Bihar Chunav 2025: चुनाव आयोग की सर्जिकल स्ट्राइक, बिहार विधानसभा चुनाव की रेस से 17 दल बाहर, जानिए क्यों?
Bihar Chunav 2025: भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में राजनीतिक दल केवल चुनावी मशीन नहीं होते, बल्कि वे जनभावनाओं, विचारधाराओं और सामाजिक बदलाव के वाहक होते हैं। लेकिन जब यही संस्थाएं निष्क्रिय, कागज़ी या महज लाभ उठाने के साधन बन जाएं, तो लोकतंत्र की साख पर असर पड़ता है।
इसी पृष्ठभूमि में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा बिहार के 17 और देशभर के कुल 334 गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत राजनीतिक दलों (RUPP) को सूची से हटाने का फैसला एक महत्वपूर्ण और समयोचित कदम है। यह कार्रवाई सिर्फ आंकड़ों में कमी नहीं है यह एक संदेश है कि पंजीकरण कोई स्थायी लाइसेंस नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है।

पिछले छह वर्षों में जिन दलों ने किसी भी चुनाव में भाग नहीं लिया, संगठनात्मक गतिविधियों का प्रमाण नहीं दिया और जिनके कार्यालय पंजीकृत पते पर मौजूद नहीं पाए गए, उनका बने रहना केवल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग था। इससे न केवल पारदर्शिता पर सवाल उठते थे, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था में अनावश्यक अव्यवस्था भी फैलती थी।
राजनीतिक दलों का पंजीकरण उन्हें 29B और 29C जैसे प्रावधानों के तहत वित्तीय, चुनावी और संगठनात्मक लाभ देता है। जब ये लाभ ऐसे संगठनों के हाथ में हों जो सक्रिय ही नहीं, तो यह करदाताओं के पैसों और लोकतांत्रिक संसाधनों का दुरुपयोग है। आयोग का यह कदम साफ करता है कि ऐसे 'पेपर पार्टी' का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
हालांकि, आयोग ने अपील की 30 दिन की अवधि देकर यह भी सुनिश्चित किया है कि वैध और सक्रिय लेकिन गलती से निशाने पर आए दल अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकें। इससे यह प्रक्रिया न्यायसंगत और पारदर्शी बनी रहेगी। बिहार के संदर्भ में देखें तो यहां पंजीकृत लेकिन निष्क्रिय दलों की लंबी सूची थी।
कुछ का नाम ही जनता ने पहली बार सुना होगा जैसे "गांधी प्रकाश पार्टी" या "व्यवसायी किसान अल्पसंख्यक मोर्चा"। सवाल यह है कि यदि इन दलों का जनाधार ही नहीं, संगठनात्मक ढांचा ही नहीं, तो ये अब तक रजिस्टर में क्यों बने हुए थे? आयोग की यह सर्जिकल स्ट्राइक लंबे समय से लंबित सफाई अभियान जैसा है।
लोकतंत्र में बहुदलीय व्यवस्था की विविधता जरूरी है, लेकिन यह विविधता केवल संख्याओं की भीड़ नहीं, बल्कि सक्रिय, जवाबदेह और ईमानदार राजनीतिक भागीदारी से होनी चाहिए। निष्क्रिय दलों की छंटनी से राजनीतिक परिदृश्य न केवल साफ होगा, बल्कि मतदाताओं के सामने सक्रिय और गंभीर विकल्प ही रहेंगे। यह कदम लोकतंत्र की सफाई है और सफाई में कभी-कभी थोड़ी सख्ती जरूरी होती है।












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