारी कर भी रहे हैं। हम लोगों का रोजगार मंदिर पर निर्भर है, और मंदिर ही बंद है।
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