Bihar Chunav 2025: बिहार में दल-बदल का सीजन, टिकट न मिलने पर नेताओं का बदलता रंग, टूट रहा लोकतंत्र का भरोसा?
Bihar Chunav 2025: बिहार की राजनीति एक बार फिर चुनावी मोड में है। रैली, जनसंवाद, कार्यकर्ता सम्मेलन-हर पार्टी अपनी ताक़त दिखाने की कोशिश में लगी है। लेकिन जब बात वास्तविक चुनावी ज़रूरतों की आती है-यानी 243 विधानसभा सीटों पर योग्य उम्मीदवार खोजने की, तब वही पुरानी कहानी दोहराई जाती है।
बड़े-बड़े दावे करने वाली पार्टियां भी टिकट वितरण के समय "बाहरी" या "आयातित" चेहरों का सहारा लेती हैं। यह प्रवृत्ति अब बिहार की राजनीति की स्थायी बीमारी बन चुकी है।

उम्मीदवारों की कमी: जमीनी जुड़ाव का संकट
बिहार में राजनीतिक दलों के पास लाखों सदस्य और हजारों कार्यकर्ता हैं, लेकिन जनता से गहरे जुड़ाव वाले, जमीनी अनुभव और साफ़ छवि वाले उम्मीदवारों की संख्या बेहद कम है। 2020 के विधानसभा चुनाव ने इसे साफ़ कर दिया। कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा, पर योग्य उम्मीदवारों के अभाव में लगभग दो दर्जन सीटों पर दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट दिया और महज़ 19 सीटों पर सिमट गई।
लोजपाने 135 सीटों पर दांव खेला, पर सिर्फ़ एक सीट जीती इनमें से कई उम्मीदवार भाजपा और जदयू से टिकट न मिलने के बाद "ट्रांज़िट" में पहुंचे थे। जदयू और भाजपा जैसी संगठित पार्टियां भी इससे अछूती नहीं हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू ने 38 में से 18 बाहरी उम्मीदवार उतारे, 2019 में 17 में से पाँच। भाजपा को भी 2014 में राजद से आए नेता को टिकट देना पड़ा। यह आंकड़े बताते हैं कि मजबूत सांगठनिक ढांचा होने के बावजूद, योग्य स्थानीय उम्मीदवारों की स्थायी फौज किसी पार्टी के पास नहीं है।
दल-बदल की संस्कृति और अवसरवाद
टिकट की गारंटी खत्म होते ही नेताओं के पाले बदलने की परंपरा अब राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है। कांग्रेस के गजानन शाही, जदयू के अशोक चौधरी, भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा-ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जो टिकट के हिसाब से पार्टी बदलते रहे हैं। नेताओं के लिए वैचारिक निष्ठा से ज़्यादा अहम हो गया है सत्ता तक पहुंचने का रास्ता। पार्टियां भी चुनावी गणित के दबाव में ऐसे नेताओं को अपनाती हैं।
असर: संगठन, नीतियां और मतदाता का मोहभंग
यह प्रवृत्ति केवल दलों के संगठनात्मक ढांचे को कमज़ोर नहीं करती, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति की आत्मा को भी चोट पहुँचाती है। जब पार्टियां स्थानीय कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर बाहरी उम्मीदवारों पर दांव लगाती हैं, तो वर्षों से जमीनी स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है।
इसके परिणामस्वरूप कार्यकर्ता-आधारित संगठन कमजोर पड़ता है और पार्टी चुनाव के बाद जनसंपर्क खो देती है।मतदाता के लिए भी यह निराशाजनक है। जब हर चुनाव में उम्मीदवारों का चेहरा बदलता रहता है, तो मतदाता अपने प्रतिनिधि से दीर्घकालिक जवाबदेही की उम्मीद नहीं कर पाते।
समाधान की राह
आंतरिक लोकतंत्र को मज़बूत करना- पार्टी स्तर पर नियमित चुनाव, पारदर्शी टिकट प्रक्रिया और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की तरक्की सुनिश्चित हो।
लंबी अवधि की कैडर बिल्डिंग- केवल चुनावी मौसम में सक्रिय होने के बजाय, युवाओं को स्थायी राजनीतिक प्रशिक्षण और जिम्मेदारी दी जाए।
विचारधारा पर स्पष्टता- पार्टियों को अपने वैचारिक रुख़ को साफ़ रखना होगा, ताकि अवसरवादी नेताओं के बजाय समान विचारधारा वाले कार्यकर्ता आकर्षित हों।
बिहार की राजनीति तभी परिपक्व होगी जब टिकट वितरण "जीत सकने वाले चेहरों" की तात्कालिक खोज से आगे बढ़े। लोकतंत्र केवल सत्ता के खेल का नाम नहीं है; यह जमीनी प्रतिनिधित्व, विचारधारा और दीर्घकालिक भरोसे का भी नाम है। दल-बदल और "आयातित उम्मीदवारों" की यह आदत न बदली तो चुनावी नतीजे भले बदल जाएं, लेकिन बिहार की राजनीति का चेहरा वही रहेगा-अस्थायी, अवसरवादी और अल्पकालिक फायदे की ओर झुका हुआ।












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