Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

पप्पू यादव के नेतृत्व वाला PDA कैसे है NDA और महागठबंधन के लिए खतरा?

पप्पू यादव के नेतृत्व वाला PDA कैसे है NDA और महागठबंधन के लिए खतरा?

Recommended Video

    Bihar Assembly Elections 2020: Pappu Yadav और Chandrasekhar ने बनाया PDA | वनइंडिया हिंदी

    पूर्व सांसद पप्पू यादव बिहार में तीसरा मोर्चा बना कर पिछड़े, दलित और मुस्लिम मतों के नये ध्रुवीकरण की तैयारी में हैं। इन समुदायों पर अभी तक एनडीए या महागठबंधन का प्रभाव माना जाता रहा है। लेकिन अब पप्पू यादव ने भी इस वोट बैंक पर अपना दावा ठोक दिया है। उन्होंने चार दलों के मेल से प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक एलायंस (PDA) बनाया है। इस गठबंधन में एक तो उनकी पार्टी (जन अधिकार पार्टी) शामिल है बाकी के तीन दल बिहार से बाहर के हैं और उनका कुछ साल पहले ही गठन हुआ है। ये दल पहली बार बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। ये दल नये जरूर हैं लेकिन इनका सामाजिक आधार अब तेजी से मजबूत हो रहा है। पीडीए में शामिल तीन अन्य दल हैं, आजाद समाज पार्टी, सोशल डेमेक्रोटिक पार्टी और बहुजन मुक्ति पार्टी। ये तीनों पार्टियां दलित, मुस्लिम और पिछड़े हितों की राजनीति करती हैं। अगर पप्पू यादव का यह सामाजिक-राजनीतिक प्रयोग सफल हो जाता है तो राजद, जदयू, भाजपा और कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

    आजाद समाज पार्टी

    आजाद समाज पार्टी

    आजाद समाज पार्टी कै प्रमुख हैं चंद्रेशेखर आजाद रावण। चंद्रशेखर ने युवा दलित नेता के रूप में बहुत तेजी से पहचान बनायी है। चंद्रशेखर के बढ़ते जनाधार ने मायावती को भी चिंता में डाल दिया है। चंद्रशेखर ने रामविलास पासवान , जीतन राम मांझी और श्याम रजक जैसे दलित नेताओं के प्रभाव को तोड़ने के लिए ही बिहार के चुनाव में इंट्री ली है। वे पिछले एक महीने से बिहार में जनसम्पर्क अभियान चला रहे हैं। जब वे जिलों के दौरे पर निकले थे तो उन्हें सुनने के लिए हजारों लोगों की भीड़ लग जाती थी। कोरोना गाइडलाइंस की भी उन्हें परवाह नहीं रहती थी। दलित वर्ग के युवा उनसे प्रभावित दिख रहे हैं। चंद्रेशेखर का पप्पू यादव के साथ चुनावी समझौता एक बड़ी पहल है।

    सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI)

    सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI)

    एम के फैजी ने 2009 में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) की स्थापना की थी। इस पार्टी की स्थापना तो दिल्ली में हुई थी लेकिन इसकी सक्रियता केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में अधिक है। यह पार्टी एसटी, एससी और माइनोरिटी को एकजुट करने के लिए पूरे देश में अभियान चला रही है। इस पार्टी को अभी तक लोकसभा या विधानसभा चुनावों में सफलता नहीं मिली है लेकिन इसने दक्षिण के कई राज्यों के निगर निगम चुनावों में अपनी धमक दिखायी है। वृहत बेंलुरु महानगर पालिका के हालिया चुनाव में इस पार्टी के 68 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। केरल और राजस्थान नगरपालिक के चुनाव में भी इसने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी। SDPI बिहार में पहली बार चुनावी मैदान में उतर रही है। पप्पू यादव के साथ मिलकर वह यादव, दलित और मुस्लिम मतों को साधने की कोशिश करेगी।

    बहुजन मुक्ति पार्टी

    बहुजन मुक्ति पार्टी

    बहुजन मुक्ति पार्टी की राजनीति का आधार भी दलित और पिछड़े हैं। बहुजन मुक्ति पार्टी की स्थापाना 2012 में हुई और यह बामसेफ (BAMCEF) यानी ऑल इंडिया बैकवार्ड (एसी, एसटीस ओबीसी) एंड माइनोरिटीज कम्युनिटिज इम्प्लाइज फेडेरेशन के विचारों से प्रेरित है। वीएल मातंग इस पार्टी के अध्यक्ष हैं। बिहार के दलितों में प्रभाव विस्तार के लिए यह पार्टी पिछले दो साल से सक्रिय है। 2018 में इसने बिहार के सभी 38 जिलों में परिवर्तन यात्रा का आयोजन किया था। वी एल मातंग ने अपनी पार्टी की नीतियों को लेकर बेगूसराय में एक जोरदार भाषण दिया था। इस पार्टी ने बिहार के गांव-गांव में जा कर दलित समुदाय को अपने से जोड़ने की कोशिश की है। अब पप्पू यादव के साथ मिल कर यह पार्टी बिहार में चुनाव लड़ने वाली है।

    पप्पू यादव की राजनीतिक ताकत

    पप्पू यादव की राजनीतिक ताकत

    पप्पू यादव कोशी इलाके के प्रभावशाली नेता रहे हैं। इन्होंने खुद के दम पर राजनीति में अपनी जगह बनायी है। पप्पू यादव बिहार के उन चुनिंदा नेताओं में एक हैं जिन्होंने लालू यादव को चुनौती दे कर राजनीति में अपना सिक्का जमाया है। 1990 में पप्पू 25 साल की उम्र में पहली बार सिंहेश्वरस्थान से निर्दलीय विधायक चुने गये थे। उसी समय लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। लालू अल्पमत की सरकार चला रहे थे इसलिए उन्हें निर्दलीय विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। इस जरूरत ने लालू और पप्पू यादव को नजदीक कर दिया। पप्पू, लालू के साथ हो गये। 1991 में जब लोकसभा का चुनाव आया तो पप्पू ने लालू यादव से अपने लिए पूर्णिया से टिकट मांगा। लालू ने मना कर दिया। उस समय लालू बिहार में पिछड़ों के मसीहा बन चुके थे। इसके बाद भी 26 साल के पप्पू ने लालू को चुनौती दी और पूर्णिया से निर्दलीय ही लोकसभा चुनाव में ताल ठोक दी। लालू के विरोध के बाद भी पप्पू चुनाव जीत गये। 1996 में पप्पू ने समाजवादी के टिकट पर फिर पूर्णिया से लोकसभा का चुनाव जीता। बिहार में लालू का बोलबाला रहते हुए भी पप्पू ने अपनी अपनी अलग राह बनायी। बाद में लालू ने पप्पू की ताकत को पहचाना। 2004 के उपचुनाव और 2014 में वे राजद के टिकट पर मधेपुरा से सांसद बने। पप्पू यादव खुद को लालू यादव के बाद यादवों का दूसरा सबसे बड़ा नेता मानते थे। वे चाहते थे कि लालू अपनी विरासत उन्हें सौंपे। लेकिन जब लालू ने तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी बना दिया तो पप्पू बगावत पर उतर आये। 2015 में आखिरकार लालू ने उन्हें राजद से निकाल दिया।

    2020 में PDA की संभावना

    2020 में PDA की संभावना

    2015 में जब लालू ने पप्पू यादव को राजद से निकाल दिया था तब वे भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ना चाहते थे। पप्पू यादव ने दिल्ली जाकर नरेन्द्र मोदी से मुलाकात भी की थी। उस समय नीतीश भाजपा के साथ नहीं थे। भाजपा बिहार में कोई मजबूत सहयोगी चाहती थी। लेकिन पप्पू यादव के विवादास्पद अतीत के कारण भाजपा ने आखिरी समय में गठबंधन नहीं किया। तब उन्होंने समाजवादी पार्टी , राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कुछ अन्य छोटे दलों से ताल मेल कर विधानसभा का चुनाव लड़ा था। 2015 में पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी ने 64 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन एक पर जीत नहीं मिल पायी थी। किंतु 2020 में परिस्थियां अलग हैं। नीतीश अब लालू के विरोध में हैं और भाजपा के साथ हैं। अब पिछड़े मतों में सेंध लगाना पहले से आसान है। पप्पू यादव ने 2020 में 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान किया है। बाकी सीटें वो अपने सहयोगी दलों को देंगे। मांझी और पासवान की लड़ाई में दलित वोटर दुविधा में हैं। ऐसी स्थिति में पप्पू की तीन सहयोगी पार्टियों का चुनावी महत्व बढ़ गया है। चंद्रशेखर और मातंग ने अगर दलित मतों का पलड़ा पप्पू के पक्ष में झुका दिया तो बड़ा उलटफेर हो सकत है। एम के फैजी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ने अगर अल्पसंख्यक मतों में थोड़ी भी पैठ बना ली तो पप्पू की राह पहले से आसान हो जाएगी। इन चारों पार्टियों का यह नया गठबंधन नीतीश और तेजस्वी, दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।

    More From
    Prev
    Next
    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+