पासवान परिवार की राजनीति में ट्विस्ट: अलौली सीट पर पारस के बेटे यशराज की एंट्री, चिराग ने JDU से निभाई दोस्ती!
Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, अलौली सीट पर सभी की निगाहें टिक गई हैं। यह सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि पासवान परिवार की राजनीतिक पहचान का प्रतीक है। यहीं से 1969 में रामविलास पासवान ने 23 साल की उम्र में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी और पहली बार विधानसभा पहुंचे थे। यह जीत उनके करियर की नींव बनी, जिसने आगे चलकर उन्हें राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा चेहरा बनाया।
इस बार अलौली में पासवान परिवार के भीतर 'विरासत की जंग' छिड़ी हुई है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) से अलग होकर बने राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (आरएलजेपी) के मुखिया पशुपति कुमार पारस ने अपने बेटे यशराज पासवान को उम्मीदवार बनाया है।

दिलचस्प बात यह है कि चिराग पासवान की पार्टी, जो पहले इस सीट पर लड़ती थी, उसने इस बार जेडीयू को समर्थन दे दिया है। जेडीयू ने यहां से रामचंद्र सदा को उम्मीदवार बनाया है, जबकि इंडिया गठबंधन ने रामवृक्ष सदा को मैदान में उतारा है।
7 बार जीते पशुपति पारस, परिवार की मजबूत पकड़
रामविलास पासवान केंद्र की राजनीति में व्यस्त होने के बाद अलौली सीट की जिम्मेदारी उनके छोटे भाई पशुपति पारस ने संभाली। पारस ने यहां से अब तक सात बार जीत दर्ज की है, जिनमें छह लगातार विजय शामिल हैं। इस जीत की श्रृंखला ने उन्हें न सिर्फ स्थानीय राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बनाया, बल्कि अलौली सीट को 'पारस परिवार का किला' भी बना दिया।
ग्रामीण इलाका, खेती-बाड़ी पर आधारित अर्थव्यवस्था
अलौली विधानसभा पूरी तरह ग्रामीण इलाका है, जो खगड़िया जिले के उत्तरी हिस्से में स्थित है। यहां की आबादी मुख्य रूप से खेती, पशुपालन और दुग्ध उत्पादन पर निर्भर करती है। धान, गेहूं और सब्जियां यहां की मुख्य फसलें हैं। हालांकि, सीमित उद्योग और रोजगार के अवसरों के कारण युवाओं का बड़े पैमाने पर पलायन होता है। हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन और बांस के काम से कुछ स्थानीय रोजगार जरूर पैदा होते हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं।
राजनीतिक इतिहास - समाजवादी दलों का दबदबा
अलौली सीट 1962 में बनी थी और यह अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है। अब तक यहां 15 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। कांग्रेस ने चार बार, जबकि समाजवादी विचारधारा वाले दलों ने 11 बार जीत दर्ज की है। जनता दल, जदयू, राजद और लोजपा - सभी ने इस सीट पर अपनी पकड़ बनाई।
2015 में जदयू-राजद गठबंधन ने एनडीए को मात दी थी, वहीं 2020 में चिराग पासवान की बगावत ने समीकरण पलट दिए। वोटों के बंटवारे से राजद के रामवृक्ष सदा ने मात्र 2,773 वोटों से जीत हासिल की, जबकि एलजेपी तीसरे स्थान पर रही पर 26,000 से अधिक वोट लेकर मुकाबला रोमांचक बना दिया।
2025 में क्या होगा समीकरण? पासवान वोट होंगे निर्णायक
चुनाव आयोग के अनुसार, अलौली में 2.63 लाख मतदाता हैं, जिनमें पुरुष 1.37 लाख, महिलाएं 1.26 लाख और थर्ड जेंडर 11 हैं। यह सीट पहले चरण (6 नवंबर) में मतदान के लिए जाएगी। बेरोजगारी, शिक्षा, सड़क और कानून व्यवस्था यहां के प्रमुख मुद्दे हैं। लेकिन जातीय समीकरणों के लिहाज से पासवान वोट अभी भी निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में हैं।












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