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गुप्तेश्वर पांडे ने खुद मारी पैरों पर कुल्हाड़ी? बगैर लड़े हारे बक्सर की लड़ाई

पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे चुनाव से पहले ही चुनाव हार गये लगते हैं। बक्सर सीट से उनकी दावेदारी खत्म हो गयी है। बीजेपी-जेडीयू के बीच तालमेल में बक्सर की सीट बीजेपी के खाते में गयी है। लिहाजा जेडीयू के टिकट पर बक्सर से चुनाव लड़ने का उनका सपना टूट गया है।पूर्व डीजी के लिए हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव का दंगल अभी बंद नहीं हुआ है। वह खुला हुआ है। उनकी कोशिशें भी जारी हैं। बक्सर की दूसरी लड़ाई लड़ने का ख्वाब संजो रहे पूर्व डीजी अपने लिए दूसरा विकल्प बेगूसराय रखे हुए हैं। जी हां, बेगूसराय। दानवीर कर्ण के अंग प्रदेश का यह इलाका सवर्णों और खासकर भूमिहार ब्राह्मण का गढ़ है। गुप्तेश्वर पांडे की पहली पसंद बक्सर भी सवर्ण बहुल सीट रही थी। बक्सर ब्राह्मण-भूमिहार बहुल इलाका है। ऐसा लगता है कि पूर्व डीजी पांडे से चूक हो गयी। अगर उनकी पसंद सवर्ण बहुल क्षेत्र थी तो उन्हें समझना चाहिए था कि आज बिहार में सवर्ण सियासत पर एकमुश्त अधिकार अगर किसी दल का है तो वह बीजेपी है। ऐसे में उनकी पसंद बीजेपी होनी चाहिए थी। मगर, उन्होंने जेडीयू को अपनी पसंद बनाया।

गुप्तेश्वर पांडे ने खुद मारी पैरों पर कुल्हाड़ी? बगैर लड़े हारे बक्सर की लड़ाई

जेडीयू के लिए मुश्किल ये है कि बेगूसराय में भी सवर्ण बहुल सीट बीजेपी शायद ही उसके लिए छोड़े। ऐसे में गुप्तेश्वर पांडे के लिए दूसरा विकल्प भी असर दिखाएगा, ऐसा नहीं लगता।गुप्तेश्वर पांडे ने डीजी रहते विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी थी। सुशांत की आत्महत्या के मामले को उन्होंने बिहार की अस्मिता के साथ जोड़ते हुए सुशांत के पिता को न्याय दिलाने के लिए कमर कस ली थी। पूरे दौर में वे डीजी की तरह कम और नेता की तरह अधिक नज़र आए थे। जिस तरह से टीवी चैनलों पर वे लगातार समय दे रहे थे ऐसा लगता ही नहीं था कि उनके पास पुलिस महकमे का कोई काम हो। पूरी तरह फुर्सत में नज़र आ रहे थे।वजह भी आगे चलकर साफ हुई। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए गुप्तेश्वर पांडे ने अर्जी लगा रखी थी। इस बारे में बिहार के एक पोर्टल ने एक ख़बर अपने सूत्रों से प्रकाशित कर दी थी। तब पूर्व डीजी ने खूब हायतौबा मचायी थी। पोर्टल से खंडन छापने को कहा था। डीजी रहते ही गुप्तेश्वर पांडे तब भी चर्चा में आए थे जब उन्होंने रिया चक्रवर्ती की ओर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सवाल पूछे जाने पर कहा था कि रिया की औकात नहीं कि वह नीतीशजी से सवाल पूछ सके। यह चुनाव में उतरने से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति एकतरफा नतमस्तक होने का उदाहरण है। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद गुप्तेश्वर पांडे जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार से मिले और उनकी पार्टी ज्वाइन कर ली। जेडीयू ज्वाइन करने के बाद जब पत्रकारों ने चुनाव लड़ने को लेकर सवाल किया, तो उन्होंने उल्टे पूछा कि रिटायरमेंट के बाद चुनाव लड़ना क्या गुनाह है?

गुप्तेश्वर पांडे ने खुद मारी पैरों पर कुल्हाड़ी? बगैर लड़े हारे बक्सर की लड़ाई

इसमें कोई शक नहीं कि पूर्व डीजी गुप्तेश्वर पांडे बड़बोले रहे हैं। यही बड़बोलापन उनके लिए मुसीबत भी बना है। अब बक्सर सीट पर चुनाव लड़ने की खुली इच्छा जताने के बाद वहां के राजनीतिक नेताओं ने भी अपने हितों की रक्षा के लिए गोलबंदी शुरू कर दी। बीजेपी का परंपरागत गढ़ है वह इलाका। वह भला क्यों अपनी सीट जेडीयू के हाथों कुर्बान होने देती। लिहाजा गुप्तेश्वर पांडे का पत्ता कट गया। अब नीतीश कुमार के लिए एक सवर्ण उम्मीदवार के तौर पर गुप्तेश्वर पांडे कहां फिट बैठेंगे और जहां फिट बैठेंगे वहां की सीट जेडीयू के लिए बीजेपी छोड़ेगी या नहीं, यह साफ हुए बगैर कोई घोषणा करना मुश्किल था, मुश्किल है और मुश्किल रहेगा। यह भी तय है कि गुप्तेश्वर पांडे चुप रहने वाले नहीं हैं। लेकिन, सिर्फ अपना हित देखना दूरदर्शिता नहीं होती। अगर गुप्तेश्वर पांडे ने सुशांत केस में बिहार की अस्मिता की बात उठायी थी तो उन्हें यह भूल जाना चाहिए था कि वे सवर्ण हैं और सिर्फ सवर्ण बहुल सीट पर उन्हें आंखें गड़ाकर नहीं रखनी चाहिए थी। अब जब वे ऐसा कर चुके हैं तो इसमें नीतीश कुमार की क्या गलती? वे क्यों ऐसी सीट उन्हें दें जहां गैर सवर्ण अधिक हों? इस तरह कुल्हाड़ी तो खुद गुप्तेश्वर पांडे ने ही अपने पैरों पर मार ली है।

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