Biju Patnaik: दिग्गज राजनेता के कफन पर 3 देशों का राष्ट्रध्वज, PM-राष्ट्रपति को भी नहीं मिलता ऐसा सम्मान!
Biju Patnaik ओडिशा के ऐसे दिग्गज राजनेता हैं, जिनकी लोकप्रियता के आसपास कोई नहीं टिकता। वह एक किंवदंती बन चुके हैं कि निधन के 25 साल बाद भी ओडिशा के किसी अन्य नेता को ऐसा कद हासिल नहीं हुआ है।

Biju Patnaik उर्फ बिजयानंद पटनायक को प्यार से लोग बीजू पटनायक या बीजू बाबू के नाम से पुकारते हैं। महान स्वतंत्रता सेनानी, पायलट, उद्योगपति, राजनीतिज्ञ और समाजसेवक के रूप में मशहूर बीजू पटनायक बौद्धिकता के साथ-साथ समाज सुधारक और ओडिशा के शिल्पकार के रूप में जाने जाते हैं। लोगों का विश्वास जीतने और उन्हें प्रेरित करने की उनकी क्षमता असाधारण थी।
बीजू बाबू चार दशक से अधिक समय तक ओडिशा के राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे। सत्ता में हों या विपक्ष में, वह देश के सबसे प्रभावशाली राजनेताओं में से एक थे। जीवन के आरंभ में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित बीजू बाबू स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। अक्सर प्रमुख क्रांतिकारियों को अपने घर में शरण देने वाले बीजू बाबू बचपन से ही साहसिक राजनीतिक गतिविधियों का हिस्सा रहे। छात्र जीवन में बीजू साइकिल से कटक से पेशावर की यात्रा पर निकल पड़े। उन्होंने "भारत छोड़ो" आंदोलन के दौरान कई अंडरग्राउंड नेताओं का सहयोग किया। कई महीनों तक जेल में रहे।
करीब 30 साल पहले 27 जनवरी, 1992 को भुवनेश्वर में 'मेरे सपने का उड़ीसा (अब ओडिशा)' का आह्वान कर उन्होंने कहा था, 21वीं सदी के ओडिशा का मेरा सपना ऐसा है जिसमें राज्य के हित को प्राथमिकता देने वाले युवा पुरुष और महिलाएं शामिल होंगी। उन्हें खुद पर गर्व और आत्मविश्वास होगा। वे किसी की दया पर निर्भर नहीं होंगे। अपने दिमाग, बुद्धि और क्षमता से युवा कलिंग के इतिहास को फिर से हासिल करेंगे। पटनायक के अनुसार, 'मैं चाहता हूं कि 21वीं सदी के मेरे उड़ीसा में उत्कृष्ट कारीगर, शानदार शिल्पकार और मूर्तिकार, महानतम संगीतकार और कवि भी हों।'
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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बीजू बाबू ने चियांग काइशेक के चीन में चीनी क्रांतिकारियों की मदद के लिए पूरे हिमालय में जोखिम भरे अभियानों का नेतृत्व किया था। ब्रिटिश सरकार ने विशेष रूप से रंगून से ब्रिटिश परिवारों को निकालने के बीजू बाबू के प्रयासों की सराहना की जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों ने बर्मा पर आक्रमण किया था। अंग्रेजों की सेवा करते हुए भी बीजू बाबू भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रति निष्ठावान रहे। रॉयल इंडिया एयर फ़ोर्स के एयर ट्रांसपोर्ट कमांड का नेतृत्व करते हुए, उन्होंने अपने घर में जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और अरुणा आसफ़ अली जैसे लोगों को शरण दी।
बीजू बाबू को ओडिशा के औद्योगिक विकास का अग्रदूत माना जाता है। वह अक्सर कहते थे, "गरीब पैदा होना कोई अपराध नहीं है, लेकिन वैसे ही बने रहना वास्तव में एक अपराध है। उन्होंने मिशन मोड में उद्योगों की श्रृंखला स्थापित की। उनके बारे में मशहूर कई कहानियों में एक देश के पहले प्रधानमंत्री पं. नेहरू से जुड़ी है। पंडित नेहरू ने एक बार पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय से पूछा, 'क्या आप बीजू पटनायक नामक युवक से मिले हैं।' जवाब में डॉ रॉय ने कहा, "मैंने उसके बारे में सुना है; लेकिन अभी तक उनसे मुलाकात नहीं हुई है।" इस पर नेहरू ने बंगाल के मुख्यमंत्री से कहा, कभी उनसे मिलिए। मुझे ऐसे विजनरी और बहादुर लोग पसंद हैं। एकमात्र परेशानी यह है कि कभी-कभी आपको पता ही नहीं चलेगा कि बीजू आपको कहां पहुंचा सकते हैं।

बीजू के कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता के बाद, इंडोनेशियाई सरकार ने उन्हें भूमिपुत्र (son of the soil) सम्मान के साथ मानद नागरिकता प्रदान की। 1996 में 50वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, इंडोनेशिया के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान, बिंटांग जस उतामा (Bintang Jasa Utama) से सम्मानित किया गया।
बीजू पटनायक की अंतिम यात्रा में उनकी पार्थिव देह पर 3 देशों- भारत, इंडोनेशिया और रूस के राष्ट्रीय ध्वज लिपटे हुए थे। राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमंत्रियों को अक्सर ऐसा विशेषाधिकार नहीं मिलता जो बीजू बाबू को मिला। अतुलनीय योगदान के लिए बीजू बाबू को हमेशा याद किया जाएगा।












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