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Bihar Exit Poll 2025: सवर्ण, OBC, मुस्लिम और दलित -किस जाति ने किसे दिया वोट, एग्जिट पोल के आंकड़े चौंकाएंगे

Bihar Exit Poll Result 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए 11 नवंबर को आखिरी चरण का मतदान पूरा हो गया। वोटिंग खत्म होते ही तमाम एजेंसियों के एग्जिट पोल के आंकड़े सामने आए, जिन्होंने एक बार फिर राजनीतिक समीकरणों को हिला दिया है। लगभग सभी एग्जिट पोल यानी पोल ऑफ पोल्स के मुताबिक इस बार भी नीतीश-मोदी की NDA सरकार बनती दिख रही है, जबकि तेजस्वी यादव की अगुवाई वाला महागठबंधन पिछड़ता नजर आ रहा है।

बिहार की कुल 243 सीटों में से NDA को 150+ और महागठबंधन 80-85 सीटें मिलने का अनुमान है। जनसुराज को 0-5 और अन्य 06 सीटें मिल सकती है। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे सबसे दिलचस्प पहलू है -किस जाति ने किस दल पर भरोसा जताया। मैटराइज (IANS-Matrize) के एग्जिट पोल के आंकड़े बताते हैं कि बिहार के सवर्ण, ओबीसी, एससी और मुस्लिम वोटरों ने किस तरह अपना रुख तय किया। इन नतीजों ने कई दावों को गलत साबित कर दिया है। तो आइए जानें किस जाति ने किसपर किया भरोसा।

Bihar Exit Poll Result 2025

🔹 सवर्णों ने एकजुट होकर दिया NDA को समर्थन

एग्जिट पोल के आंकड़ों के मुताबिक बिहार के सवर्ण वोटर इस बार पूरी मजबूती से NDA के साथ नजर आए। मैटराइज सर्वे के मुताबिक 69 फीसदी सवर्ण वोटरों ने मोदी-नीतीश गठबंधन पर भरोसा जताया, जबकि महागठबंधन को सिर्फ 15% वोट मिले। वहीं जनसुराज पार्टी को लगभग 7% सवर्ण वोट हासिल हुए हैं और बाकी 9% वोट अन्य दलों को गए। साफ है कि सवर्ण वोट बैंक ने NDA के प्रति अपने रुझान को पहले से ज्यादा मजबूती दी है।

Bihar Exit Poll Result 2025

🔹 ओबीसी भी झुके NDA की ओर

बिहार की राजनीति में ओबीसी वोटर हमेशा किंगमेकर रहे हैं। इस बार भी तस्वीर कुछ वैसी ही दिख रही है। मैटराइज के मुताबिक, 51% ओबीसी मतदाता NDA के साथ गए, जबकि 39% ने महागठबंधन को चुना। जनसुराज पार्टी को महज 4% ओबीसी वोट, और अन्य दलों को 6% वोट मिले। इस आंकड़े से साफ है कि ओबीसी मतदाताओं का बड़ा हिस्सा एनडीए के साथ जुड़ा रहा, खासकर उन क्षेत्रों में जहां नीतीश कुमार का व्यक्तिगत प्रभाव ज्यादा है।

🔹 दलित वोटों में भी NDA का पलड़ा भारी

दलित (अनुसूचित जाति) वोट बैंक को लेकर भी NDA को राहत भरी खबर मिली है। एग्जिट पोल में 49% एससी वोटर NDA के पक्ष में दिखे, जबकि महागठबंधन को 38% वोट मिले। जन सुराज पार्टी को 5% और अन्य दलों को 8% वोट मिले हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार की 'सात निश्चय योजना' और महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रमों ने दलित और गरीब वर्ग को अपने साथ बनाए रखा है।

🔹 मुस्लिम का भरोसा महागठबंधन पर कायम, लेकिन सीमांचल में हुआ खेला!

जहां तक मुस्लिम मतदाताओं की बात है, उन्होंने इस बार भी महागठबंधन पर भरोसा जताया है। मैटराइज के आंकड़ों के मुताबिक 78% मुस्लिम वोटर महागठबंधन के साथ रहे, जबकि 10% ने NDA को चुना। जनसुराज पार्टी को 4% और अन्य को 8% मुस्लिम वोट मिले।

हालांकि सीमांचल जैसे इलाकों में ओवैसी फैक्टर के चलते RJD के कुछ वोट खिसके हैं, लेकिन कुल मिलाकर मुस्लिम वोट बैंक अब भी तेजस्वी यादव और कांग्रेस के साथ एकजुट दिखा।

🔹 बिहार के जातीय समीकरण

बिहार में जाति हमेशा से राजनीति की रीढ़ रही है। अक्टूबर 2023 में जारी जनगणना के मुताबिक राज्य की 85% से ज्यादा आबादी किसी न किसी पिछड़े या दलित वर्ग से आती है। इनमें 36% अतिपिछड़ा वर्ग, 27% पिछड़ा वर्ग, 19.7% अनुसूचित जाति, 1.7% जनजाति और केवल 15.5% सवर्ण वर्ग शामिल हैं। इसीलिए हर पार्टी ने टिकट वितरण के दौरान 'कास्ट अरिथमेटिक' को ध्यान में रखा। महागठबंधन ने यादव और मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश की, जबकि NDA ने अति पिछड़ा और महिला वोटरों पर फोकस किया जो अब उनके लिए गेमचेंजर साबित हो रहा है।

🔹 टिकट वितरण में भी दिखा जाति संतुलन

दोनों गठबंधनों ने उम्मीदवारों की लिस्ट तैयार करते समय जातिगत संतुलन बनाए रखने की पूरी कोशिश की। महागठबंधन ने यादव समुदाय को 67 टिकट दिए, जबकि NDA ने सिर्फ 19 यादव उम्मीदवार उतारे। दूसरी ओर, नीतीश कुमार की पार्टी ने कुर्मी समाज से 14 उम्मीदवार मैदान में उतारे, वहीं विपक्ष ने केवल 7 कुर्मी उम्मीदवार दिए। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यही गणित NDA के पक्ष में गया, क्योंकि यादव-कुर्मी समीकरण अब बिहार की राजनीति का केंद्र बन चुका है।

🔹 जाति समीकरणों की जंग में NDA आगे

कुल मिलाकर एग्जिट पोल में यह साफ संकेत दे रहा है कि इस बार जातीय गठजोड़ का असली फायदा NDA को मिला है। जहां सवर्ण, ओबीसी और दलित वोट NDA के साथ मजबूती से जुड़े, वहीं मुस्लिम वोटर अब भी महागठबंधन के साथ खड़े हैं। तेजस्वी यादव ने युवा और बेरोजगारी के मुद्दों पर जोर तो दिया, लेकिन 'जंगलराज' की पुरानी छवि और जातीय गणित का उलटफेर उनके लिए भारी पड़ा। अब देखना यह होगा कि 2025 के नतीजों में यह जातीय समीकरण कितने सटीक साबित होते हैं।

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