70 साल की मां ने सुनाई नक्सली बनने की कहानी, आंखे हो जाएंगी नम

शुक्रवार को औरंगाबाद में देखने को मिला जहां सीआरपीएफ बटालियन के असिस्टेंट कमांडेंट नरेंद्र कुमार नक्सली प्रभावित गांव का दौरा करने निकले थे।

पटना। नक्सलियों के आंतक की खबरें तो आए दिन सामने आती रहती है लेकिन बंदूक के सहारे लोगों के दिलों में खौफ पैदा करने वाले इन नक्सलियों की असल जिंदगी की कहानी कुछ और ही है। उनके घर की हालात देख किसी का भी दिल पिघल जाएगा। कुछ ऐसा ही नजारा शुक्रवार को औरंगाबाद में देखने को मिला जहां सीआरपीएफ बटालियन के असिस्टेंट कमांडेंट नरेंद्र कुमार नक्सली प्रभावित गांव का दौरा करने निकले थे। दौरे के दौरान उन्होंने उन घरों में जाकर लोगों से मुलाकात की जिनके बच्चे किसी कारणवश नक्सली गैंग में सक्रिय हो गए थे। कई गांवों में दौरा करने के बाद उनकी निगाहें एक ऐसी घर पर पड़ी जहां घर की औरतें अपनों के इंतजार में आंखें बिछाए बैठे थे।

पापा कब आओगे आप, मुझे भी पढ़ना है

पापा कब आओगे आप, मुझे भी पढ़ना है

इस गांव में कोई मां अपने बेटे का इंतजार कर रही थी तो कोई पत्नी अपने पति की। इस दौरान कमांडेंट नरेंद्र कुमार की नजर एक मासूम बच्ची पर गई जो अपने पिता को याद करते हुए रो रही थी। मासूम बच्ची कह रही थी, 'पापा कब आएंगे, अब तो आ जाएं क्योंकि हमें भी पढ़ना है ,सभी के पापा है हमारे पापा क्यों नहीं'। मिली जानकारी के मुताबिक इस बच्ची के पिता का नाम राकेश है जो कुछ दिन पहले घर छोड़ कर नक्सलियों के साथ चला गया था, और अभी तक घर वापस नहीं आया। घर पर बेटी से लगाए मां तक की राकेश की राहें देख रही हैं।

मां ने सुनाई नक्सली बनने की कहानी

मां ने सुनाई नक्सली बनने की कहानी

बेटे का इंतजार कर रही 70 साल की बुजुर्ग मां का सामना जब सीआरपीएफ बटालियन के असिस्टेंट कमांडेंट नरेंद्र कुमार से हुआ तो उनकी आंखे छलक गई। उन्होंने लड़खड़ाते हुए जुबान से कहा कि आज भी उस वक्त उनका दिल रो उठता है जब मासूम बच्ची उससे पूछती है कि, मेरे पापा कब आएंगे। मां ने बताया कि राकेश के बारे में सुनने में आता है कि वह झारखंड के जंगलों में बंदूक लेकर घूमता है और नक्सली संगठन का एरिया कमांडर है। हमारे दो बेटे और भी हैं जो प्रदेश में रहकर नौकरी करते हैं। पर पुलिस के द्वारा राकेश की तलाश काफी दिनों से की जा रही है। ऐसा कहा जाता है कि पुलिस उसका एनकाउंटर कर देगी। जब नक्सली बनने की दास्तान के बारे में पूछा गया तो बुजुर्ग आंखों ने सिसकते हुए कहा कि कई बार उसे मना किया गया था कि गलत रास्ते पर मत चलो पर दोस्तों की बुरी संगत ने उसे नक्सली बना दिया। और वह हम लोगों को छोड़ जंगलों में चला गया।

नक्सली भी हैं समाज का हिस्सा

नक्सली भी हैं समाज का हिस्सा

इतने में ही राकेश की 5 वर्षीय बेटी रोती हुई असिस्टेंट कमांडेंट नरेंद्र कुमार के पास पहुंची और कहा कि हमारे पापा कब आएंगे। हमें भी पढ़ना है और आगे बढ़ना है पापा के बिना सब कुछ अधूरा है। बच्चे की दर्दनाक कहानी सुनने के बाद नरेंद्र कुमार ने अपील करते हुए कहा कि अगर राकेश बंदूक छोड़ कर आत्मसमर्पण कर दे तो उसका गुनाह कुछ कम कर दिया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि नक्सली भी समाज का हिस्सा है भले ही वह अपना रास्ता भटक गए हों पर वह वापस लौट जाएं तो समाज उनके साथ फिर से वही व्यवहार करेगा जो पहले करता था। हमारा इन सभी से अपील है कि हिंसा का रास्ता छोड़ते हुए समाज के मुख्य धारा से जुड़े और अपने परिवार के साथ एक बेहतर जिंदगी जिए।

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