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Nitish kumar Caste: किस जाति के हैं नीतीश कुमार? परिवार में कौन-कौन, 10वीं बार CM लेकिन क्यों नहीं लड़ते चुनाव

Nitish kumar Caste: बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार जैसा लगातार प्रभाव रखने वाला नेता बहुत कम मिलता है। दसवीं बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले नीतीश सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि बिहार के राजनीतिक समीकरणों के सबसे बड़े खिलाड़ी माने जाते हैं। 20 नवंबर 2025 को गांधी मैदान में हुए शपथ ग्रहण समारोह में पीएम मोदी, अमित शाह से लेकर बीजेपी के बड़े नेता मौजूद रहे, जहां सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा ने भी डिप्टी सीएम पद की शपथ ली।

26 मंत्रियों के साथ नीतीश ने फिर सत्ता संभाल ली, लेकिन अब फिर वही सवाल चर्चा में है-नीतीश आखिर किस जाति से आते हैं और चुनाव क्यों नहीं लड़ते? ऐसे में आइए जानते हैं नीतीश कुमार की जाति और उनके परिवार के बारे में।

Nitish kumar Caste

🟡 किस जाति से आते हैं नीतीश कुमार, बिहार में क्या है उनके समुदाया का राजनीतिक प्रभाव? (Bihar CM Nitish kumar Jati)

नीतीश कुमार कुर्मी जाति से हैं। संख्या के लिहाज से यह जाति राज्य की बड़ी आबादी का हिस्सा नहीं है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव काफी गहरा है। बिहार के जातीय सर्वे के मुताबिक, राज्य में लगभग 2.87% यानी करीब 40 लाख लोग कुर्मी समुदाय से आते हैं। हालांकि जानकार मानते हैं कि अगर कुर्मी की सभी उपजातियों को शामिल कर लिया जाए तो आबादी 22-24% तक पहुंच जाती है।

कुर्मी की प्रमुख उपजातियां-अवधिया, समसवार और जसवार-काफी प्रभावशाली मानी जाती हैं। इन समुदायों की पकड़ ग्रामीण समाज, प्रशासनिक सेवाओं और सरकारी व्यवस्था तक फैली है। यही वजह है कि कुर्मी वोट बैंक बिहार की राजनीति में एक बड़ा फैक्टर बन चुका है और नीतीश इस वोट बैंक के सबसे मजबूत चेहरे हैं।

🟡 बिहार चुनाव में कुर्मी वोट का असर कितना?

243 सीटों वाली विधानसभा में अकेले कुर्मी समाज सीधे तौर पर 10-12 सीटों को प्रभावित करता है। जबकि उपजातियों को जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 70 सीटों तक पहुंच जाता है-यानी हर चौथे विधानसभा क्षेत्र में कुर्मी वोट निर्णायक होते हैं। यही वह आधार है जिसने नीतीश को हमेशा सत्ता के केंद्र में बनाए रखा।

बीजेपी जहां सवर्ण और वैश्य मतदाताओं पर भरोसा करती है, वहीं नीतीश की जेडीयू परंपरागत रूप से अति पिछड़ा वर्ग और महिला वोटरों को अपने साथ जोड़कर मजबूत समीकरण बनाती रही है। यही कॉम्बिनेशन पिछले दो दशकों से बिहार की सत्ता का असली फार्मूला है।

नीतीश कुमार का जन्म 1 मार्च 1951 को नालंदा जिले के बख्तियारपुर में हुआ था। उनके पिता कविराज रामलखन सिंह, आयुर्वेद के चिकित्सक थे और सामाजिक रूप से काफी सक्रिय माने जाते थे। मां कल्पना देवी एक गृहिणी थीं।

नीतीश के परिवार में:

  • पत्नी: मंजू देवी (2007 में निधन)
  • एक बेटा: निशांत कुमार-राजनीति से दूरी, पटना में रहते हैं

चार बहनें-सभी अपने परिवारों में स्थापित

नीतीश ने हमेशा अपने परिवार को राजनीतिक चर्चाओं से दूर रखा, इसलिए वे सार्वजनिक मंचों पर बहुत कम नजर आते हैं। परिवार के साधारण पृष्ठभूमि और जमीन से जुड़े जीवन ने ही नीतीश की राजनीति को ज्यादा व्यावहारिक और जन-सरोकार वाला बनाया।

🟡 जेपी आंदोलन से शुरुआत, केंद्र में मंत्री और फिर बिहार के 'सुशासन बाबू'

नीतीश की राजनीति की शुरुआत 1970 के दशक के जेपी आंदोलन से हुई। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पूरी तरह राजनीति में कदम रखा। दो चुनाव हारने के बाद 1985 में पहली बार हरनौत से विधायक बने। 1989 में लोकसभा पहुंचे और राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाई। केंद्र सरकार में रेल मंत्री सहित कई अहम पद संभाले।

2000 में पहली बार मुख्यमंत्री बने लेकिन महज 7 दिनों में इस्तीफा देना पड़ा। 2005 में एनडीए की सरकार बनी और नीतीश ने बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी-इसी दौरान उन्हें 'सुशासन बाबू' की छवि मिली।

🟡 चुनाव क्यों नहीं लड़ते नीतीश कुमार? 2004 की एक हार ने बदली रणनीति

यह सबसे बड़ा सवाल है। जब जनता उन्हें लगातार मुख्यमंत्री बनाती है तो फिर वे विधानसभा चुनाव क्यों नहीं लड़ते?इसका जवाब 2004 में छिपा है, नीतीश 1989 से 1999 तक लगातार बाढ़ सीट से सांसद रहे। 2004 में हार का अंदेशा हुआ तो उन्होंने दो सीटों से चुनाव लड़ा बाढ़ और नालंदा से। वो बाढ़ से हार गए, नालंदा से जीते।

इस हार ने उनकी राजनीतिक रणनीति पूरी तरह बदल दी। तब से नीतीश ने फैसला कर लिया कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे। 2005 से लेकर आज तक वे हमेशा विधान परिषद के रास्ते मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। उनकी सोच साफ है, चुनाव लड़कर जीतना जरूरी नहीं, सत्ता का संतुलन साधना ज्यादा जरूरी है।

🟡 नीतीश की राजनीति का फार्मूला: जातीय संतुलन + विकास की छवि

20 साल से ज्यादा सत्ता में रहना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं। लेकिन नीतीश ने जातीय समीकरण, प्रशासनिक पकड़ और गठबंधन की राजनीति को ऐसे साधा कि वे लगातार सत्ता में बने रहे। कुर्मी समाज का ठोस समर्थन, बीजेपी का वोट बैंक, जेडीयू का अति पिछड़ा और महिला वोट-इसी संतुलन ने उन्हें आज भी बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनाए रखा है।

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