Bihar Chunav 2025: JDU को दरभंगा में झटका, गोपाल मंडल का इस्तीफा, NDA के लिए चुनौती या महागठबंधन के लिए मौका?
Bihar Chunav 2025: बिहार की सियासत में जदयू के नेता गोपाल मंडल का इस्तीफा सिर्फ एक संगठनात्मक घटना नहीं, बल्कि एनडीए गठबंधन के सामाजिक समीकरणों में दरार का संकेत है। दरभंगा के पूर्व जिलाध्यक्ष मंडल ने जदयू नेतृत्व पर "अतिपिछड़ा वर्ग की उपेक्षा" का आरोप लगाते हुए पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया है।
यह कदम ऐसे समय में आया है जब बिहार में 2025 विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है, और एनडीए की एकजुटता पहले से ही सवालों के घेरे में है। गोपाल मंडल, जो धानुक समुदाय से आते हैं, मिथिलांचल क्षेत्र में अतिपिछड़ा वर्ग के प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। उनका यह कदम न सिर्फ जदयू, बल्कि पूरे एनडीए के लिए झटका है क्योंकि बिहार में सत्ता की बुनियाद अतिपिछड़े और महादलित वोट बैंक पर ही टिकी है।

जदयू की चुनौती: कमजोर होती MBC पकड़
नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में "अतिपिछड़ा और महिला सशक्तिकरण" की राजनीति को आधार बनाकर सत्ता हासिल की थी। लेकिन बीते कुछ वर्षों में जदयू के भीतर से उठती आवाजें बताती हैं कि इस सामाजिक वर्ग को अब उपेक्षित महसूस कराया जा रहा है। गोपाल मंडल के इस्तीफा ने इस असंतोष को सार्वजनिक रूप दिया है। यदि ऐसे नेताओं का पलायन जारी रहा, तो जदयू का वह वर्गीय संतुलन टूट सकता है जिसने NDA को सत्ता तक पहुँचाया था।
एनडीए पर असर
एनडीए के भीतर पहले से ही अंतर्विरोध की स्थिति बनी हुई है। लोकसभा चुनाव 2024 में जदयू और बीजेपी के बीच सीट बंटवारे को लेकर मतभेद सामने आए थे। अब यदि अतिपिछड़ा वर्ग का भरोसा डगमगाता है, तो यह प्रभाव सीधे NDA की समग्र स्थिति पर पड़ेगा।
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बीजेपी के लिए खतरा
बीजेपी के लिए खतरा यह है कि जदयू कमजोर होने पर गठबंधन का सामाजिक आधार सिकुड़ जाएगा। जदयू के लिए चुनौती यह है कि भाजपा के वर्चस्व के साये में उसकी खुद की पहचान और अस्तित्व दोनों खतरे में हैं। VIP और RJD जैसे दल इस खाली जगह को भरने में जुट जाएंगे। VIP पहले से ही MBC वर्ग में खुद को "असली प्रतिनिधि" के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।
मिथिलांचल पर सीधा असर
दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर और आसपास के जिलों में गोपाल मंडल की पकड़ और उनका जातिगत प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। यदि वे किसी अन्य दल के साथ राजनीतिक सक्रियता दिखाते हैं, तो इन जिलों में जदयू का समीकरण बिगड़ना तय है। RJD पहले ही इस क्षेत्र में EBC वर्ग को साधने में जुटी है, और मंडल के कदम से उसे मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल सकती है।
नीतीश कुमार के लिए संदेश
गोपाल मंडल का इस्तीफा नीतीश कुमार के लिए यह चेतावनी है कि सत्ता की गारंटी केवल गठबंधन से नहीं, बल्कि जनाधार से मिलती है। यदि जदयू संगठनात्मक रूप से MBC और अतिपिछड़े वर्गों को दोबारा सक्रिय नहीं करता, तो 2025 का चुनाव NDA के लिए मुश्किल भरा साबित हो सकता है।
किसे नफ़ा और किसे नुकसान
गोपाल मंडल का इस्तीफा जदयू के भीतर बढ़ती असंतुलन की अभिव्यक्ति है। यह सिर्फ एक सीट या एक चेहरा नहीं, बल्कि उस सामाजिक असंतोष का संकेत है जो नीतीश कुमार की "समावेशी राजनीति" की बुनियाद को कमजोर कर रहा है। यदि NDA इसे गंभीरता से नहीं लेता, तो मिथिलांचल से उठी यह असंतोष की लहर पूरे बिहार में फैल सकती है और इसका सीधा राजनीतिक नुकसान जदयू ही नहीं, बीजेपी को भी भुगतना पड़ सकता है।












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