Bihar Election 2025: क्या सचमुच बिहार की वोटर लिस्ट में विदेशी घुसपैठ हुई है, या यह सिर्फ एक चुनावी 'नैरेटिव'
Bihar Election 2025: बिहार में जारी 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) अभियान ने चुनावी राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। क्या वोटर लिस्ट में रोहिंग्या, बांग्लादेशी और नेपाली नागरिक शामिल हो चुके थे? क्या चुनाव आयोग इस घुसपैठ को रोकने में सक्षम है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या यह अभियान निष्पक्ष है या किसी एजेंडे का हिस्सा?
BLO के सवाल और विदेशी पकड़ाने का दावा
बिहार में SIR के तहत बीएलओ घर-घर जाकर दस्तावेज मांग रहे हैं और नागरिकता से जुड़े सवाल पूछ रहे हैं, जैसे कि जन्मस्थान, माता-पिता का मूल निवास, स्कूलिंग, आधार, राशन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र। लेकिन सवाल यह है, कि क्या ऐसे सवालों से किसी की राष्ट्रीयता तय की जा सकती है? क्या महज़ भाषा, बोलचाल या दस्तावेज़ों की कमी किसी को 'विदेशी' घोषित करने के लिए पर्याप्त है?

नागरिकता कौन तय करेगा, किस आधार पर?
OneIndia Hindi को मिली जानकारी के अनुसार, कई BLO अधिकारियों ने बताया कि उन्हें मौखिक रूप से कहा गया है। अगर किसी के जवाब संदिग्ध लगें, तो रिपोर्ट कर दो। यहां तक कि कुछ मामलों में दस्तावेजों के बिना ही शक के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई।
एक BLO ने नाम न छापने की शर्त पर चुनाव आयोग की ही कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा दिया। उन्होंने कहा कि नागरिकता साबित करना आसान नहीं है। हर गरीब के पास पेपर नहीं होते। क्या सिर्फ इसी आधार पर कोई विदेशी हो गया?"
क्या रोहिंग्या या विदेशी नागरिक वाकई वोटर लिस्ट में हैं?
पिछले कुछ सालों से यह नैरेटिव तैयार किया जा रहा है कि देशभर में रोहिंग्या या बांग्लादेशी नागरिक वोटर लिस्ट में शामिल हो रहे हैं। मगर अब तक किसी राज्य या आयोग ने यह आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया है कि कितने रोहिंग्या या विदेशी नागरिक भारत में वोट डाल चुके हैं। बिहार में भी अब तक किसी एक मामले में भी कोई कानूनी तौर पर साबित नहीं कर पाया है कि फर्जी मतदाता विदेशी नागरिक था।
EC की निष्पक्षता पर सवाल
BLO पर जब दबाव हो कि फॉर्म भरो वरना सैलरी कटेगी, जब अधिकारी कहें कि 'खुद से फॉर्म भर दो', जब फील्ड वेरिफिकेशन को अनदेखा कर सिर्फ आंकड़ों के पीछे भागा जाए, तो यह संदेह पैदा करता है कि क्या चुनाव आयोग की प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी है?
घुसपैठ या डर फैलाने की राजनीति?
राजनीतिक विश्लेषक बद्रीनाथ का मानना है कि SIR जैसी प्रक्रियाएं ज़रूरी हैं लेकिन इन्हें डर और भेदभाव का माध्यम नहीं बनना चाहिए। अगर नागरिकता की जांच सिर्फ गरीब, अल्पसंख्यक या सीमावर्ती समुदायों पर केंद्रित हो, तो यह एक खतरनाक ट्रेंड है। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता कम और उलझने का मसला ज़्यादा है।
1 अगस्त और 30 सितंबर की डेडलाइन: एक और चिंता
1 अगस्त तक जिसका नाम सत्यापित नहीं होगा, उसका नाम 30 सितंबर की फाइनल लिस्ट में नहीं आएगा। यह डेडलाइन उन लोगों के लिए डर का कारण बन गई है जो दस्तावेज़ इकट्ठा नहीं कर पा रहे। क्या यह लोकतंत्र से बहिष्कार का पहला कदम है? लोगों का कहना है जांच जरूरी है, लेकिन नीयत भी साफ होनी चाहिए।
चुनाव आयोग से सवाल
विदेशी घुसपैठ एक गंभीर मुद्दा है, पर सिर्फ शक के आधार पर किसी को मतदाता सूची से बाहर करना खतरनाक हो सकता है। चुनाव आयोग को ट्रांसपेरेंसी के साथ यह स्पष्ट करना होगा कि अब तक किन आधारों पर कितने विदेशी साबित हुए। SIR प्रक्रिया को सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों के तहत चलाया जाना चाहिए, किसी राजनैतिक ध्रुवीकरण के तहत नहीं।
क्या बोली जनता?
बिहार के विभिन्न विधानसभा सीटों पर इस पूरे मसले पर जनता की राय जानने के बाद यही लगता है कि चुनाव आयोग को चाहिए कि वह इस प्रक्रिया की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करे, कितने फर्जी नाम हटाए गए, किन दस्तावेजों के आधार पर, और किस श्रेणी में सबसे ज्यादा नाम हटा। ताकि लोगों के ज़ेहन में उठ रहे सवालों के जवाब मिल सके और चुनाव आयोग पर लोगों का भरोसा बने।
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